संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के तट के निकट तेल रिसाव से अलवणीकरण संयंत्र प्रभावित

पाठ्यक्रम: GS2/अंतरराष्ट्रीय संबंध

संदर्भ 

  • संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के तट के निकट हुए तेल रिसाव ने पर्यावरणीय प्रदूषण के खतरे तथा अलवणीकरण संयंत्रों  पर इसके संभावित प्रभाव को लेकर चिंताएँ बढ़ा दी हैं।

अलवणीकरण संयंत्र क्या हैं? 

  • अलवणीकरण संयंत्र समुद्री जल से नमक एवं अन्य खनिजों को हटाकर उसे स्वच्छ पेयजल में परिवर्तित करते हैं।
  • इसके लिए सबसे व्यापक रूप से उपयोग की जाने वाली विधि रिवर्स ऑस्मोसिस है। इस प्रक्रिया में समुद्री जल को अत्यंत सूक्ष्म झिल्लियों से उच्च दबाव के माध्यम से गुजारा जाता है, जो जल से नमक एवं अन्य अशुद्धियों को अलग कर देती हैं।
  • इस प्रक्रिया से प्राप्त स्वच्छ जल का उपयोग क्षेत्र में घरेलू आवश्यकताओं, उद्योगों, होटलों तथा कुछ कृषि गतिविधियों के लिए किया जाता है।

खाड़ी क्षेत्र के लिए ये इतने महत्त्वपूर्ण क्यों हैं? 

  • खाड़ी क्षेत्र के अनेक देश अलवणीकृत जल पर अत्यधिक निर्भर हैं, क्योंकि वहाँ नदियों एवं बड़ी झीलों जैसे प्राकृतिक मीठे जल स्रोतों का अभाव है।
  • संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में पेयजल की कुल आपूर्ति का 80% से अधिक हिस्सा अलवणीकृत जल से प्राप्त होता है।
  • यहाँ के प्रमुख अलवणीकरण संयंत्रों में दुबई के जेबेल अली औद्योगिक बंदरगाह तथा अबू धाबी और दुबई के बीच स्थित तवीला के संयंत्र शामिल हैं।
  • ये संयंत्र कुवैत की लगभग 90%, ओमान की 86% तथा सऊदी अरब की 70% जल आवश्यकताओं को पूरा करते हैं।
  • IFRI की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2030 तक पश्चिम एशिया में अलवणीकरण क्षमता लगभग दोगुनी होने की संभावना है।

क्या आप जानते हैं?

  • वर्ष 1991 में खाड़ी युद्ध के दौरान तेल का एक बड़ा रिसाव हुआ था, जो इतिहास के सबसे बड़े तेल रिसावों में से एक था।
  • इसके परिणामस्वरूप सऊदी अरब एवं कुवैत के कई अलवणीकरण संयंत्रों को बंद करना पड़ा था तथा समुद्र तट के विस्तृत क्षेत्रों में गंभीर प्रदूषण फैल गया था।

अलवणीकरण संयंत्रों से संबंधित चुनौतियाँ एवं जोखिम 

  • समुद्री प्रदूषण : कच्चा तेल एक प्राकृतिक उत्पाद है और समुद्री पर्यावरण में धीरे-धीरे विघटित हो सकता है। हालाँकि, समुद्री जल में इसके प्रवेश से गंभीर पर्यावरणीय क्षति हो सकती है।
    • तेल के प्रदूषण से बचाव के लिए जैसे ही तेल अलवणीकरण संयंत्रों के जल-ग्रहण केंद्रों के निकट पहुँचता है, संयंत्रों को तत्काल बंद करना आवश्यक हो सकता है।
  • अलवणीकरण संयंत्रों का निष्क्रिय होना : विशेषज्ञों के अनुसार, यदि प्रमुख अलवणीकरण संयंत्र निष्क्रिय हो जाते हैं, तो बड़े शहर कुछ ही दिनों में अपनी अधिकांश पेयजल आपूर्ति खो सकते हैं।
    • वर्ष 2010 में अमेरिकी केंद्रीय खुफिया एजेंसी (CIA) द्वारा किए गए एक विश्लेषण में चेतावनी दी गई थी कि अलवणीकरण सुविधाओं पर हमले खाड़ी क्षेत्र के कई देशों में राष्ट्रीय संकट उत्पन्न कर सकते हैं।
    • इस क्षेत्र के 90% से अधिक अलवणीकृत जल की आपूर्ति केवल 56 संयंत्रों से होती है, जिससे ये संयंत्र तोड़फोड़ अथवा सैन्य कार्रवाई के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो जाते हैं।
  • जलवायु परिवर्तन : युद्ध के अतिरिक्त जलवायु परिवर्तन भी अलवणीकरण संबंधी बुनियादी ढाँचे के लिए जोखिम बढ़ा रहा है।
    • समुद्र के बढ़ते तापमान तथा अरब सागर में अधिक शक्तिशाली चक्रवातों से तटीय संयंत्रों को खतरा हो सकता है।
    • तूफानी ज्वार एवं अत्यधिक वर्षा से संयंत्रों को हानि पहुँच सकता है अथवा उनकी जल निकासी प्रणालियाँ प्रभावित हो सकती हैं।
  • उत्सर्जन एवं प्रदूषण : अलवणीकरण एक ऊर्जा-गहन प्रक्रिया है। विश्वभर में इस प्रक्रिया से प्रतिवर्ष लगभग 50 करोड़ से 85 करोड़ टन कार्बन उत्सर्जन होता है।
    • इस प्रक्रिया में अत्यधिक सांद्रता वाला लवणीय अपशिष्ट जल भी उत्पन्न होता है, जिसे प्रायः वापस समुद्र में छोड़ दिया जाता है।
    • यह अपशिष्ट जल प्रवाल भित्तियों सहित समुद्री पारिस्थितिकी तंत्रों को हानि पहुँचा सकता है।

रोकथाम एवं प्रभावों का न्यूनीकरण

  • वर्तमान घटना के संदर्भ में, प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना होनी चाहिए कि तेल अलवणीकरण संयंत्रों के जल-ग्रहण केंद्रों तक न पहुँचे, जल उपचार उपकरणों की सुरक्षा बनी रहे तथा पेयजल की सुरक्षित एवं विश्वसनीय आपूर्ति जारी रहे।
  • बहुस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था: सबसे प्रभावी रणनीति किसी एक उपाय पर निर्भर रहने के बजाय सुरक्षा की कई परतें विकसित करना है, ताकि तेल रिसाव एवं अन्य संभावित खतरों से अलवणीकरण संयंत्रों की प्रभावी सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

स्रोत: DD

 

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