चोलकालीन मूर्तियाँ तमिलनाडु में उत्खनन के दौरान प्राप्त
पाठ्यक्रम: GS1 / कला एवं संस्कृति
चर्चा में क्यों?
- तमिलनाडु राज्य पुरातत्व विभाग (TNSDA) ने नागपट्टिनम में जारी उत्खनन के दौरान भगवान नटराज एवं देवी शिवगामी की कांस्य मिश्रधातु से निर्मित मूर्तियों के साथ उनके संबंधित पीठिकाओं को प्राप्त किया है।
चोल वंश
- चोल वंश 10वीं से 13वीं शताब्दी के दौरान प्रायद्वीपीय भारत की एक प्रमुख राजनीतिक शक्ति था।
- राजराज प्रथम, राजेंद्र प्रथम एवं राजाधिराज प्रथम जैसे शासकों के नेतृत्व में चोलों ने श्रीलंका एवं दक्षिण-पूर्व एशिया में सैन्य विजयों के माध्यम से अपने साम्राज्य का विस्तार किया।
- उपजाऊ कावेरी डेल्टा पर उनका नियंत्रण उनकी आर्थिक समृद्धि का एक प्रमुख आधार था। इससे कृषि, व्यापार एवं नगरीय विकास को प्रोत्साहन मिला।
- चोल अर्थव्यवस्था का आधार नागरम नामक वाणिज्यिक नगर थे, जो व्यापारी समूहों को धार्मिक संस्थानों से जोड़ते थे।
- मंदिरों, विशेषकर ब्राह्मणवादी मंदिरों ने धार्मिक अनुष्ठानों एवं विलासिता से संबंधित वस्तुओं की माँग उत्पन्न करके क्षेत्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय व्यापार को प्रोत्साहित किया।
- मंदिर आधारित नगरीकरण : इससे तात्पर्य मंदिरों, व्यापार एवं नगरों के विकास के बीच विद्यमान घनिष्ठ संबंध से है।

हाल ही में प्राप्त मूर्तियाँ
- भगवान नटराज की मूर्ति: इसमें भगवान नटराज को ‘आनंद तांडव’ की मुद्रा में दर्शाया गया है। इस मूर्ति की चार भुजाएँ हैं तथा इसकी ऊँचाई 110 सेंटीमीटर और चौड़ाई 100 सेंटीमीटर है।
- देवी शिवगामी की मूर्ति: इसमें देवी को ‘त्रिभंग’ मुद्रा में दर्शाया गया है। इस मूर्ति की दो भुजाएँ हैं तथा इसकी ऊँचाई 82 सेंटीमीटर और चौड़ाई 23 सेंटीमीटर है।
प्रमुख विशेषताएँ
- मूर्तियों की भौतिक संरचना, प्रतिमा विज्ञान संबंधी विशेषताओं , अलंकरण की शैली एवं पीठिकाओं के निर्माण के आधार पर इनके 12वीं शताब्दी ईस्वी का होने का अनुमान लगाया गया है।
- ये मूर्तियाँ चोल काल से संबंधित हैं तथा इन्हें लगभग एक मीटर की गहराई पर उत्खनन के दौरान प्राप्त किया गया है।
इस खोज का महत्त्व
- ये खोजें चोल काल के दौरान नागपट्टिनम में प्रचलित धार्मिक प्रथाओं, कला एवं धातु मूर्तिकला के इतिहास को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण पुरातात्त्विक साक्ष्य प्रदान करती हैं।
स्रोत: TH
राष्ट्रीय एकता दिवस
पाठ्यक्रम: GS1 / इतिहास; विविध
संदर्भ
- राष्ट्रीय एकता दिवस प्रतिवर्ष 31 अक्टूबर को मनाया जाता है।
राष्ट्रीय एकता दिवस के बारे में
- इस दिवस की शुरुआत वर्ष 2014 में की गई थी। यह भारत के प्रथम उपप्रधानमंत्री एवं गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती के अवसर पर मनाया जाता है।
- सरदार पटेल ने वी.पी. मेनन के साथ मिलकर कूटनीति एवं वार्ता के माध्यम से 560 से अधिक देशी रियासतों का भारतीय संघ में एकीकरण करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
- वर्ष 2026 की थीम: ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ , जो राष्ट्रीय एकीकरण एवं विविधता में एकता की भावना को रेखांकित करती है।
क्या आप जानते हैं?
- केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) द्वारा वर्ष 2019 में सरदार पटेल राष्ट्रीय एकता पुरस्कार की स्थापना की गई थी।
- इसका उद्देश्य राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता को बढ़ावा देने की दिशा में उत्कृष्ट योगदान देने वाले व्यक्तियों को सम्मानित करना है।
स्रोत: AIR
राजकोषीय घाटा
पाठ्यक्रम: GS3 / अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- पूंजीगत व्यय एवं सब्सिडी पर सरकारी व्यय में निरंतर वृद्धि के कारण वित्त वर्ष 2026-27 (FY27) की प्रथम छमाही में भारत का राजकोषीय घाटा बढ़ गया।
परिचय
- सितंबर के अंत तक राजकोषीय घाटा 7.14 ट्रिलियन रुपये (7.14 लाख करोड़ रुपये) तक पहुँच गया, जो पूरे वित्त वर्ष के बजट अनुमान का 42.1% है।
- वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही में ही बजट में निर्धारित राजकोषीय घाटे का अपेक्षाकृत बड़ा हिस्सा व्यय हो जाना सरकार के राजकोषीय संतुलन पर बढ़ते दबाव को दर्शाता है।
- केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए राजकोषीय घाटे का लक्ष्य 16.96 ट्रिलियन रुपये (16.96 लाख करोड़ रुपये) अथवा GDP का 4.3% निर्धारित किया है।
- इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सरकार आगामी महीनों में सुदृढ़ कर संग्रह एवं गैर-कर राजस्व में वृद्धि पर निर्भर है।
राजकोषीय घाटा क्या है?
- राजकोषीय घाटा किसी वित्तीय वर्ष के दौरान सरकार के कुल बजटीय व्यय (राजस्व एवं पूंजीगत व्यय) और कुल बजटीय प्राप्तियों (राजस्व एवं पूंजीगत प्राप्तियाँ) के बीच का अंतर है, जिसमें उधार को कुल प्राप्तियों में शामिल नहीं किया जाता है।
- राजकोषीय घाटे का सूत्र: राजकोषीय घाटा = कुल व्यय – (राजस्व प्राप्तियाँ + ऋणेतर पूंजीगत प्राप्तियाँ)
राजकोषीय घाटे के प्रभाव
- मुद्रास्फीतिक दबाव : निरंतर उच्च राजकोषीय घाटा मुद्रास्फीति को बढ़ावा दे सकता है, क्योंकि सरकार घाटे के वित्तपोषण के लिए केंद्रीय बैंक द्वारा जारी मुद्रा पर निर्भर हो सकती है।
- क्राउडिंग आउट प्रभाव : जब सरकार अपने घाटे के वित्तपोषण के लिए वित्तीय बाजारों से उपलब्ध धन का बड़ा हिस्सा उधार लेती है, तो निजी क्षेत्र के लिए ऋण की उपलब्धता कम हो सकती है। इससे व्यवसायों एवं व्यक्तियों के निजी निवेश पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
- राजकोषीय गुंजाइश में कमी : उच्च राजकोषीय घाटा आर्थिक झटकों अथवा संकटों से निपटने के लिए सरकार की अतिरिक्त व्यय करने की क्षमता को सीमित कर देता है।
- उधार लेने में कठिनाई : जब सरकार की वित्तीय स्थिति कमजोर होती है, तो उसके बॉण्ड की माँग घटने लगती है। ऐसी स्थिति में सरकार को ऋणदाताओं को आकर्षित करने के लिए अधिक ब्याज दरों की पेशकश करनी पड़ती है।
स्रोत: LM
विकसित भारत के लिए बैंकिंग पर उच्चस्तरीय समिति
पाठ्यक्रम: GS3 / अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- भारत सरकार ने विकसित भारत के लिए बैंकिंग पर एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया है। इस समिति की अध्यक्षता पूर्व केंद्रीय सतर्कता आयुक्त सुरेश एन. पटेल कर रहे हैं।
समिति के विचारार्थ विषय
