भारत में सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम: परिवर्तन का एक दशक

पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था

संदर्भ

  • विश्वभर में केंद्रीकृत आर्थिक नियोजन के पतन ने राज्य-स्वामित्व वाले उपक्रमों की भूमिका को पुनर्परिभाषित किया है, जिससे उन्हें दक्षता, प्रतिस्पर्धात्मकता और नवाचार की ओर अग्रसर होना पड़ा है।
  • भारत का अनुभव वैश्विक प्रवृत्तियों का प्रतिबिंब है, साथ ही यह विशिष्ट घरेलू नीतिगत प्राथमिकताओं को भी दर्शाता है। आवश्यक है कि यह देखा जाए कि भारत में सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम (PSEs) विगत दशक में किस प्रकार विकसित हुए हैं।

सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम (PSEs) के बारे में

  • ये सरकारी स्वामित्व वाली निगम या राज्य-स्वामित्व वाली कंपनियाँ होती हैं जिनमें सरकार की बहुसंख्यक हिस्सेदारी (51% या उससे अधिक) होती है।
    • इनमें ऊर्जा, इस्पात, दूरसंचार, परिवहन और वित्त जैसे क्षेत्र सम्मिलित हैं।
    • इन्हें निम्न प्रकार से वर्गीकृत किया जाता है:
      • केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम (CPSEs)
      • राज्य स्तरीय सार्वजनिक उपक्रम (SLPEs)
  • इनकी देखरेख मुख्यतः वित्त मंत्रालय के अंतर्गत सार्वजनिक उपक्रम विभाग (DPE) द्वारा की जाती है।
  • CPSEs का वर्गीकरण:
    • महानवरत्न (Maharatna): बड़े, अत्यधिक लाभकारी CPSEs जिनकी वैश्विक उपस्थिति महत्वपूर्ण है (जैसे ONGC, NTPC)।
    • नवरत्न (Navratna): परिचालनिक स्वायत्तता और सुदृढ़ वित्तीय स्थिति वाले CPSEs (जैसे BEL, HAL)।
    • मिनीरत्न (Miniratna): छोटे CPSEs जो निरंतर लाभ अर्जित करते हैं और परिचालनिक लचीलापन रखते हैं।

सार्वजनिक क्षेत्र सुधार क्यों महत्वपूर्ण हैं?

  • वैश्विक संदर्भ: विश्व स्तर पर PSE सुधार उनके राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं पर बड़े प्रभाव और बेहतर सेवा प्रदायगी की आवश्यकता से प्रेरित थे।
    • शेयर बाजार में सूचीकरण, तकनीकी उन्नयन और बेहतर कॉर्पोरेट प्रशासन जैसे उपाय सामान्य हो गए। हाल के वर्षों में, PSEs ने निम्न-कार्बन संक्रमण में अग्रणी भूमिका निभाई है।
    • आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) के अनुसार, 2023 में विश्वभर की 2,037 सूचीबद्ध कंपनियों में से 25% से अधिक सार्वजनिक संस्थाओं के स्वामित्व में थीं, जो वैश्विक बाज़ार पूंजीकरण का लगभग 12% थीं।

