पाठ्यक्रम: GS2/अंतर्राष्ट्रीय संबंध; GS3/अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- भारत की समुद्री नीति ने महत्वपूर्ण विकास किया है, जो इसके ऐतिहासिक और भौगोलिक संदर्भ से गंभीर रूप से जुड़ा हुआ है, जैसा कि ‘रूटलेज हैंडबुक ऑफ़ मैरीटाइम इंडिया’ में विवेचित है।
परिचय
- यह हैंडबुक भारत के समृद्ध समुद्री इतिहास और हिंद महासागर में इसकी रणनीतिक साझेदारियों पर प्रकाश डालती है।
- इसमें विभिन्न विद्वानों द्वारा लिखे गए पाँच निबंध शामिल हैं, जो भारत की बाहरी पहुँच के ऐतिहासिक विकास का पता लगाते हैं, विशेष रूप से चोल, मराठा, यूरोपीय और इंडो-अरब समुद्री व्यापार पर केंद्रित।
भारत का समुद्री इतिहास
- प्रारंभिक काल: भारत के समुद्री इतिहास की शुरुआत 3000 ईसा पूर्व से होती है। इस समय सिंधु घाटी सभ्यता के निवासी मेसोपोटामिया के साथ समुद्री व्यापारिक संबंध रखते थे।
- दक्षिणी राजवंश: चोल, चेर और पांड्य शक्तिशाली प्रायद्वीपीय भारतीय राजवंश थे जिनके सुमात्रा, जावा, मलय प्रायद्वीप एवं चीन के साथ सुदृढ़ समुद्री व्यापारिक संबंध थे।
- अरब: 8वीं शताब्दी ईस्वी तक अरब व्यापारी बड़ी संख्या में समुद्र के रास्ते भारत आने लगे। समय के साथ, आधुनिक पश्चिम एशिया के कई हिस्से यूरोप, दक्षिण-पूर्व एशिया और भारत के बीच व्यापार के केंद्र बिंदु बन गए।
- यूरोपियों का आगमन: 1498 में पुर्तगाली अन्वेषक वास्को-दा-गामा के कालीकट आगमन ने यूरोप से भारत तक एक नया और सीधा समुद्री मार्ग खोला।
- मराठों की समुद्री शक्ति: मराठों ने भारतीय तटों पर ब्रिटिश नियंत्रण के विरुद्ध सबसे सुदृढ़ प्रतिरोध दिया।
- छत्रपति शिवाजी महाराज प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने एक शक्तिशाली नौसेना की आवश्यकता को पहचाना। उन्होंने विजयदुर्ग और सिंधुदुर्ग जैसे तटीय किलों का निर्माण किया तथा सिद्दी और पुर्तगालियों के विरुद्ध रक्षा को सुदृढ़ किया।
- उनके नेतृत्व में मराठा नौसेना 500 से अधिक जहाजों तक बढ़ी और 40 वर्षों से अधिक समय तक पुर्तगालियों एवं ब्रिटिशों दोनों को रोके रखा।
- स्वतंत्रता पश्चात: 22 अप्रैल 1958 को वाइस एडमिरल आर.डी. कटारी प्रथम भारतीय नौसेना प्रमुख बने।
- 26 जनवरी 1950 को भारत के गणराज्य बनने के बाद नौसेना ने “रॉयल” उपसर्ग को हटा दिया और इसे भारतीय नौसेना नाम दिया गया।
भारत का समुद्री क्षेत्र
- भारत का समुद्री क्षेत्र उन समुद्री सीमाओं और क्षेत्रों को संदर्भित करता है जो इसके अधिकार क्षेत्र में आते हैं।
- भारत की तटरेखा द्वीपीय क्षेत्रों सहित 11,000 किलोमीटर से अधिक फैली हुई है।
- हिंद महासागर क्षेत्र: हिंद महासागर विश्व के कुल महासागर क्षेत्र का लगभग पाँचवाँ हिस्सा है।
- यह उत्तर में ईरान, पाकिस्तान, भारत एवं बांग्लादेश; पूर्व में मलय प्रायद्वीप, इंडोनेशिया के सुंडा द्वीप एवं ऑस्ट्रेलिया; दक्षिण में दक्षिणी महासागर; और पश्चिम में अफ्रीका तथा अरब प्रायद्वीप से घिरा हुआ है।

- समुद्री सुरक्षा: यह राष्ट्र की संप्रभुता को समुद्रों और महासागरों से उत्पन्न खतरों से बचाने से संबंधित है।
