पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- भारत और माली के संयुक्त राष्ट्र स्थित स्थायी मिशनों ने विश्व कपास दिवस के अवसर पर संयुक्त राष्ट्र में “सततता के लिए कपास: आजीविका, मूल्य संवर्धन और साझेदारी” विषय पर एक कार्यक्रम का संयुक्त रूप से आयोजन किया।
विश्व कपास दिवस
- संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 7 अक्टूबर को विश्व कपास दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की थी।
- विश्व कपास दिवस मनाने का विचार ‘कॉटन फोर’ (Cotton Four) देशों—बुर्किना फासो, बेनिन, चाड और माली—द्वारा प्रस्तुत किया गया था। इसका उद्देश्य कपास के उप-उत्पादों तथा उनके बाजारों को बढ़ावा देना था।
- ये चारों देश उप-सहारा अफ्रीका के प्रमुख कपास उत्पादक एवं निर्यातक देशों में शामिल हैं।
- विश्व कपास दिवस का पहला आयोजन 7 अक्टूबर, 2019 को जिनेवा में किया गया था।
भारत में कपास का उत्पादन
- कपास का वैश्विक रेशे के कुल उत्पादन में लगभग 23% योगदान है।
- भारत में इसके आर्थिक महत्त्व के कारण इसे “सफेद सोना” भी कहा जाता है।

- भारत विश्व का एकमात्र देश है, जहाँ कपास की सभी चार मान्यता प्राप्त प्रजातियों की खेती की जाती है। इनमें जी. आर्बोरियम और जी. हर्बेशियम शामिल हैं, जिन्हें सामान्यतः एशियाई कपास कहा जाता है।
- भारत में कपास का उत्पादन मुख्यतः नौ प्रमुख राज्यों में केंद्रित है, जिन्हें तीन विशिष्ट कृषि-पारिस्थितिक क्षेत्रों में विभाजित किया गया है:
- उत्तरी क्षेत्र: पंजाब, हरियाणा और राजस्थान।
- मध्य क्षेत्र: गुजरात, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश।
- दक्षिणी क्षेत्र: तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक।
- इन राज्यों के अतिरिक्त ओडिशा और तमिलनाडु में भी कपास की खेती की जाती है।

- बीटी कपास : Bt का आशय बैसिलस थुरिंगिएंसिस नामक प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले मृदा जीवाणु से है। इसके जीन कपास की फसल को बॉलवर्म (गेंद छेदक कीट) के विरुद्ध प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करते हैं। यह कीट कपास की खेती को प्रभावित करने वाले प्रमुख कीटों में से एक है।
- भारत में वर्ष 2002 में बीटी कपास को व्यावसायिक रूप से अपनाया गया। इससे बॉलवर्म के प्रकोप में उल्लेखनीय कमी आई तथा कीटनाशकों के छिड़काव की आवश्यकता भी कम हुई।
भारत का कपास निर्यात
- वर्ष 2024-25 में भारत का वैश्विक कपास निर्यात में 3.37% योगदान रहा। इसी अवधि में भारत का कपास उत्पादन 541.69 लाख गांठ (लगभग 9.21 मिलियन मीट्रिक टन) रहा।
- वित्तीय वर्ष 2024-25 में मूल्य के आधार पर कपास निर्यात 11.49 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया।
- भारतीय सूती कपड़ों एवं उनसे निर्मित उत्पादों के निर्यात के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका सबसे बड़ा गंतव्य रहा, जिसके बाद बांग्लादेश का स्थान था।
- अन्य प्रमुख निर्यात गंतव्यों में यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त अरब अमीरात शामिल थे।
कपास क्षेत्र के समक्ष चुनौतियाँ
- कम उत्पादकता: भारत में कपास की उत्पादकता छोटी एवं बिखरी हुई जोतों, अपर्याप्त सिंचाई, कुछ क्षेत्रों में निम्न गुणवत्ता वाले बीजों तथा आधुनिक कृषि पद्धतियों को सीमित रूप से अपनाए जाने के कारण प्रभावित होती है।
- जलवायु परिवर्तन: अनियमित मानसून, बढ़ता तापमान, सूखा और बेमौसम वर्षा कपास की उपज तथा रेशे की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं।
