पाठ्यक्रम: जीएस-3/पर्यावरण
चर्चा में क्यों?
- प्रधानमंत्री सूर्य सरोवर योजना (PM-SSY) को हाल ही में मंजूरी दिया जाना भारत सरकार द्वारा भूमि की आवश्यकता को कम करने वाली सौर ऊर्जा परियोजनाओं को बढ़ावा देने की मंशा को दर्शाता है।
पृष्ठभूमि और आवश्यकता
- भारत की सौर ऊर्जा क्षमता 2016 में 3 गीगावाट (GW) से बढ़कर 2026 में 160 GW से अधिक हो गई है। इसमें मुख्य रूप से बड़े पैमाने की सौर परियोजनाओं का योगदान रहा है।
- लेकिन सौर ऊर्जा परियोजनाओं के लिए भूमि की आवश्यकता शहरीकरण और कृषि के साथ प्रतिस्पर्धा करती है। साथ ही, पारिस्थितिक संरक्षण भी एक प्रमुख प्राथमिकता है। इसलिए नई परियोजनाओं के लिए भूमि उपलब्ध कराना लगातार कठिन होता जा रहा है।
- इसलिए नीति-निर्माता अतिरिक्त भूमि की आवश्यकता के बिना सौर ऊर्जा क्षमता बढ़ाने के तरीकों की तलाश कर रहे हैं।
तैरती सौर ऊर्जा प्रणालियाँ
- इसमें जलाशयों और झीलों जैसे जल निकायों की सतह पर तैरते प्लेटफॉर्म के ऊपर सौर मॉड्यूल लगाए जाते हैं।
- इन प्लेटफॉर्मों को अपनी स्थिति में स्थिर रखने के लिए जलाशय की तलहटी या किनारों से बाँधा (Mooring) जाता है।
- प्रणाली के डिजाइन के आधार पर इन्वर्टर और अन्य विद्युत उपकरण तैरते प्लेटफॉर्म पर या तटवर्ती क्षेत्र में लगाए जा सकते हैं।
- तैरती सौर ऊर्जा प्रणालियाँ बिजली का उत्पादन करती हैं, जिसे विद्युत केबलों के माध्यम से भूमि तक पहुँचाया जाता है।
- इन प्रणालियों को स्थापना के लिए भूमि की आवश्यकता नहीं होती। इसलिए औद्योगिक तालाब, जलाशय और अंतर्देशीय जल निकाय तैरती सौर ऊर्जा परियोजनाओं की स्थापना के लिए उपयुक्त स्थान हैं।
लाभ
1. भूमि संरक्षण
- तैरती सौर ऊर्जा प्रणाली सीमित भूमि की माँग को कम करके भूमि के प्रभावी उपयोग और आर्थिक लाभ प्रदान करती है।
2. जल संरक्षण
- सौर पैनल जल के वाष्पीकरण को कम करने में मदद कर सकते हैं। हालाँकि, बचाए जाने वाले जल की मात्रा जलाशय के कितने हिस्से पर पैनल लगाए गए हैं, जलवायु और जलाशय की विशेषताओं पर निर्भर करेगी।
3. अधिक दक्षता
- पैनल पानी के कारण ठंडे रहते हैं, जिससे विशेष रूप से गर्मियों के दौरान उनका प्रदर्शन और ऊर्जा दक्षता बेहतर होती है।
भारत की प्रगति
एनटीपीसी लिमिटेड (NTPC Limited) ने 2022 में भारत की दो सबसे बड़ी तैरती सौर परियोजनाएँ शुरू कीं:
- 100 मेगावाट रामागुंडम परियोजना, तेलंगाना
- 92 मेगावाट कायमकुलम परियोजना, केरल
- एक अन्य महत्वपूर्ण परियोजना 600 मेगावाट की ओंकारेश्वर तैरती सौर ऊर्जा परियोजना, मध्य प्रदेश है, जिसमें वर्तमान में 278 मेगावाट क्षमता संचालित हो रही है।