भारत के PSEs के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ

  • प्रौद्योगिकी व्यवधान और डिजिटल रूपांतरण:
    • अप्रचलित आईटी प्रणालियाँ और प्रक्रियाएँ
    • कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वचालन और डेटा विश्लेषण जैसी नई तकनीकों को अपनाने में धीमी गति
    • बढ़ती डिजिटलीकरण से साइबर सुरक्षा जोखिम
  • कौशल अंतराल और कार्यबल संक्रमण:
    • वर्तमान कौशल और भविष्य की तकनीकी आवश्यकताओं के बीच असंगति
    • पुनः-कौशल और उन्नत कौशल कार्यक्रमों की धीमी गति
    • कठोर मानव संसाधन नीतियाँ जो पार्श्विक भर्ती को सीमित करती हैं
  • शासन और स्वायत्तता संबंधी बाधाएँ: हालांकि शासन में सुधार हुआ है, लेकिन चुनौतियां बनी हुई हैं:
    • नौकरशाही निगरानी के कारण सीमित परिचालनिक स्वायत्तता
    • खरीद और निवेश में निर्णय लेने में विलंब
    • कुछ मामलों में राजनीतिक और प्रशासनिक हस्तक्षेप
  • पूँजी आवंटन और निवेश पर प्रतिफल: पूँजी दक्षता असमान बनी हुई है, जबकि केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (CPSEs) की बैलेंस शीट सुदृढ़ है।
    • पूँजीगत व्यय संबंधी निर्णय कभी-कभी नीतिगत कारणों से प्रेरित होते हैं, न कि वाणिज्यिक दृष्टि से सर्वोत्तम होते हैं। 
    • कई सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (PSEs) में प्रयुक्त पूँजी पर प्रतिफल (ROCE) निजी क्षेत्र के मानकों से नीचे बना हुआ है। 
    • अल्प-प्रदर्शनकारी परिसंपत्तियाँ निरंतर पूँजी को बाँधे रखती हैं।
  • अनुसंधान एवं विकास (R&D) की कमी: वैश्विक समकक्षों की तुलना में भारतीय सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम (PSEs) अनुसंधान एवं विकास (R&D) में अपेक्षाकृत कम निवेश करते हैं।
    • वैश्विक समकक्षों की तुलना में कम निवेश
    • उत्पाद नवाचार और प्रक्रिया उन्नयन पर सीमित ध्यान
    • रणनीतिक क्षेत्रों में आयातित तकनीक पर निर्भरता
    • अकादमिक जगत और स्टार्टअप्स के साथ कमजोर सहयोग
  • बाज़ार प्रतिस्पर्धा और मूल्य निर्धारण दबाव: सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम (PSEs) अब बढ़ते हुए प्रतिस्पर्धी बाज़ारों में निजी खिलाड़ियों के साथ कार्यरत हैं। चुनौतियाँ इस प्रकार हैं:
    • ऊर्जा और परिवहन जैसे क्षेत्रों में मूल्य नियंत्रण या सामाजिक दायित्व
    • मूल्य निर्धारण और अनुबंधों में कम लचीलापन
    • बढ़ती लागत से लाभांश पर दबाव
  • सततता और जलवायु संक्रमण जोखिम:निम्न-कार्बन विकास की ओर वैश्विक परिवर्तन अवसरों और जोखिमों दोनों को प्रस्तुत करता है।
    •  जीवाश्म ईंधन-आधारित सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (PSEs) के लिए उच्च संक्रमण लागत; 
    • भविष्य के विनियमों और कार्बन मूल्य निर्धारण को लेकर अनिश्चितता; 
    • नवीकरणीय ऊर्जा और हरित प्रौद्योगिकियों में बड़े निवेश की आवश्यकता।
  • वैश्विक जोखिम और भू-राजनीतिक चुनौतियाँ: जैसे-जैसे भारतीय सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम (PSEs) विदेशों में विस्तार कर रहे हैं, नई संवेदनशीलताएँ उभर रही हैं:
    •  भूराजनीतिक अस्थिरता और प्रतिबंधों का जोखिम; 
    • मुद्रा तथा वस्तु मूल्य में उतार-चढ़ाव;
    •  विदेशी न्यायक्षेत्रों में विनियामक और अनुपालन संबंधी जोखिम।
  • राज्य स्तरीय PSEs की कमजोरियाँ:यद्यपि केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम (PSEs) में सुधार हुआ है, अनेक राज्य स्तरीय PSEs अभी भी पीछे हैं।
    • अपर्याप्त पारदर्शिता और कमजोर वित्तीय अनुशासन; 
    • राज्य सरकार के समर्थन पर अत्यधिक निर्भरता;
    •  सीमित सुधार गति।