- कीट एवं रोगों का प्रकोप: गुलाबी बॉलवर्म, सफेद मक्खी तथा अन्य कीटों के कारण फसल को काफी हानि होती है और किसानों का कीटनाशकों पर होने वाला व्यय बढ़ जाता है।
- गुणवत्ता संबंधी समस्याएँ: कटाई, भंडारण और परिवहन के दौरान कपास में अशुद्धियाँ मिलने तथा रेशे की गुणवत्ता में असमानता के कारण प्रीमियम बाजारों में भारतीय कपास की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता प्रभावित होती है।
- बीज प्रौद्योगिकी से संबंधित समस्याएँ: अधिक उपज देने वाली, कीट-प्रतिरोधी और जलवायु-अनुकूल किस्मों की सीमित उपलब्धता तथा वर्तमान बीज प्रौद्योगिकियों की लागत एवं प्रभावशीलता से जुड़ी चिंताएँ उत्पादकता को प्रभावित करती हैं।
कपास क्षेत्र को समर्थन देने हेतु सरकारी पहलें
- न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के माध्यम से कपास किसानों को सुदृढ़ करना: वर्ष 2026-27 के लिए मध्यम रेशे वाली कपास का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाकर ₹8,267 प्रति क्विंटल तथा लंबे रेशे वाली कपास का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाकर ₹8,667 प्रति क्विंटल कर दिया गया। दोनों किस्मों के MSP में ₹557 प्रति क्विंटल की वृद्धि की गई।
- कपास उत्पादकता मिशन : वर्ष 2025-26 में पाँच वर्षीय कपास उत्पादकता मिशन शुरू किया गया, जिसका उद्देश्य देशभर में कपास उत्पादन को सुदृढ़ करना है।
- इस मिशन के अंतर्गत जलवायु-अनुकूल, कीट-प्रतिरोधी और अधिक उपज देने वाली कपास की किस्मों का विकास किया जाएगा।
- वर्ष 2031 तक कपास उत्पादन को 297 लाख गांठ से बढ़ाकर 498 लाख गांठ करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
- राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के अंतर्गत कपास पर विशेष परियोजना: इस परियोजना का उद्देश्य विभिन्न कृषि-पारिस्थितिक क्षेत्रों के अनुकूल प्रौद्योगिकियों का बड़े पैमाने पर प्रदर्शन करना है। इसके अंतर्गत देश के प्रमुख कपास उत्पादक राज्यों को शामिल किया गया है।
- इसका प्रमुख उद्देश्य उत्पादकता, रेशे की गुणवत्ता तथा किसानों की आय में वृद्धि करना है।
- कपास किसान ऐप: न्यूनतम समर्थन मूल्य व्यवस्था के अंतर्गत कपास की खरीद प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने के लिए यह मोबाइल एप्लिकेशन शुरू किया गया है। इसके माध्यम से कपास उत्पादक किसान स्वयं का पंजीकरण कर सकते हैं तथा कपास की खरीद के लिए समय-सीमा निर्धारित कर अपना स्लॉट बुक कर सकते हैं।
- भारतीय कपास की ब्रांडिंग — कस्तूरी कॉटन भारत : इस पहल का उद्देश्य पता लगाने की क्षमता, प्रमाणन और ब्रांडिंग के माध्यम से भारतीय कपास का मूल्य बढ़ाना तथा वैश्विक बाजार में उसकी स्थिति को सुदृढ़ करना है।
निष्कर्ष
- कपास की उत्पादकता बढ़ाने, किसानों की आय को सुदृढ़ करने, खरीद प्रक्रिया का आधुनिकीकरण करने तथा वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता में सुधार लाने के प्रयासों से एक अधिक सुदृढ़ एवं टिकाऊ कपास पारिस्थितिकी तंत्र का विकास हो रहा है।
- गुणवत्ता, सततता और मूल्य संवर्धन को बढ़ावा देने वाली नई पहलों के विस्तार से कपास क्षेत्र आने वाले वर्षों में आजीविका सृजन, औद्योगिक विकास तथा आर्थिक वृद्धि में महत्त्वपूर्ण योगदान देने की दिशा में अग्रसर है।
स्रोत: PIB
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