पाठ्यक्रम: GS1/आधुनिक इतिहास
संदर्भ
- पेरियार और उनके जैसे अन्य सुधारवादी नेताओं ने अस्पृश्यता के विरुद्ध संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
पेरियार ई. वी. रामासामी के बारे में
- पेरियार ई. वी. रामासामी (1879–1973) तमिलनाडु के एक सामाजिक सुधारक, तर्कवादी विचारक और राजनीतिक कार्यकर्ता थे। वे आत्मसम्मान आंदोलन का नेतृत्व करने और द्रविड़ राजनीति की वैचारिक नींव रखने के लिए प्रसिद्ध हैं।
- उन्होंने तमिलनाडु में ब्राह्मणवादी प्रभुत्व तथा लैंगिक और जातिगत असमानता के विरुद्ध विद्रोह किया।
- ई. वी. रामासामी ने तर्कवाद, आत्मसम्मान, महिला अधिकारों और जाति उन्मूलन के सिद्धांतों को बढ़ावा दिया।
वैकोम सत्याग्रह के बारे में
- कारण : यह आंदोलन अस्पृश्यता की प्रथा के विरुद्ध आरंभ किया गया था।
- त्रावणकोर की तत्कालीन रियासत के वैकोम क्षेत्र में निम्न जातियों, विशेषकर दलितों, को वैकोम शिव मंदिर की ओर जाने वाली सड़कों पर चलने का अधिकार नहीं दिया जाता था।
- नेतृत्व : इसका नेतृत्व टी. के. माधवन, के. केलप्पन और अन्य प्रमुख नेताओं ने किया।
- महात्मा गांधी ने भी इस आंदोलन का समर्थन किया तथा परामर्श दिया, यद्यपि प्रारंभ में उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से भाग नहीं लिया।
- ई. वी. रामासामी पेरियार ने भी इस आंदोलन को समर्थन दिया।
- प्रदर्शन : सत्याग्रह (अहिंसक प्रतिरोध) में भाग लेने वाले दलितों को अन्य जातियों की तरह सार्वजनिक सड़कों का उपयोग करने और मंदिर तक पहुँचने का अधिकार देने की माँग कर रहे थे।
- उन्होंने शांतिपूर्ण मार्च और असहयोग के कार्य किए, यद्यपि उन्हें उच्च जाति समूहों से हिंसक विरोध का सामना करना पड़ा।
- परिणाम : एक वर्ष से अधिक समय तक चले आंदोलन और वार्ताओं के बाद सरकार ने अंततः दलितों को मंदिर तक जाने वाली सार्वजनिक सड़कों का उपयोग करने की अनुमति दी।
- यह सामाजिक समानता की विजय और क्षेत्र में जाति-आधारित भेदभाव के अंत का प्रतीक था।
- महत्त्व : वैकोम सत्याग्रह ने केरल में सामाजिक सुधार आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और भारत में अस्पृश्यता तथा जातिगत उत्पीड़न के विरुद्ध व्यापक संघर्ष का एक अहम हिस्सा बना।
- यह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में अस्पृश्यता के विरुद्ध प्रथम बड़ा संगठित आंदोलन भी था।
| स्वतंत्रता-उपरांत अस्पृश्यता का उन्मूलन – संविधान का अनुच्छेद 17 (26 जनवरी 1950 से लागू) ने अस्पृश्यता को कानूनी रूप से समाप्त कर दिया। – इस संवैधानिक गारंटी को लागू करने हेतु 1955 में अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम पारित किया गया। – 1976 में इस अधिनियम में व्यापक संशोधन कर इसे नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम नाम दिया गया, ताकि नागरिक अधिकारों के प्रवर्तन पर इसका ध्यान केंद्रित हो सके। |
स्रोत: TH