भारत की नीतिगत दिशा: रणनीतिक क्षेत्रों पर ध्यान

  • नई सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम (PSE) नीति (2020) – आत्मनिर्भर भारत के अंतर्गत: इस नीति ने केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (CPSEs) को रणनीतिक और गैर-रणनीतिक श्रेणियों में वर्गीकृत किया।
    • सरकार ने गैर-रणनीतिक क्षेत्रों से बड़े पैमाने पर बाहर निकलते हुए, रक्षा, ऊर्जा एवं अंतरिक्ष जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में सीमित उपस्थिति (एक से चार CPSEs) बनाए रखी है तथा सार्वजनिक उपक्रमों के साथ निजी भागीदारी को प्रोत्साहित किया है।
  • CPSEs का वित्तीय पुनरुत्थान:  विगत दशक में CPSEs नीति-गत ठहराव और धीमी वृद्धि से निकलकर वित्तीय मूल्य सृजन एवं पूंजीगत व्यय में प्रमुख योगदानकर्ता बन गए हैं।
    • लाभ कमाने वाले CPSEs की संख्या FY15 में 157 से बढ़कर FY25 में 227 हो गई, जबकि घाटे में चलने वाले CPSEs की संख्या इसी अवधि में 77 से घटकर 63 रह गई।
    • लाभकारी CPSEs का शुद्ध लाभ 2.4 गुना बढ़ा, FY15 में ₹1.30 लाख करोड़ से FY25 में ₹3.09 लाख करोड़ तक।
    • कुल चुकता पूंजी FY15 में ₹2.13 लाख करोड़ से बढ़कर मार्च 2025 तक ₹6.87 लाख करोड़ हो गई।
    • शुद्ध संपत्ति (Net Worth) एक दशक में ₹9.85 लाख करोड़ से बढ़कर ₹22.33 लाख करोड़ तक पहुँच गई।
  • राजकोष और बाज़ार में योगदान:  CPSEs का केंद्रीय राजकोष में योगदान FY15 में ₹2.00 लाख करोड़ से बढ़कर FY25 में ₹4.94 लाख करोड़ हो गया।
    • 66 सूचीबद्ध CPSEs का संयुक्त बाज़ार पूंजीकरण मार्च 2025 में ₹38.57 लाख करोड़ तक पहुँच गया, जो एक दशक पहले की तुलना में तीन गुना है।
  • निवेश और बचत इंजन:   गैर-वित्तीय CPSEs ने प्रमुख क्षेत्रों में निवेश मांग को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
    • इन उपक्रमों द्वारा सकल पूंजी निर्माण लगभग 12% की दर से बढ़ा है, जिससे वे एक शुद्ध बचत क्षेत्र बन गए हैं जो राष्ट्रीय बचत का लगभग 10% हिस्सा रखते हैं।
  • वित्तीय क्षेत्र का पुनरुद्धार: वित्तीय CPSEs में, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने ट्विन बैलेंस शीट संकट के बाद सुदृढ़ वापसी की है।
    • विलय के माध्यम से एकीकरण, बेहतर शासन और तीव्र प्रौद्योगिकी अपनाने ने उनके प्रदर्शन को रूपांतरित किया है।
    • FY25 तक बैंकों का शुद्ध लाभ उल्लेखनीय रूप से बढ़ा और रिटर्न ऑन एसेट्स तथा रिटर्न ऑन इक्विटी  जैसे प्रमुख संकेतक निर्णायक रूप से सकारात्मक हो गए।
  • निर्यात और वैश्विक उपस्थिति:  सुधारों ने रक्षा, इंजीनियरिंग और वस्तुओं में CPSEs के निर्यात योगदान को बढ़ावा दिया है।
    • रक्षा निर्यात 2024–25 में रिकॉर्ड ₹23,622 करोड़ तक पहुँच गया। भारतीय तेल PSUs अब 21 देशों में 45 विदेशी परिसंपत्तियों का संचालन कर रहे हैं, जिनमें कुल निवेश $40 अरब से अधिक है।
  • हरित संक्रमण :  भारतीय रेल, यद्यपि औपचारिक रूप से PSE नहीं है, बड़े पैमाने पर विद्युतीकरण, नवीकरणीय ऊर्जा एकीकरण और हाइड्रोजन-चालित कोचों के परीक्षण के माध्यम से हरित संक्रमण का उदाहरण प्रस्तुत करती है, जो तीव्र कार्बन-मुक्तिकरण की दिशा में संकेत करता है।

भारत के सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (PSEs) को सुदृढ़ करने हेतु प्रमुख सिफारिशें