- वर्तमान में भारत में लगभग 700 मेगावाट तैरती सौर ऊर्जा क्षमता है, जबकि इसकी संभावित क्षमता 102 गीगावाट आँकी गई है। यह अनुमान जलाशयों के केवल 20% क्षेत्र के उपयोग पर आधारित है।
जिन चुनौतियों से निपटना आवश्यक है :
1. मौसम संबंधी जोखिम
- तैरती सौर प्रणालियाँ तेज हवाओं, ऊँची लहरों और जल स्तर में तेजी से होने वाले बदलावों के प्रति संवेदनशील होती हैं। इसलिए जलवायु-अनुकूल और मजबूत प्रणाली डिजाइन आवश्यक है।
2. लागत
- तैरती सौर ऊर्जा सामान्यतः भूमि पर स्थापित पारंपरिक सौर परियोजनाओं की तुलना में अधिक महँगी होती है। इसका कारण तैरते प्लेटफॉर्म, एंकरिंग प्रणालियों, विशेष विद्युत उपकरणों और स्थापना की लागत है।
- ऊर्जा भंडारण प्रणालियों को शामिल करने से कुल पूँजीगत लागत और बढ़ जाएगी।
3. विभिन्न संस्थाओं के बीच समन्वय
- विभिन्न संस्थाओं के बीच समन्वय जटिल है। इनमें राज्य एजेंसियाँ, नगर निकाय, विद्युत वितरण कंपनियाँ, जल संसाधन एवं सिंचाई विभाग, पर्यावरण प्राधिकरण और उद्योग शामिल हैं।
प्रधानमंत्री सूर्य सरोवर योजना (PM-SSY)
- केंद्रीय मंत्रिमंडल ने प्रधानमंत्री सूर्य सरोवर योजना (PM-SSY) को मंजूरी दी है। यह ₹5,070 करोड़ की योजना है, जिसका उद्देश्य देशभर में ऊर्जा भंडारण प्रणालियों के साथ एकीकृत तैरती सौर फोटोवोल्टिक (FSPV) परियोजनाओं के विकास को तेज करना है।
- योजना के तहत 5,000 मेगावाट तैरती सौर ऊर्जा क्षमता विकसित करने का लक्ष्य है। इसके साथ 10,000 मेगावाट-घंटे (MWh) की सह-स्थित ऊर्जा भंडारण क्षमता विकसित की जाएगी, जो कम-से-कम 2 घंटे की भंडारण अवधि उपलब्ध कराएगी।
- परियोजनाओं को वित्त वर्ष 2026–27 से 2030–31 के बीच स्वीकृत किया जाएगा, जबकि वित्तीय सहायता का वितरण वित्त वर्ष 2032–33 तक जारी रहेगा।
- योजना के अंतर्गत केंद्र सरकार पात्र तैरती सौर परियोजनाओं के सफलतापूर्वक चालू होने के बाद प्रति मेगावाट ₹1 करोड़ की केंद्रीय वित्तीय सहायता (CFA) प्रदान करेगी।
सुझाव
- पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील जल निकायों तथा जैव-विविधता, पक्षियों के आवास और मत्स्य पालन के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सावधानी बरती जानी चाहिए। ऐसे क्षेत्रों में तैरती सौर परियोजनाओं को केवल विस्तृत पर्यावरणीय आकलन के बाद ही मंजूरी दी जानी चाहिए।
- इसलिए उपयुक्त जल निकायों की पहचान और आवंटन, विभिन्न संस्थाओं की जिम्मेदारियों का स्पष्ट निर्धारण तथा अनुमोदन प्रक्रियाओं को सरल और सुव्यवस्थित करने के लिए स्पष्ट ढाँचा विकसित करना योजना के सफल क्रियान्वयन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होगा।
स्रोत: IE
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