पाठ्यक्रम: जीएस-4/नैतिकता
सन्दर्भ
- भारत के प्रधानमंत्री ने हाल ही में संस्कृत सुभाषित साझा किया, जिसमें करुणा और संतोष के गुणों पर बल दिया गया। उन्होंने कहा कि यह भावना समाज में सहयोग और शांति के संबंधों को और मजबूत करती है।
करुणा और संतोष का परिचय
- करुणा और संतोष एक-दूसरे को समृद्ध करने वाले गुण हैं, जो व्यक्तिगत चरित्र के साथ-साथ सार्वजनिक नैतिकता को भी मजबूत करते हैं।
- करुणा दूसरों के दुःख के प्रति जागरूकता और उसे दूर करने की इच्छा है; जबकि संतोष अत्यधिक लालसा के बिना आंतरिक पूर्णता और प्रसन्नता की अवस्था है।
- दोनों मिलकर अहंकार के बजाय सहानुभूति और उपभोक्तावाद के बजाय संयम पर आधारित जीवन का समर्थन करते हैं।
मूल अवधारणाएँ
- करुणा (Karuna): दूसरों के कल्याण के प्रति सक्रिय चिंता। यह भावनात्मक लचीलेपन का निर्माण करती है, पारस्परिक संबंधों को मजबूत करती है और गरिमा की स्वाभाविक भावना प्रदान करती है।
- संतोष (Santosha): हमारे पास जो कुछ है, उसके प्रति आंतरिक संतुष्टि की अवस्था। यह लालच को शांत करता है, चिंता को कम करता है और बाहरी मान्यता प्राप्त करने की अंतहीन खोज को समाप्त करता है।

नैतिकता की आधारशिला के रूप में करुणा और संतोष
- केवल नियम नैतिकता को बनाए नहीं रख सकते; इसके लिए मनुष्य में उचित मानसिक दृष्टिकोण का होना आवश्यक है।
- करुणा नैतिक दायरे को स्वार्थ से आगे बढ़ाती है और कमजोर एवं जरूरतमंद लोगों की देखभाल के लिए प्रेरित करती है।
- संतोष लालच, ईर्ष्या और स्वार्थ की निरंतर खोज पर अंकुश लगाता है। करुणा हमें देने के लिए प्रेरित करती है, जबकि संतोष सिखाता है कि लेना कब बंद करना चाहिए।
- भारतीय बौद्धिक परंपराओं में इन गुणों का प्राचीन काल से ही महिमामंडन किया गया है:
- ‘सन्तोषः परमं सुखम्’ (Santoshaḥ paramam sukham): संतोष ही परम सुख है।
- इसी प्रकार, ‘दया’ (Dayā) की संस्कृत अवधारणा नैतिक आचरण के केंद्र में करुणा को स्थान देती है।
- ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना में संपूर्ण विश्व को एक परिवार माना गया है, जो करुणा को सीमित पहचानों से आगे पूरे मानव समाज तक विस्तारित करती है।
करुणा और संतोष का महत्व
- मानवीय कल्याण: करुणा सामाजिक एकजुटता को बढ़ाती है और अलगाव की भावना को कम करती है। संतोष कृतज्ञता, मानसिक शांति और लचीलेपन को बढ़ावा देता है।
- सामाजिक सद्भाव: करुणा वंचित और कमजोर वर्गों के प्रति पूर्वाग्रह एवं उदासीनता का समाधान है। संतोष हानिकारक प्रतिस्पर्धा, ईर्ष्या और भौतिकवाद को कम करता है।
- नैतिक निर्णय-निर्माण: ये दोनों गुण मिलकर महत्त्वाकांक्षा और जवाबदेही के बीच संतुलन स्थापित करते हैं। ये मानव गरिमा या पारिस्थितिक स्थिरता से समझौता किए बिना मानवता की प्रगति को बढ़ावा देते हैं।

सिविल सेवाओं में भूमिका
- एक सरकारी कर्मचारी के लिए करुणा का अर्थ नागरिक-केंद्रित शासन तथा गरीबों, बुजुर्गों, महिलाओं और अन्य कमजोर वर्गों के प्रति संवेदनशीलता है।
- यह प्रशासन को यांत्रिक नियमों के कारण बाधित होने से बचाती है। वहीं, संतोष भ्रष्टाचार, लालच और पद के दुरुपयोग के विरुद्ध एक नैतिक सुरक्षा कवच है।
- एक करुणामय और संतुष्ट लोक सेवक सहानुभूति, ईमानदारी और विवेक के साथ अपने अधिकार का प्रयोग कर सकता है।
- अंततः, ये मूल्य शासन को केवल सेवाएँ प्रदान करने की प्रक्रिया से आगे बढ़ाकर मानवीय गरिमा और सामाजिक न्याय के साधन में बदल देते हैं।
निष्कर्ष
- नैतिकता का सार करुणा है और उसका संतुलन संतोष है।
- असमानता और अत्यधिक भौतिकवाद के दौर में व्यक्तिगत सुख के साथ-साथ नैतिक एवं मानवीय सार्वजनिक शासन के लिए इन गुणों को विकसित करना आवश्यक है।
स्रोत: PIB
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