- खतरों में तटीय क्षेत्रों की रक्षा, उपलब्ध समुद्री संसाधनों जैसे मछली, अपतटीय तेल और गैस कुएँ, बंदरगाह सुविधाएँ आदि की सुरक्षा शामिल है।
हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) का महत्व
- भू-रणनीतिक महत्व: हिंद महासागर तीसरा सबसे बड़ा महासागर है, जो मध्य पूर्व, अफ्रीका, दक्षिण एशिया एवं दक्षिण-पूर्व एशिया को जोड़ता है।
- यह महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों का केंद्र है — होर्मुज जलडमरूमध्य, बाब-एल-मंदेब, मलक्का जलडमरूमध्य, लोम्बोक जलडमरूमध्य — जो वैश्विक ऊर्जा और व्यापार प्रवाह का बड़ा भाग संभालते हैं।
- IOR पूर्व और पश्चिम के बीच एक पुल के रूप में कार्य करता है, जिससे यह भारत, चीन, अमेरिका और अन्य प्रमुख शक्तियों के बीच शक्ति प्रतिस्पर्धा का केंद्रीय क्षेत्र बन जाता है।
- आर्थिक महत्व: यह क्षेत्र लगभग 50% वैश्विक कंटेनर यातायात और 80% समुद्री तेल व्यापार को वहन करता है।
- यह ब्लू इकोनॉमी गतिविधियों का केंद्र है: शिपिंग, मत्स्य पालन, समुद्र-तल खनन और पर्यटन।
- ऊर्जा सुरक्षा: IOR वैश्विक ऊर्जा प्रवाह की जीवनरेखा है: पश्चिम एशिया से तेल और गैस इसके समुद्री मार्गों से पूर्व एशिया तक पहुँचते हैं।
- भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश ऊर्जा आयात पर निर्भर हैं, जिससे IOR की स्थिरता अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।
- ब्लू इकोनॉमी की संभावनाएँ: IOR मत्स्य पालन, समुद्र-तल खनिज, नवीकरणीय ऊर्जा और पर्यटन में अवसर प्रदान करता है — जिसके लिए सुरक्षित समुद्रों की आवश्यकता है ताकि सतत दोहन सुनिश्चित हो सके।
IOR में समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने की आवश्यकता
- इंडो-पैसिफिक संरचना: इंडो-पैसिफिक भारतीय और प्रशांत महासागरों को एक रणनीतिक क्षेत्र में जोड़ता है तथा नए वैश्विक समुद्री व्यवस्था को आकार देने में IOR की केंद्रीयता को उजागर करता है।
- यह भौगोलिक पुनर्कल्पना वैश्विक कूटनीति और सुरक्षा में IOR की दृश्यता को बढ़ाती है।
- वैश्विक व्यवस्था के लिए निहितार्थ: IOR पर नियंत्रण निम्नलिखित को प्रभावित कर सकता है:
- व्यापार प्रवाह (विशेषकर तेल और गैस)
- रणनीतिक समुद्री मार्ग (जैसे होर्मुज, मलक्का, बाब-एल-मंदेब)
- सैन्य तैनाती और अड्डों की लॉजिस्टिक्स
- भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा: प्रमुख शक्तियों की गतिविधियाँ (विशेषकर चीन की बढ़ती उपस्थिति और अवसंरचना निवेश) रणनीतिक संतुलन को बदलती हैं।
- विखंडित समुद्री शासन: कई तटीय राज्यों में निगरानी, कानून प्रवर्तन और मानवीय/आपदा प्रतिक्रिया (HADR) की क्षमता का अभाव है।
- विविध विषम खतरे: अवैध, अनियमित और अपंजीकृत (IUU) मत्स्य पालन, तस्करी, समुद्री डकैती का पुनरुत्थान एवं वाणिज्यिक शिपिंग पर हमले सुरक्षा को जटिल बनाते हैं।
IOR में चुनौतियाँ
- चीन की नौसैनिक शक्ति का विस्तार: क्षेत्र में चीनी नौसैनिक जहाजों की तैनाती संख्या और अवधि दोनों में बढ़ी है।