- समिति वर्तमान बैंकिंग प्रथाओं, विवेकपूर्ण नियामकीय मानदंडों एवं अंतरराष्ट्रीय सर्वोत्तम प्रथाओं का परीक्षण करेगी, ताकि वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी भारतीय बैंकों के निर्माण के लिए एक कार्ययोजना तैयार की जा सके।
- वर्ष 2047 तक कम-से-कम एक या दो भारतीय बैंकों को विश्व के शीर्ष 20 बैंकों में शामिल करने के लक्ष्य के साथ, अंतरराष्ट्रीय स्तर के अग्रणी बैंकिंग संस्थानों से प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम भारतीय बैंकों के निर्माण हेतु रोडमैप तैयार करना।
- वर्तमान स्थिति के अनुसार, शीर्ष 100 वैश्विक बैंकों की सूची में भारतीय सार्वजनिक क्षेत्र का केवल भारतीय स्टेट बैंक (SBI) शामिल है। नवीनतम सूची में इसकी रैंकिंग 43वें स्थान से गिरकर 45वें स्थान पर आ गई है।
- HDFC बैंक शीर्ष 100 में शामिल एकमात्र अन्य भारतीय बैंक है, जिसकी रैंकिंग 73वें स्थान से गिरकर 76वें स्थान पर आ गई है।
- समिति बैंकिंग संस्थानों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) एवं डिजिटल नवाचार को अपनाने के लिए एक कार्ययोजना तैयार करेगी। साथ ही, साइबर सुरक्षा संबंधी जोखिमों से बचाव के लिए आवश्यक सुरक्षा उपायों की सिफारिश करेगी।
- समिति ऋण तक पहुँच का विस्तार करने में उनकी प्रभावशीलता का आकलन करने के लिए मौजूदा प्राथमिकता क्षेत्र ऋण (PSL) ढाँचे एवं अग्रणी बैंक योजना की समीक्षा करेगी।
स्रोत: IE
डॉ. होमी जहाँगीर भाभा
पाठ्यक्रम: GS3 / विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
संदर्भ
- डॉ. होमी जहाँगीर भाभा को भारत के परमाणु कार्यक्रम के जनक के रूप में स्मरण किया जाता है।
परिचय
- होमी जहाँगीर भाभा का जन्म 30 अक्टूबर, 1909 को हुआ था।
- उन्होंने भारत के त्रि-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम की अवधारणा विकसित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- उन्होंने वर्ष 1955 में जिनेवा में आयोजित परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग पर प्रथम संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की अध्यक्षता की थी।
वैज्ञानिक योगदान
- भाभा प्रकीर्णन: उन्होंने इलेक्ट्रॉन एवं पॉजिट्रॉन के बीच प्रकीर्णन की प्रायिकता की गणना की। इस प्रक्रिया को भाभा प्रकीर्णन कहा जाता है। यह कण भौतिकी से संबंधित प्रयोगों में महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुई।
- कॉस्मिक रे शॉवर्स का सिद्धांत : वाल्टर हिटलर के साथ मिलकर उन्होंने कॉस्मिक रे शॉवर्स का सिद्धांत विकसित किया।
- इस सिद्धांत के माध्यम से यह समझाया गया कि उच्च ऊर्जा वाले ब्रह्मांडीय कण जब पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते हैं, तो वे द्वितीयक कणों की शृंखलाबद्ध बौछार उत्पन्न करते हैं।
भारत के परमाणु कार्यक्रम की संस्थागत नींव
- टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR): वर्ष 1945 में टाटा ट्रस्ट के सहयोग से भाभा ने मुंबई में TIFR की स्थापना में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा इसके प्रथम निदेशक बने।
