पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- हाल ही में आर्थिक मामलों के विभाग (DEA) ने तीन-वर्षीय सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) परियोजना पाइपलाइन का अनावरण किया है, जिसका उद्देश्य पूरे भारत में बुनियादी ढांचे के विकास को सुव्यवस्थित करना है।
| पाइपलाइन का पैमाना और दायरा – वित्त मंत्रालय के अनुसार, वर्तमान पाइपलाइन में केंद्रीय बुनियादी ढांचा मंत्रालयों, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कुल 852 परियोजनाएँ शामिल हैं, जिनकी अनुमानित लागत ₹17 लाख करोड़ से अधिक है। – ये परियोजनाएँ परिवहन, ऊर्जा, जल प्रबंधन, शहरी विकास और सामाजिक बुनियादी ढाँचे जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में फैली हुई हैं। |
भारत में बुनियादी ढांचा निवेश मॉडल के बारे में
- बुनियादी ढांचा वित्तपोषण का विकास: प्रारंभिक निवेश मुख्य रूप से बजटीय सहायता पर निर्भर था।
- लेकिन उदारीकरण के बाद सुधारों ने PPP मॉडल के माध्यम से निजी पूंजी भागीदारी का मार्ग खोला।
- इसके बाद राष्ट्रीय बुनियादी ढांचा पाइपलाइन (NIP), राष्ट्रीय निवेश और बुनियादी ढांचा कोष (NIIF) और बुनियादी ढांचा और विकास के लिए राष्ट्रीय बैंक (NaBFID) जैसी संस्थागत नवाचारों को वित्तीय अंतराल को समाप्त करने के लिए डिज़ाइन किया गया।
प्रमुख बुनियादी ढांचा निवेश मॉडल
- सार्वजनिक–निजी भागीदारी (PPP) मॉडल: इसमें सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्र वित्तपोषण, निर्माण और रखरखाव की जिम्मेदारियाँ साझा करते हैं।
- यह सड़क, हवाई अड्डा और शहरी जल क्षेत्रों में महत्वपूर्ण रहा है।
- PPP के प्रमुख उप-मॉडल:
- बिल्ड-ऑपरेट-ट्रांसफर (BOT): निजी भागीदार एक सुविधा का निर्माण और संचालन करता है तथा निर्दिष्ट अवधि के बाद इसे सरकार को हस्तांतरित करता है।
- यह सड़क टोल परियोजनाओं और कुछ परिवहन परिसंपत्तियों में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।
- BOT-एन्युइटी: सरकार निजी डेवलपर को वाणिज्यिक संचालन शुरू होने के बाद नियमित एन्युइटी भुगतान करती है, जिससे प्रारंभिक राजस्व जोखिम कम होता है।
- हाइब्रिड एन्युइटी मॉडल (HAM): सरकार और निजी वित्तपोषण का मिश्रण; सामान्यतः निर्माण के दौरान 40% सरकार द्वारा भुगतान किया जाता है तथा शेष राशि डेवलपर द्वारा एकत्रित की जाती है।
- बिल्ड-ऑपरेट-ट्रांसफर (BOT): निजी भागीदार एक सुविधा का निर्माण और संचालन करता है तथा निर्दिष्ट अवधि के बाद इसे सरकार को हस्तांतरित करता है।
- इंजीनियरिंग, प्रोक्योरमेंट और कंस्ट्रक्शन (EPC) मॉडल: इसमें सरकार वित्तपोषण की जिम्मेदारी उठाती है लेकिन निष्पादन निजी संस्थाओं को सौंपा जाता है।
- यह देरी को कम करता है और दक्षता में सुधार करता है।
- इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स (InvITs) और रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स (REITs): इनका उद्देश्य पूंजी बाजार को सुदृढ़ करना और संस्थागत निवेशों को बुनियादी ढांचा व रियल एस्टेट परिसंपत्तियों में प्रवाहित करना है।
- ये निवेश साधन घरेलू और विदेशी निवेशकों को दीर्घकालिक वित्तपोषण में भाग लेने की अनुमति देते हैं।
- एसेट मोनेटाइजेशन और हाइब्रिड मॉडल: भारत वर्तमान सार्वजनिक परिसंपत्तियों से मूल्य निकालने के लिए राष्ट्रीय मोनेटाइजेशन पाइपलाइन (ब्राउनफील्ड परिसंपत्तियों का मोनेटाइजेशन) के माध्यम से निवेश मॉडल में विविधता ला रहा है।
- यह एक रणनीति है जिसमें परिचालन बुनियादी ढांचे को निजी निवेशकों को एक निश्चित अवधि के लिए पट्टे पर दिया जाता है, जिससे पुनर्निवेश के लिए अग्रिम राजस्व उत्पन्न होता है।
PPPs के लिए सहायक तंत्र
