राजस्थान में हुए नए शोध में जनजातीय खगोल विज्ञान का भारतीय ज्ञान परंपरा से संबंध स्थापित 

पाठ्यक्रम: GS3/विज्ञान और प्रौद्योगिकी

संदर्भ 

  • भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) जोधपुर के शोधकर्ताओं ने पश्चिमी राजस्थान के जनजातीय समुदायों के खगोलीय ज्ञान का दस्तावेजीकरण किया है तथा भारतीय ज्ञान प्रणाली ( IKS) के साथ इसके संबंधों का अध्ययन किया है।

जनजातीय खगोल विज्ञान के बारे में 

  • जनजातीय खगोल विज्ञान से तात्पर्य खगोलीय पिंडों, तारों, ग्रहों, ऋतुओं एवं प्राकृतिक चक्रों से संबंधित उस स्वदेशी ज्ञान से है, जिसे जनजातीय समुदायों ने पीढ़ियों से निरंतर अवलोकन के माध्यम से विकसित किया है।
  • जनजातीय समुदाय खगोलीय पिंडों की व्याख्या सांस्कृतिक मान्यताओं, लोककथाओं एवं पारिस्थितिक ज्ञान के आधार पर करते हैं।
    • धूमकेतुओं को आकाशीय झाड़ू माना जाता है, जो आकाश की गंदगी को साफ करते हैं, जबकि उल्कापिंडों को पूर्वजों की आत्माओं के रूप में देखा जाता है।
  • इस अध्ययन में छह जनजातीय समुदायों को शामिल किया गया है: भील, मीणा, बंजारा, गोंड, कोलाम एवं कोरकू।

जनजातीय खगोलीय ज्ञान के प्रमुख तत्व 

  • समय की गणना : जनजातीय समुदाय समय की गणना करने तथा मौसमी परिवर्तनों की पहचान करने के लिए चंद्र चक्रों का उपयोग करते हैं।
  • मौसम का पूर्वानुमान : वे तारों की स्थिति एवं गति का अवलोकन करके ऋतुओं के परिवर्तन तथा मौसम के स्वरूप का अनुमान लगाते हैं।
  • कृषि संबंधी गतिविधियाँ : बुवाई एवं कटाई जैसी कृषि गतिविधियों को खगोलीय चक्रों के अनुरूप निर्धारित किया जाता है।
  • अनुष्ठान संबंधी परंपराएँ : ग्रहण एवं अन्य खगोलीय घटनाओं को विशिष्ट धार्मिक अनुष्ठानों तथा सांस्कृतिक मान्यताओं से जोड़ा जाता है।
  • पारिस्थितिक ज्ञान : जनजातीय समुदाय खगोलीय गतिविधियों से संबंधित ज्ञान को स्थानीय भू-भाग, वनस्पति एवं प्राकृतिक चक्रों के साथ समन्वित करते हैं।

भारतीय ज्ञान प्रणाली (IKS) के साथ संबंध

  • यह शोध जनजातीय खगोलीय परंपराओं एवं शास्त्रीय संस्कृत खगोल विज्ञान के बीच विद्यमान समानताओं को उजागर करता है।
    • शास्त्रीय संस्कृत खगोल विज्ञान में गणितीय गणनाओं, ज्यामिति एवं औपचारिक सिद्धांतों का उपयोग किया जाता है, जबकि जनजातीय खगोल विज्ञान मुख्यतः व्यवस्थित अवलोकन एवं पर्यावरण की समझ पर आधारित है।
  • यह अध्ययन स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों एवं पारंपरिक गणनात्मक खगोल विज्ञान के बीच अंतःसांस्कृतिक तुलनात्मक अध्ययन को बढ़ावा देता है।

नक्षत्र वाटिका पहल

  • IIT जोधपुर के शोधकर्ताओं ने राजस्थान के नांदिया कलां गाँव के निवासियों के सहयोग से अनुपयोगी एवं क्षरित सामुदायिक भूमि पर नक्षत्र वाटिका विकसित की है।
  • इस पहल के अंतर्गत सामुदायिक सहभागिता से लगभग 1,000 पौधे लगाए गए हैं।
  • इस पहल में जामुन, गूलर, पीपल, खेजड़ी, चमेली एवं बरगद जैसे पौधों को विभिन्न नक्षत्रों एवं राशियों से जोड़ा गया है।
  • इसका उद्देश्य औषधीय पौधों का संरक्षण करना, जैव विविधता की रक्षा करना तथा संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्रों का पुनर्स्थापन करना है।

