पाठ्यक्रम: GS3/कृषि; प्राकृतिक संसाधन
संदर्भ
- हाल ही में संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय के जल, पर्यावरण और स्वास्थ्य संस्थान (UNU-INWEH) द्वारा ‘वैश्विक जल दिवालियापन: संकटोत्तर युग में हमारे जलवैज्ञानिक साधनों से परे जीवन’ शीर्षक रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र जल सम्मेलन (2026) से पूर्व प्रकाशित की गई।
जल दिवालियापन क्या है?
- जल दिवालियापन एक स्थायी संकटोत्तर अवस्था है जिसमें मानव–जल प्रणाली का दीर्घकालिक जल उपयोग नवीकरणीय प्रवाह और सुरक्षित क्षय सीमाओं से अधिक हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप जल एवं पारिस्थितिकी तंत्र की कार्यप्रणालियों का अपरिवर्तनीय अथवा वस्तुतः अपरिवर्तनीय ह्रास होता है।
- इसका अर्थ है कि समाज ने प्रकृति द्वारा पुनःपूर्ति किए जाने योग्य मात्रा से अधिक जल का दोहन किया है, और जल की गुणवत्ता तथा पारिस्थितिक तंत्र को इस स्तर तक क्षतिग्रस्त कर दिया है कि पूर्ववर्ती जल उपलब्धता को अब पुनःस्थापित नहीं किया जा सकता।
- यह जलवैज्ञानिक पूंजी का तंत्रगत अति-व्यय है—वह जल जो सदियों से भूजलभृतों, हिमनदों, नदियों, मृदा और आर्द्रभूमियों में संचित रहा है।
| यह जल तनाव(Stress) या संकट(Crisis) से किस प्रकार भिन्न है? | ||
| अवस्था | विवरण | पुनर्प्राप्ति की संभावना |
| जल तनाव | उपलब्ध आपूर्ति की तुलना में अत्यधिक मांग, किन्तु बेहतर प्रबंधन और संरक्षण के माध्यम से पुनर्प्राप्ति संभव। | परिवर्तनीय(Reversible) |
| जल संकट | एक तीव्र और अस्थायी आपात स्थिति (जैसे, सूखा, प्रदूषण, या आपूर्ति में व्यवधान)। | अस्थायी रूप से परिवर्तनीय(Temporarily Reversible) |
| जल दिवालियापन | दीर्घकालिक, संरचनात्मक अति-उपयोग और ह्रास, जहाँ पुनर्प्राप्ति भौतिक या आर्थिक रूप से असंभव है। | मुख्यतः अपरिवर्तनीय (Largely Irreversible) |
चिंताएँ और मुद्दे: जल दिवालियापन के पैटर्न
- प्रणालीगत वैश्विक जल असुरक्षा:
- 2.2 अरब लोग सुरक्षित रूप से प्रबंधित पेयजल से वंचित हैं।
- 3.5 अरब लोग सुरक्षित रूप से प्रबंधित स्वच्छता से वंचित हैं।
- 4 अरब लोग प्रत्येक वर्ष कम से कम एक माह के लिए गंभीर जल अभाव का सामना करते हैं।
- विश्व की लगभग 75% जनसंख्या उन देशों में निवास करती है जिन्हें जल-असुरक्षित या गंभीर रूप से जल-असुरक्षित वर्गीकृत किया गया है।
- विश्व 2030 तक स्वच्छ जल और स्वच्छता (SDG 6) लक्ष्य प्राप्त करने की दिशा से विचलित हो चुका है, और जोखिम वैश्विक, परस्पर जुड़े हुए तथा तीव्र होते जा रहे हैं।
- घटती जल भंडारण क्षमता और कृषि तनाव: लगभग तीन अरब लोग और वैश्विक खाद्य उत्पादन का आधा हिस्सा उन क्षेत्रों पर निर्भर है जहाँ कुल जल भंडारण (सतही जल, मृदा आर्द्रता, हिम, बर्फ एवं भूजल सहित) घट रहा है या अस्थिर है।
- 170 मिलियन हेक्टेयर से अधिक सिंचित कृषि भूमि उच्च या अत्यधिक उच्च जल तनाव का सामना कर रही है।