- वायबिलिटी गैप फंडिंग (VGF) योजना: यह आर्थिक रूप से उचित लेकिन वित्तीय रूप से अव्यवहार्य परियोजनाओं को निजी निवेशकों के लिए आकर्षक बनाने हेतु वित्तीय सहायता प्रदान करती है। इसे आर्थिक मामलों का विभाग लागू करता है।
- मॉडल कंसेशन एग्रीमेंट्स: परिवहन या लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों के लिए नीति आयोग द्वारा विकसित मानकीकृत कानूनी ढाँचे, ताकि निवेश की निश्चितता बढ़े।
- राष्ट्रीय PPP नीति ढाँचे: आर्थिक मामलों के विभाग में निजी निवेश इकाई जैसी नीति इकाइयाँ PPP रणनीतियों को तैयार करने और प्रबंधित करने में सहायता करती हैं।
संबंधित चिंताएँ और मुद्दे
- वित्तीय और फंडिंग चुनौतियाँ:
- उच्च पूंजी तीव्रता: राजमार्ग, रेलवे, हवाई अड्डे जैसी परियोजनाओं में बड़े प्रारंभिक निवेश की आवश्यकता होती है, जिनका रिटर्न दशकों में मिलता है। यह तीव्र रिटर्न चाहने वाले निजी निवेशकों को हतोत्साहित करता है।
- तनावग्रस्त बैंकिंग क्षेत्र: भारतीय बैंक, विशेषकर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक (PSBs), रुकी हुई परियोजनाओं के कारण उच्च गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPAs) का सामना कर चुके हैं।
- सीमित दीर्घकालिक वित्त: भारत में पर्याप्त दीर्घकालिक ऋण साधन (जैसे पेंशन और बीमा कोष की भागीदारी) की कमी है, जिससे बैंकों पर अत्यधिक निर्भरता होती है।
- PPP मॉडलों में समस्याएँ: नीति आयोग के अनुसार, कई PPP परियोजनाएँ खराब संरचना और कमजोर विवाद समाधान के कारण विफल हुईं।
- जोखिम आवंटन समस्याएँ: कई PPP परियोजनाओं में जोखिमों का गलत आवंटन हुआ, जहाँ निजी खिलाड़ियों को भूमि अधिग्रहण, नियामक अनुमोदन और यातायात मांग से संबंधित जोखिम उठाने पड़े।
- अत्यधिक आशावादी अनुमान: यातायात और राजस्व अनुमानों को प्रायः कागज़ पर परियोजनाओं को वित्तीय रूप से व्यवहार्य दिखाने के लिए बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जाता है, जिससे निर्माण के बाद संकट उत्पन्न होता है।
- संविदात्मक विवाद: अस्पष्ट कंसेशन एग्रीमेंट्स सरकार और निजी ठेकेदारों के बीच बार-बार विवाद उत्पन्न करते हैं।
- भूमि अधिग्रहण और पर्यावरणीय मुद्दे:
- भूमि अधिग्रहण में देरी सबसे बड़ी बाधाओं में से एक है, जो कानूनी विवादों, पुनर्वास और पुनर्स्थापन चुनौतियों तथा स्थानीय विरोध के कारण होती है।
- पर्यावरणीय मंज़ूरी: परियोजनाएँ प्रायः लंबी पर्यावरणीय प्रभाव आकलन और मुकदमों के कारण विलंबित होती हैं, विशेषकर खनन, सड़क एवं विद्युत क्षेत्रों में।
- नियामक और नीतिगत अनिश्चितता:
- खंडित संस्थागत ढाँचा: कई मंत्रालय, राज्य सरकारें और स्थानीय निकाय शामिल होते हैं, जिससे समन्वय विफलताएँ होती हैं।
- बार-बार नीतिगत बदलाव: प्रतिगामी कराधान, टैरिफ पुन: वार्ता और कंसेशन शर्तों में बदलाव नीति अनिश्चितता उत्पन्न करते हैं।
- कमज़ोर नियामक निकाय: विद्युत और शहरी बुनियादी ढाँचे जैसे क्षेत्रों में नियामक प्रायः स्वायत्तता एवं प्रवर्तन क्षमता की कमी रखते हैं।
- शासन और संस्थागत कमज़ोरियाँ:
- कमज़ोर परियोजना तैयारी: खराब व्यवहार्यता अध्ययन और अपर्याप्त तकनीकी आकलन लागत एवं समय में वृद्धि का कारण बनते हैं।
- भ्रष्टाचार और पारदर्शिता की कमी: बोली, अनुबंध पुरस्कार और नियामक अनुमोदनों में भ्रष्टाचार की धारणा निवेशकों के विश्वास को कमजोर करती है।
- संचालन और रखरखाव (O&M) मुद्दे:
- ध्यान प्रायः परिसंपत्ति निर्माण पर होता है, न कि जीवनचक्र रखरखाव पर।
- खराब O&M परिसंपत्ति की गुणवत्ता और दीर्घकालिक रिटर्न को कम करता है।
- शहरी बुनियादी ढाँचे (जल आपूर्ति, सीवेज) पर इसका विशेष प्रभाव पड़ता है।
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