- परमाणु ऊर्जा आयोग (AEC): वर्ष 1948 में परमाणु ऊर्जा आयोग की स्थापना में भाभा ने प्रमुख भूमिका निभाई तथा इसके प्रथम अध्यक्ष बने।
- परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE): इसकी स्थापना वर्ष 1954 में की गई थी। यह सीधे प्रधानमंत्री के प्रभार के अधीन स्थापित किया गया तथा होमी भाभा इसके प्रथम सचिव बने।
- परमाणु ऊर्जा प्रतिष्ठान, ट्रॉम्बे (AEET): वर्ष 1954 में भाभा के नेतृत्व में मुंबई के ट्रॉम्बे में परमाणु ऊर्जा प्रतिष्ठान की स्थापना की गई।
- बाद में वर्ष 1967 में उनके सम्मान में इसका नाम बदलकर भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) कर दिया गया।
पुरस्कार एवं सम्मान
- वर्ष 1942 में उन्हें एडम्स पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
- वर्ष 1954 में उन्हें भारत के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।
- उन्हें वर्ष 1951 तथा 1953 से 1956 के बीच भौतिकी के नोबेल पुरस्कार के लिए भी नामांकित किया गया था।
स्रोत: DD News
बिहार संग्रहालय विश्व के शीर्ष 10 संग्रहालयों में सम्मिलित
पाठ्यक्रम: विविध
संदर्भ
- पटना स्थित बिहार संग्रहालय को वर्ष 2026 के विश्व के 100 सर्वश्रेष्ठ संग्रहालयों की सूची में एशिया का शीर्ष संग्रहालय तथा वैश्विक स्तर पर नौवाँ स्थान प्राप्त हुआ है। यह रैंकिंग एक जर्मन यात्रा गाइड एवं डिजिटल पत्रिका द्वारा जारी की गई है।
परिचय
- इस रैंकिंग सूची में 142 देशों के 3,800 संग्रहालयों एवं अन्य प्रदर्शनी स्थलों को शामिल किया गया था।
- पात्रता के लिए संग्रहालयों में एक स्थायी संग्रह अथवा ऐसी प्रदर्शनी का होना आवश्यक था, जो आम जनता के लिए खुली हो।
- इस रैंकिंग में निम्नलिखित श्रेणियों को शामिल किया गया था:
- कला संग्रहालय
- इतिहास एवं पुरातत्व संग्रहालय
- विज्ञान एवं प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय
- प्रौद्योगिकी एवं परिवहन संग्रहालय
- खुले परिसर वाले संग्रहालय

बिहार संग्रहालय के बारे में
- बिहार संग्रहालय का उद्घाटन वर्ष 2015 में किया गया था तथा इसके विकास एवं निर्माण का कार्य आगामी वर्षों में भी जारी रहा।
- इसका वास्तुशिल्पीय डिजाइन जापानी वास्तुकार फुमिहिको माकी के नेतृत्व में तैयार किया गया था। उन्हें प्रतिष्ठित प्रित्ज़कर वास्तुकला पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।
- संग्रहालय के सबसे प्रसिद्ध एवं महत्त्वपूर्ण पुरावशेषों में दीदारगंज यक्षी की मूर्ति शामिल है।
- यह मौर्यकालीन मूर्तिकला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जो अपनी विशिष्ट चमकदार पॉलिश एवं सूक्ष्म शिल्पकारी के लिए प्रसिद्ध है।
- संग्रहालय की दीर्घाओं में मौर्य, गुप्त एवं पाल काल से संबंधित विरासत के साथ-साथ बौद्ध एवं जैन धर्म की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहर को भी संरक्षित किया गया है।
- यह संग्रहालय भारत के अतीत को आकार देने वाली विभिन्न ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक परंपराओं की महत्त्वपूर्ण जानकारी प्रदान करता है।
स्रोत: IE
Previous article
भारत में क्लाउड कंप्यूटिंग पारितंत्र
Next article
संक्षिप्त समाचार 31-10-2026