- साथ ही, वैश्विक कृषि भूमि का 50% से अधिक भाग मध्यम या गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त है, जिससे मृदा की आर्द्रता धारण क्षमता घट रही है और मरुस्थलीकरण तीव्र हो रहा है।
- लवणीयकरण ने 100 मिलियन हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि को और क्षतिग्रस्त कर दिया है, जिससे प्रमुख खाद्य उत्पादक क्षेत्रों में उत्पादन प्रभावित हुआ है।

- दृश्यमान वैश्विक परिणाम: नदियाँ महासागर तक पहुँचने से पहले ही सूख जाती हैं (जैसे, कोलोराडो, सिंधु, पीली नदी)।
- झीलें और हिमनद संकुचित हो रहे हैं (जैसे, अराल सागर, चाड झील, हिमालयी हिमनद)।
- अत्यधिक पंपिंग के कारण भूमि धंस रही है और भूजलभृत लवणीय हो रहे हैं।
- पारिस्थितिकी तंत्र के पतन से मरुस्थल और धूल भरी आँधियाँ फैल रही हैं।
- शहर ‘डे ज़ीरो’ परिदृश्य का सामना कर रहे हैं जहाँ नल सूख जाते हैं (जैसे, केप टाउन, चेन्नई, मेक्सिको सिटी)।
- अपरिवर्तनीयता और न्याय की चुनौतियाँ: रिपोर्ट इस बात पर बल देती है कि जल दिवालियापन पर्यावरणीय और न्याय-संबंधी दोनों मुद्दा है।
- कुछ क्षतियाँ (जैसे, भूजलभृत का संपीड़न, पारिस्थितिकी तंत्र का विलुप्त होना) अपरिवर्तनीय हैं।
- अन्य केवल असाधारण आर्थिक और समयगत लागत पर ही सुधारी जा सकती हैं।
- जल दिवालियापन का प्रबंधन समान भार-वितरण की माँग करता है, जिससे बुनियादी जल आवश्यकताओं तक पहुँच सुनिश्चित हो सके और आजीविका खोने वाले समुदायों को क्षतिपूर्ति दी जा सके।
- पुरानी वैश्विक जल शासन प्रणाली: रिपोर्ट वर्तमान वैश्विक जल एजेंडा की आलोचना करती है, जो मुख्यतः WASH (जल, स्वच्छता और स्वच्छता) लक्ष्यों; क्रमिक दक्षता सुधार; तथा सामान्यीकृत एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन (IWRM) ढाँचों पर केंद्रित है।
- ये दृष्टिकोण अब उस युग में उपयुक्त नहीं हैं जो अपरिवर्तनीय जल ह्रास और भू-राजनीतिक विखंडन से परिभाषित है।
- मानवजनित सूखा और आर्थिक हानि: सूखे अब मुख्यतः कारण और प्रभाव दोनों में मानवजनित हैं।
- 2022 एवं 2023 के बीच 1.8 अरब लोग सूखे की स्थिति में रहे, और वैश्विक सूखा-संबंधी क्षति $307 अरब प्रति वर्ष तक पहुँच गई, जो कई संयुक्त राष्ट्र सदस्य देशों के GDP से अधिक है।
- ये हानियाँ केवल वर्षा में कमी से नहीं, बल्कि दशकों की भूमि क्षति, भूजल के अत्यधिक दोहन और पुरानी जल अवसंरचना से भी उत्पन्न हुई हैं।
- हिममंडल संकट: 1970 से विश्व ने अपने हिमनद द्रव्यमान का 30% से अधिक खो दिया है, और कई पर्वत श्रृंखलाएँ आने वाले दशकों में हिमनदों को पूरी तरह खोने की दिशा में हैं।
- हिमनदों का विलुप्त होना उन 1.5 से 2 अरब लोगों को खतरे में डाल रहा है जो सिंधु, गंगा-ब्रह्मपुत्र, यांग्त्ज़ी, पीली नदी, अमू दरिया और एंडीज़ नदियों जैसे हिमनद-आधारित प्रणालियों पर निर्भर हैं।
जल दिवालियापन के पीछे के कारण