  • शासन सुधार और बोर्ड स्वायत्तता को गहरा करना: स्वतंत्र और पेशेवर बोर्डों को क्षेत्र विशेषज्ञों के साथ सुदृढ़ करना;
    • अत्यधिक प्रशासनिक नियंत्रण और अनुमोदनों को कम करना;
    • स्वामित्व और प्रबंधन कार्यों को स्पष्ट रूप से अलग करना;
  • संचालन और वित्तीय स्वायत्तता को बढ़ाना: नवरत्न और महारत्न ढाँचों के दायरे का विस्तार करना;
    • पूंजीगत व्यय, संयुक्त उपक्रमों और परिसंपत्ति मुद्रीकरण में अधिक लचीलापन प्रदान करना;
    • इनपुट-आधारित नियंत्रणों से परिणाम-आधारित प्रदर्शन निगरानी की ओर बढ़ना;
  • रणनीतिक पूंजी आवंटन और पोर्टफोलियो तर्कसंगतीकरण: गैर-मुख्य और लगातार घाटे में चलने वाले उपक्रमों से बाहर निकलना या उनका निजीकरण करना;
    • सरकारी पूंजी को रक्षा, ऊर्जा और अवसंरचना जैसे रणनीतिक क्षेत्रों पर केंद्रित करना;
    • नए निवेशों के लिए सख्त रिटर्न-ऑन-कैपिटल मानदंड अपनाना;
  • प्रौद्योगिकी और डिजिटल रूपांतरण में निवेश: पुरानी आईटी प्रणालियों और परिचालन का आधुनिकीकरण करना;
    • कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), स्वचालन, डेटा विश्लेषण और क्लाउड प्रौद्योगिकियों को लागू करना;
    • साइबर सुरक्षा और डिजिटल जोखिम प्रबंधन को सुदृढ़ करना;
  • भविष्य-उन्मुख कार्यबल का निर्माण: बड़े पैमाने पर री-स्किलिंग और अप-स्किलिंग कार्यक्रम शुरू करना;
    • लचीली मानव संसाधन नीतियाँ लागू करना, जिनमें पार्श्व भर्ती और प्रदर्शन-आधारित वेतन शामिल हों;
    • स्टार्टअप्स, शिक्षाविदों और वैश्विक कंपनियों के साथ सहयोग को प्रोत्साहित करना;
  • अनुसंधान एवं विकास (R&D) और नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ाना: रणनीतिक PSEs के लिए न्यूनतम R&D व्यय लक्ष्य निर्धारित करना;
    • नवाचार प्रयोगशालाएँ और उत्कृष्टता केंद्र स्थापित करना;
    • IITs, DRDO प्रयोगशालाओं और निजी नवप्रवर्तकों के साथ संयुक्त अनुसंधान को बढ़ावा देना;
  • सार्वजनिक सेवा दायित्वों को वित्तीय व्यवहार्यता के साथ संरेखित करना: गैर-व्यावसायिक सामाजिक दायित्वों के लिए PSEs को पारदर्शी रूप से क्षतिपूर्ति करना;
    • जहाँ संभव हो, मूल्य नियंत्रणों को लक्षित सब्सिडी से प्रतिस्थापित करना;
    • परिचालन विकृतियों को कम करने हेतु प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) का उपयोग करना;
  • हरित और ऊर्जा संक्रमण को तीव्र करना: उच्च-उत्सर्जन PSEs के लिए समयबद्ध डीकार्बोनाइजेशन रोडमैप विकसित करना;
    • नवीकरणीय ऊर्जा, हाइड्रोजन और ऊर्जा भंडारण में निवेश को बढ़ाना;
    • संक्रमण लागतों को वित्तपोषित करने हेतु ग्रीन बॉन्ड्स और मिश्रित वित्त का उपयोग करना;
  • वैश्विक विस्तार और जोखिम प्रबंधन को सुदृढ़ करना: विदेशी सहायक कंपनियों और संयुक्त उपक्रमों के शासन में सुधार करना;
    • भूराजनीतिक, मुद्रा और वस्तु जोखिम आकलन को बढ़ाना;
    • वैश्विक अनुपालन और अनुबंध प्रबंधन क्षमताओं का निर्माण करना;
  • राज्य-स्तरीय PSEs तक सुधारों का विस्तार:  पारदर्शी प्रकटीकरण और प्रदर्शन मानदंडों को लागू करना;
    • राज्य वित्तीय समर्थन को सुधार माइलस्टोन से जोड़ना;
    • राज्य स्तर पर एकीकरण और सार्वजनिक–निजी भागीदारी को प्रोत्साहित करना।
दैनिक मुख्य परीक्षा दैनिक अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न] भारत में सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (PSEs) की दक्षता, शासन व्यवस्था तथा उनकी भूमिका में सुधार हेतु लागू की गई प्रमुख सुधारात्मक पहलों का परीक्षण कीजिए।

Source: IE

 

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