पाठ्यक्रम: जीएस-2/शिक्षा; जीएस-3/अर्थव्यवस्था
सन्दर्भ
- नीति आयोग की रिपोर्ट “विकसित भारत के लिए कौशल विकास की पुनर्कल्पना” ने शिक्षित बेरोजगारी तथा भारत की शिक्षा और कौशल विकास व्यवस्था को श्रम-बाजार की मांगों के अनुरूप बनाने की तत्काल आवश्यकता पर नीतिगत बहस को फिर से तेज किया है।
नीति आयोग द्वारा “विकसित भारत के लिए कौशल विकास की पुनर्कल्पना” की प्रमुख निष्कर्ष
- गंभीर कौशल–रोजगार असंगति: केवल लगभग 8.25% स्नातक ही अपनी शैक्षणिक योग्यताओं के अनुरूप रोजगार में हैं, जो व्यापक अल्प-रोजगार और योग्यता-असंगति को दर्शाता है।
- उच्च शिक्षित बेरोजगारी: स्नातकों में बेरोजगारी दर 13% और स्नातक महिलाओं में 20.4% है, जो 3.2% की राष्ट्रीय बेरोजगारी दर से काफी अधिक है।
- सामान्य डिग्रियों पर अत्यधिक निर्भरता: भारत के 3.4 करोड़ स्नातक छात्रों में से 2 करोड़ से अधिक बी.ए., बी.एससी. और बी.कॉम. जैसे पाठ्यक्रमों में नामांकित हैं, जिनमें से कई का रोजगार के साथ प्रत्यक्ष संबंध अपेक्षाकृत कमजोर है।
- युवाओं की बड़ी संख्या में निष्क्रियता: रिपोर्ट में NEET (शिक्षा, रोजगार या प्रशिक्षण में नहीं) श्रेणी में आने वाले युवाओं की एक बड़ी संख्या का अनुमान लगाया गया है।
- हालांकि, नीति आयोग ने स्पष्ट किया है कि NEET के आँकड़ों को बेरोजगारी के आँकड़ों के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए।
- कौशल विकास से आय में सुधार: अतिरिक्त कौशल प्राप्त करने वाले स्नातकों की आय की संभावनाएँ बेहतर होती हैं। रिपोर्ट में दिए गए प्रमाण के अनुसार, कौशल प्राप्त सामान्य स्नातकों का औसत प्रारंभिक मासिक वेतन, बिना अतिरिक्त कौशल वाले स्नातकों की तुलना में ₹7,000 अधिक है।
- व्यावसायिक शिक्षा के प्रति सामाजिक कलंक: आईटीआई, डिप्लोमा पाठ्यक्रम और तकनीकी प्रशिक्षण को अक्सर ‘द्वितीय श्रेणी’ के विकल्प के रूप में देखा जाता है, जिससे युवा व्यावसायिक करियर अपनाने से हतोत्साहित होते हैं।
- सूचना और जागरूकता की कमी: उपयुक्त पाठ्यक्रमों, अप्रेंटिसशिप, छात्रवृत्तियों और सरकारी योजनाओं के बारे में सीमित जानकारी के कारण अनेक संभावित लाभार्थी कौशल विकास के अवसरों तक नहीं पहुँच पाते हैं।
- परिणाम-उन्मुख दृष्टिकोण का अभाव: मौजूदा कार्यक्रम अक्सर रोजगार, आय में वृद्धि और दीर्घकालिक करियर प्रगति के बजाय नामांकन और प्रमाणन पर अधिक जोर देते हैं।
प्रभावी कौशल विकास में संरचनात्मक बाधाएँ
- सूचना और लैंगिक अंतर: अनेक शिक्षार्थियों के पास उपयुक्त पाठ्यक्रमों और उनसे मिलने वाले आर्थिक लाभों के बारे में विश्वसनीय जानकारी का अभाव है।
- महिलाओं को आवागमन, सुरक्षा, सामाजिक अनुमति और समय की सीमाओं जैसी अतिरिक्त बाधाओं का सामना करना पड़ता है।
- आपूर्ति-प्रेरित संरचना: एक ही प्रकार के सभी पर लागू होने वाले दृष्टिकोण और उद्योग की कमजोर भागीदारी के कारण कौशल विकास कार्यक्रम स्थानीय और क्षेत्रीय क्षेत्रों की मांगों के अनुरूप प्रभावी ढंग से प्रतिक्रिया देने में असमर्थ रहते हैं।

कौशल विकास क्यों महत्वपूर्ण है?