- जल संसाधनों का अत्यधिक दोहन
- जलवायु परिवर्तन और परिवर्तित जलविज्ञान
- प्रदूषण और जल गुणवत्ता का ह्रास
- प्राकृतिक जल अवसंरचना की हानि
- अस्थिर आर्थिक और शहरी विकास
- कमजोर शासन और विखंडित जल नीतियाँ
- जल वितरण में न्याय और समानता की उपेक्षा
मुख्य सुझाव और अनुशंसाएँ
- जल दिवालियापन को स्वीकार करना: सरकारों और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों को औपचारिक रूप से स्वीकार करना चाहिए कि कई क्षेत्र जल-दिवालिया हैं तथा जलवैज्ञानिक नवीकरण सीमाओं से परे संचालित हो रहे हैं।
- जल दिवालियापन के निदान हेतु वैज्ञानिक मानदंड और मापदंड स्थापित करने की आवश्यकता है, जिसमें नवीकरणीय प्रवाह, क्षय दर एवं पारिस्थितिक पतन का आकलन शामिल हो।
- जल शासन प्रणालियों का रूपांतरण: जल शासन को जल अधिकारों और उपयोग अपेक्षाओं को पुनः निर्धारित करना होगा, जैसे वित्तीय दिवालियापन ऋण एवं बैलेंस शीट को पुनः निर्धारित करता है।
- ‘जलवैज्ञानिक पुनर्गठन’ के तंत्र लागू किए जाएँ, जिससे जल का न्यायसंगत और सतत पुनर्वितरण विभिन्न क्षेत्रों में हो सके।
- साझा जल प्रणालियों के प्रबंधन हेतु स्थानीय, राष्ट्रीय और अंतरसीमाई संस्थानों के बीच समन्वय स्थापित किया जाए।
- न्याय और समानता पर ध्यान केंद्रित करना: दुर्लभता के समय भी बुनियादी मानव आवश्यकताओं और पर्यावरणीय प्रवाह को प्राथमिकता दी जाए।
- असुरक्षित जनसंख्या को असमान जल हानि से बचाने हेतु सामाजिक सुरक्षा, क्षतिपूर्ति और आजीविका संक्रमण कार्यक्रम लागू किए जाएँ।
- बेरोजगारी और विस्थापन रोकने हेतु सामाजिक सुरक्षा जाल एवं पुनःप्रशिक्षण कार्यक्रम बनाए जाएँ।
- स्थानीय समुदायों को जल निर्णय-निर्माण में कानूनी और सहभागितापूर्ण अधिकार दिए जाएँ।
- जलवैज्ञानिक और पारिस्थितिक पूंजी का पुनर्निर्माण: आर्द्रभूमि, बाढ़भूमि, भूजलभृत, वन और पीटलैंड्स की पुनर्स्थापना को प्राथमिकता दी जाए, जो प्राकृतिक भंडारण एवं शोधन प्रदान करते हैं।
- राष्ट्रीय जल रणनीतियों में पारिस्थितिकी-आधारित अनुकूलन (EbA) को एकीकृत किया जाए।
- भूजलभृत के अत्यधिक दोहन, नदियों के सीमा से अधिक मोड़ और आर्द्रभूमि रूपांतरण के विरुद्ध सख्त नियम लागू किए जाएँ।
- वैश्विक ढाँचों में जल दिवालियापन प्रबंधन का एकीकरण: जल दिवालियापन सिद्धांतों को SDG 6 में समाहित किया जाए और उन्हें जलवायु (SDG 13), जैव विविधता (SDG 15) एवं शांति (SDG 16) लक्ष्यों से जोड़ा जाए।
- वैश्विक एजेंडा और संधियों के साथ एकीकरण: रिपोर्ट जल शासन को रियो संधियों (जलवायु, जैव विविधता, मरुस्थलीकरण) के साथ संरेखित करने और वैश्विक उत्तर-दक्षिण, शहरी-ग्रामीण तथा राजनीतिक विभाजनों को समाप्त करने के प्रयासों पर बल देती है।
- जल को ‘पुल क्षेत्र’ के रूप में स्थापित किया जाना चाहिए ताकि बहुपक्षवाद के वैश्विक विखंडन के बीच सहयोग का पुनर्निर्माण हो सके।
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