- चीनी अनुसंधान और सर्वेक्षण जहाजों की तैनाती: वैज्ञानिक अनुसंधान के नाम पर संवेदनशील समुद्री और महासागरीय डेटा एकत्र करना।
- समुद्री डकैती: अफ्रीका के हॉर्न और मलक्का जलडमरूमध्य के पास समुद्री डकैती शिपिंग को खतरे में डालती है।
- आतंकवाद और तस्करी: आतंकवाद, हथियारों की तस्करी और नेटवर्क समुद्री सीमाओं की कमजोरी का लाभ उठाते हैं।
- रणनीतिक बंदरगाह विकास: चीन IOR के तटीय राज्यों में बंदरगाह और अवसंरचना विकसित करने में सक्रिय है, जिनमें भारत की समुद्री सीमाओं के निकट वाले भी शामिल हैं।
- यह चीन के दीर्घकालिक समुद्री शक्ति बनने के लक्ष्य के अनुरूप है।
सरकारी पहलें
- सागरमाला कार्यक्रम: भारत की तटरेखा और नौगम्य जलमार्गों का लाभ उठाने पर केंद्रित।
- बंदरगाह अवसंरचना, तटीय विकास और संपर्क को समर्थन देता है।
- तटीय बर्थ, रेल/सड़क संपर्क, मछली बंदरगाह, क्रूज़ टर्मिनल जैसी परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करता है।
- मेरीटाइम इंडिया विज़न 2030 (MIV 2030): 2030 तक भारत को शीर्ष 10 जहाज निर्माण राष्ट्रों में शामिल करने और विश्वस्तरीय, कुशल एवं सतत समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र बनाने का लक्ष्य।
- सागरमंथन संवाद: वार्षिक समुद्री रणनीतिक संवाद, भारत को वैश्विक समुद्री वार्तालापों का केंद्र बनाने हेतु।
- समुद्री विकास कोष: ₹25,000 करोड़ का कोष, बंदरगाह और शिपिंग अवसंरचना को आधुनिक बनाने के लिए दीर्घकालिक वित्तपोषण, निजी निवेश को प्रोत्साहित करता है।
- MAHASAGAR पहल: क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास हेतु पारस्परिक एवं समग्र प्रगति) IOR में भारत की रणनीतिक पुनर्ब्रांडिंग को दर्शाता है।
- नौसैनिक आधुनिकीकरण और स्वदेशी विकास: भारत नौसैनिक क्षमताओं का आधुनिकीकरण कर रहा है:
- स्वदेशी युद्धपोतों का कमीशनिंग (जैसे INS विक्रांत, INS विशाखापत्तनम)।
- समुद्री क्षेत्र जागरूकता और शक्ति प्रक्षेपण को बढ़ाना।
- यह IOR में भारत की सैन्य स्थिति और समुद्री प्रतिरोधक क्षमता को सुदृढ़ करता है।
- भारत की प्रतिक्रिया और क्षेत्रीय कूटनीति: भारत क्षेत्रीय साझेदारों के साथ मिलकर चीनी अवसंरचना परियोजनाओं के दीर्घकालिक प्रभावों के बारे में जागरूकता बढ़ा रहा है।
- यह चीन द्वारा वित्तपोषित अवसंरचना के सैन्य उपयोग से आंतरिक और क्षेत्रीय सुरक्षा को होने वाले जोखिमों पर बल देता है।
- IOR का सैन्यीकरण पर भारत का दृष्टिकोण: भारत का कहना है कि हिंद महासागर क्षेत्र का सैन्यीकरण वांछनीय नहीं है और यह हिंद महासागर तथा व्यापक इंडो-पैसिफिक में सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा।
- यह IOR में चीनी वित्तपोषित अवसंरचना के सैन्य उपयोग के विरुद्ध भारत की स्थिति को दर्शाता है।
निष्कर्ष
- भारत की समुद्री सुरक्षा पहलें सैन्य क्षमता, अवसंरचना तत्परता, क्षेत्रीय साझेदारियों और कानूनी-संस्थागत ढाँचों का मिश्रण दर्शाती हैं।
- एक्ट ईस्ट पॉलिसी, इंडो-पैसिफिक विजन और ब्लू इकोनॉमी जैसी पहलें IOR में भारत की केंद्रीयता को सुदृढ़ करती हैं।
स्रोत: TH