- नीति आयोग द्वारा उद्धृत सर्वेक्षण के आँकड़ों के अनुसार, अतिरिक्त कौशल वाले सामान्य स्नातक का औसत प्रारंभिक मासिक वेतन ₹29,000 है, जबकि बिना कौशल विकास वाले स्नातक का यह ₹22,000 है।
- समय के साथ यह संचयी आय में पर्याप्त अंतर में परिवर्तित हो सकता है।
- इसलिए, रोजगार प्राप्त करने के साथ-साथ आय में गतिशीलता, उद्यमिता और कार्यबल की अनुकूलन क्षमता में सुधार के लिए कौशल विकास आवश्यक है, विशेष रूप से तकनीकी बदलाव और हरित संक्रमण के दौर में।

आगे की राह
- भारत को निर्णायक रूप से मांग-आधारित, उद्योग-समर्थित और परिणाम-आधारित कौशल विकास की ओर बढ़ने की आवश्यकता है। प्रमुख सुधारों में शामिल होने चाहिए:
- बी.ए., बी.एससी. और बी.कॉम. कार्यक्रमों को व्यावहारिक और उद्योग की आवश्यकताओं के अनुरूप विशेषज्ञताओं में पुनर्गठित करना।
- अप्रेंटिसशिप-समावेशित डिग्री कार्यक्रमों और कार्य-एकीकृत शिक्षा का विस्तार करना।
- हरित उद्योगों और इलेक्ट्रिक वाहनों जैसे तीव्र गति से विकसित हो रहे क्षेत्रों के लिए कौशल का निर्माण करना।
- सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) आधारित कौशल विकास विश्वविद्यालयों को मजबूत करना तथा आईटीआई को अधिक शैक्षणिक और प्रशासनिक स्वायत्तता प्रदान करना।
- शिक्षा में डिजिटल साक्षरता, वित्तीय साक्षरता और कार्यस्थल की तैयारी को शामिल करना।
- करियर परामर्श तथा महिलाओं और वंचित युवाओं के लिए लक्षित सहायता का विस्तार करना।
नेशनल इंटिट्यूशन फ़ॉर ट्रांसफ़ार्मिंग इंडिया (नीति आयोग):
- यह एक प्रमुख सार्वजनिक नीति विचार मंच है, जिसकी स्थापना 1 जनवरी 2015 को योजना आयोग के स्थान पर की गई थी।
प्रमुख विशेषताएँ:
- प्रकृति: एक कार्यकारी निकाय/गैर-संवैधानिक संस्था, जिसकी स्थापना केंद्रीय मंत्रिमंडल के प्रस्ताव के माध्यम से की गई।
- अध्यक्ष: भारत के प्रधानमंत्री।
- उपाध्यक्ष: प्रधानमंत्री द्वारा नियुक्त।
- शासी परिषद: इसमें राज्यों के मुख्यमंत्री और केंद्रशासित प्रदेशों के प्रतिनिधि शामिल होते हैं, जो सहकारी और प्रतिस्पर्धी संघवाद को बढ़ावा देते हैं।
- भूमिका: केंद्र और राज्य सरकारों को रणनीतिक एवं तकनीकी नीतिगत सलाह प्रदान करना तथा साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण को बढ़ावा देना।
प्रमुख उद्देश्य:
- नीति निर्माण में राज्यों को शामिल करके सहकारी संघवाद को बढ़ावा देना।
- योजना और विकास के लिए नीचे से ऊपर की ओर दृष्टिकोण विकसित करना।
- नवाचार, उद्यमिता और सतत विकास को बढ़ावा देना।
- पूर्ववर्ती योजना आयोग की तरह धन आवंटित करने के बजाय ज्ञान और सलाहकारी मंच के रूप में कार्य करना।
स्रोत: IE
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