संयुक्त राष्ट्र की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, एशिया-प्रशांत क्षेत्र के देशों को असमान प्रारंभिक बिंदुओं का सामना करना पड़ रहा है, जो डिजिटल और आर्थिक तैयारी में गंभीर असमानताओं को उजागर करता है।
यूरोपीय संघ के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज़्म (CBAM) के प्रति भारत का दृष्टिकोण, जो वर्तमान में छूट प्राप्त करने पर केंद्रित है, को दीर्घकालिक व्यापार प्रतिस्पर्धा, राजकोषीय स्थिरता और जलवायु नेतृत्व सुनिश्चित करने के लिए एक सक्रिय कार्बन मूल्य निर्धारण रणनीति में विकसित होना चाहिए।
भारत को अपनी निर्यात रणनीति को पुनः संतुलित करने की आवश्यकता है, जिसमें बाज़ार विविधीकरण, कूटनीतिक सहभागिता और मैदान-स्तरीय व्यापार विकास शामिल हैं, ताकि बढ़ते वैश्विक व्यापारिक प्रतिकूलताओं का सामना किया जा सके तथा प्रतिस्पर्धात्मकता बनाए रखी जा सके।
हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 2:1 बहुमत से अपने मई 2025 के निर्णय (वनशक्ति निर्णय) की समीक्षा करते हुए उसे वापस ले लिया और सार्वजनिक हित का उदाहरण देते हुए पश्चगामी पर्यावरणीय स्वीकृतियों (ECs) की संभावना को पुनः स्थापित किया।
भारत की न्यायिक प्रणाली में तत्काल सुधार की आवश्यकता है, क्योंकि विभिन्न न्यायालयों में 4.8 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं, जिनमें से कुछ दशकों से लंबित हैं।
भारत को राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता को सुदृढ़ करके और कर अपवर्तन एवं अनुदानों में संतुलन पुनर्स्थापित करके न्यायसंगत राजकोषीय संघवाद सुनिश्चित करना चाहिए।
यूनिसेफ की ‘स्टेट ऑफ द वर्ल्ड्स चिल्ड्रन (SWOC) 2025’ रिपोर्ट के अनुसार भारत जैसे विकासशील देशों को अत्यधिक बाल गरीबी और बहुआयामी बाल अभाव का सामना करना पड़ रहा है।
वायनाड भूस्खलन (केरल, 2024) का मामला उन संरचनात्मक समस्याओं को उजागर करता है, जहाँ ₹2,200 करोड़ की आकलित हानि के बावजूद केंद्र से केवल ₹260 करोड़ प्राप्त हुए। इसने भारत की आपदा-प्रतिक्रिया वित्तीय प्रणाली पर चिंताओं को पुनः उत्पन्न कर दिया है।
एक ऐतिहासिक नीतिगत परिवर्तन में भारत ने अपने नागरिक परमाणु ऊर्जा क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोल दिया है—यह क्षेत्र 1962 के परमाणु ऊर्जा अधिनियम के लागू होने के बाद से केवल राज्य के लिए आरक्षित था।