जनजातीय खगोल विज्ञान का महत्त्व

  • स्वदेशी ज्ञान का संरक्षण : यह जनजातीय समुदायों के मौखिक इतिहास, अनुष्ठानों, खगोलीय अवलोकनों एवं पारिस्थितिक मान्यताओं के दस्तावेजीकरण और संरक्षण में सहायता करता है।
  • जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन : मौसमी चक्रों से संबंधित पारंपरिक ज्ञान पर्यावरणीय परिवर्तनों को समग्र रूप से समझने के लिए आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोणों का पूरक बन सकता है।
  • सतत कृषि : प्राकृतिक चक्रों की स्वदेशी समझ पर आधारित ज्ञान स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल कृषि पद्धतियों के विकास में योगदान दे सकता है तथा सतत कृषि को बढ़ावा दे सकता है।
  • जैव विविधता का संरक्षण : नक्षत्र वाटिका जैसी पहल देशज एवं औषधीय पौधों की प्रजातियों के संरक्षण को प्रोत्साहित करती हैं।
  • सामुदायिक सहभागिता : सतत विकास के समाधान तैयार करने में जनजातीय समुदायों के ज्ञान को मान्यता देने से सामुदायिक सहभागिता एवं समावेशन को बढ़ावा मिलता है तथा राष्ट्र निर्माण में उनकी भागीदारी सुदृढ़ होती है।

चुनौतियाँ 

  • आधुनिकीकरण एवं सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तनों के कारण पारंपरिक ज्ञान का धीरे-धीरे लुप्त होने का खतरा है।
  • जनजातीय खगोलीय ज्ञान का अधिकांश हिस्सा मौखिक परंपराओं के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित होता है तथा इसका व्यवस्थित दस्तावेजीकरण सीमित है।
  • स्वदेशी ज्ञान एवं औपचारिक वैज्ञानिक अनुसंधान के बीच सीमित समन्वय इसके व्यापक उपयोग को बाधित कर सकता है।

आगे की राह

  • स्वदेशी खगोलीय ज्ञान, मौखिक इतिहास एवं पारंपरिक पारिस्थितिक पद्धतियों का व्यवस्थित रूप से दस्तावेजीकरण किया जाना चाहिए।
    • इसके लिए जनजातीय समुदायों, शोधकर्ताओं एवं वैज्ञानिक संस्थानों के बीच सहयोग को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
  • इस पारंपरिक ज्ञान को जैव विविधता संरक्षण, जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन एवं सतत कृषि के साथ एकीकृत किया जा सकता है।
  • यह सुनिश्चित करने के लिए एक प्रभावी तंत्र विकसित किया जाना चाहिए कि जनजातीय समुदायों को उनके पारंपरिक ज्ञान के लिए उचित मान्यता मिले तथा उसके उपयोग से संबंधित निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनकी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित हो।

स्रोत: TH

 

Other News of the Day

पाठ्यक्रम: GS3/ अर्थव्यवस्था संदर्भ विश्व बैंक की अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट ‘भारत में निर्धनता और समानता संक्षिप्त विवरण: अक्टूबर 2026’’ के अनुसार, भारत ने विश्व स्तर पर निर्धनता में कमी लाने की दिशा में सबसे तीव्र प्रगति करने वाले देशों में स्थान प्राप्त किया है। गरीबी उन्मूलन के क्षेत्र में भारत की प्रगति अत्यधिक निर्धनता...
Read More

पाठ्यक्रम: GS2/अंतरराष्ट्रीय संबंध संदर्भ  संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के तट के निकट हुए तेल रिसाव ने पर्यावरणीय प्रदूषण के खतरे तथा अलवणीकरण संयंत्रों  पर इसके संभावित प्रभाव को लेकर चिंताएँ बढ़ा दी हैं। अलवणीकरण संयंत्र क्या हैं?  अलवणीकरण संयंत्र समुद्री जल से नमक एवं अन्य खनिजों को हटाकर उसे स्वच्छ पेयजल में परिवर्तित करते हैं।...
Read More

पाठ्यक्रम: GS3/विज्ञान और प्रौद्योगिकी संदर्भ  भारत में डिजिटल तकनीकों को तीव्रता से अपनाए जाने के कारण विश्वसनीय डेटा अवसंरचना की माँग बढ़ रही है। इस परिप्रेक्ष्य में डेटा के भंडारण तथा डिजिटल सेवाओं को संचालित करने के लिए क्लाउड कंप्यूटिंग एक केंद्रीय भूमिका निभा रही है। क्लाउड कंप्यूटिंग क्या है? क्लाउड कंप्यूटिंग एक ऐसी तकनीक...
Read More

चोलकालीन मूर्तियाँ तमिलनाडु में उत्खनन के दौरान प्राप्त  पाठ्यक्रम: GS1 / कला एवं संस्कृति  चर्चा में क्यों?  तमिलनाडु राज्य पुरातत्व विभाग (TNSDA) ने नागपट्टिनम में जारी उत्खनन के दौरान भगवान नटराज एवं देवी शिवगामी की कांस्य मिश्रधातु से निर्मित मूर्तियों के साथ उनके संबंधित पीठिकाओं को प्राप्त किया है। चोल वंश  चोल वंश 10वीं से...
Read More
scroll to top