भारत में नवाचार का संकट: वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी विनिर्माण की आवश्यकता

पाठ्यक्रम: GS3/विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

संदर्भ

  • वैश्विक नवाचार सूचकांक (GII), 2026 में भारत का 38वाँ स्थान अनुसंधान एवं विकास (R&D) पर अपर्याप्त व्यय, निजी क्षेत्र की कमजोर भागीदारी तथा विनिर्माण-आधारित नवाचार की आवश्यकता को लेकर परिचर्चा को पुनः प्रमुखता प्रदान करता है।

वैश्विक नवाचार सूचकांक (GII) के बारे में

  • इसे विश्व बौद्धिक संपदा संगठन (WIPO) द्वारा प्रतिवर्ष प्रकाशित किया जाता है। यह विभिन्न अर्थव्यवस्थाओं की नवाचार क्षमताओं और प्रदर्शन का मूल्यांकन करता है।
  • इसका उद्देश्य यह आकलन करना है कि देश अपनी नवाचार क्षमताओं का विकास करने तथा उन्हें आर्थिक एवं तकनीकी परिणामों में परिवर्तित करने में कितने प्रभावी हैं।
  • यह रेखांकित करता है कि नवाचार केवल अनुसंधान संस्थानों पर निर्भर नहीं करता, बल्कि इसके लिए व्यापक व्यावसायिक वातावरण, अवसंरचना और औद्योगिक क्षमताएँ भी आवश्यक हैं।

GII 2026 में भारत का प्रदर्शन

  • भारत एक महत्त्वपूर्ण नवाचार अर्थव्यवस्था के रूप में उभरा है, विशेषकर निम्न-मध्यम आय वाले देशों के बीच।
  • हालाँकि, कुछ संरचनात्मक कमजोरियाँ अभी भी विद्यमान हैं:
    • अनुसंधान एवं विकास पर व्यय : भारत का सकल अनुसंधान एवं विकास व्यय (GERD) GDP का लगभग 0.6–0.7% है, जो दक्षिण कोरिया (लगभग 5%), चीन (लगभग 2.7%) और अन्य विकसित अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में काफी कम है।
    • निजी क्षेत्र की भागीदारी : भारत के कुल R&D व्यय में व्यवसायों का योगदान लगभग 41% है, जबकि कई नवाचार-प्रधान अर्थव्यवस्थाओं में यह 70–80% तक है।
    • नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र : भारत ICT सेवाओं के निर्यात, स्टार्ट-अप और ज्ञान-प्रधान सेवाओं जैसे क्षेत्रों में अपेक्षाकृत अच्छा प्रदर्शन करता है, लेकिन उसे विनिर्माण एवं तकनीकी क्षमताओं को अधिक सुदृढ़ करने की आवश्यकता है।
    • नवाचार क्लस्टर : GII की विश्व के शीर्ष नवाचार क्लस्टरों की सूची में भारत के 4 क्लस्टर—बेंगलुरु, दिल्ली, मुंबई और चेन्नई—शामिल हैं, जो भारत की बढ़ती अनुसंधान क्षमता को दर्शाते हैं।
  • इन उपलब्धियों के बावजूद, वैज्ञानिक ज्ञान को व्यावसायिक रूप से सफल उत्पादों में परिवर्तित करना एक प्रमुख चुनौती बना हुआ है।

विनिर्माण और नवाचार के बीच संबंध को समझना

  • नवाचार और विनिर्माण के बीच पारस्परिक रूप से सुदृढ़ करने वाला संबंध है। वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी विनिर्माण प्रायः निजी क्षेत्र द्वारा अनुसंधान एवं विकास में निरंतर निवेश के लिए आर्थिक आधार प्रदान करता है।
  • पूर्वी एशियाई देशों के अनुभवों से महत्त्वपूर्ण सीख:
    • दक्षिण कोरिया: वर्ष 1965 में R&D पर व्यय GDP का लगभग 0.26% था, जो 1980 में बढ़कर 0.77% हो गया। इस अवधि के दौरान निर्यात वर्ष 1960 में GDP के 2.6% से बढ़कर 1980 में 27.7% हो गया। R&D की तीव्रता वर्ष 1995 के आसपास ही 2% से अधिक हुई।
    • चीन: वर्ष 2008 में यह विश्व की सबसे बड़ी विनिर्माण अर्थव्यवस्था बना। उस समय इसका R&D व्यय GDP का लगभग 1.42% था।
    • जापान और ताइवान: दोनों ने प्रमुख तकनीकी एवं नवाचार केंद्रों के रूप में स्थापित होने से पहले अपनी विनिर्माण और निर्यात क्षमताओं को सुदृढ़ किया।
  • ये अनुभव दर्शाते हैं कि निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता, विनिर्माण का व्यापक पैमाना और औद्योगिक क्षमताएँ उच्च R&D निवेश के लिए आवश्यक संसाधन एवं प्रोत्साहन उत्पन्न कर सकती हैं।

भारत में निजी R&D निवेश कम क्यों बना हुआ है?

  • कई संरचनात्मक बाधाएँ भारतीय व्यवसायों को अनुसंधान में निवेश करने से हतोत्साहित करती हैं:
    • उच्च इनपुट लागत : महत्त्वपूर्ण कच्चे माल पर आयात शुल्क, महँगी विद्युत और उच्च लॉजिस्टिक्स लागत विनिर्माण की लागत बढ़ाते हैं।
    • नियामकीय भार: जटिल अनुपालन आवश्यकताएँ, अनुमोदन में देरी और नियामकीय अनिश्चितता कारखानों की स्थापना एवं संचालन की लागत बढ़ाती हैं।
    • पूँजी की उच्च लागत : अपेक्षाकृत महँगी उधारी के कारण दीर्घकालिक एवं अनिश्चित R&D निवेश कम आकर्षक हो जाता है।
    • वैश्विक बाजारों तक सीमित पहुँच : उच्च उत्पादन लागत घरेलू विनिर्माताओं को अंतरराष्ट्रीय उत्पादकों के साथ प्रभावी प्रतिस्पर्धा करने से रोकती है।
    • संरक्षण-आधारित प्रतिस्पर्धात्मकता: शुल्क और घरेलू नियामकीय संरक्षण कभी-कभी कंपनियों को उत्पादकता, गुणवत्ता एवं तकनीकी उन्नयन में पर्याप्त निवेश किए बिना भी बाजार में बने रहने की सुविधा प्रदान करते हैं।
    • जोखिम से बचने की प्रवृत्ति : व्यावसायिक विफलता के प्रति सीमित सहनशीलता प्रयोग और दीर्घकालिक नवाचार को हतोत्साहित करती है।
  • परिणामस्वरूप, निजी R&D निवेश की अपर्याप्तता आंशिक रूप से भारत के व्यावसायिक एवं विनिर्माण वातावरण की गहरी संरचनात्मक कमजोरियों का लक्षण है।

नवाचार को बढ़ावा देने वाली प्रमुख सरकारी पहलें

  • भारत ने अपने नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ करने के लिए कई पहलें की हैं:
    • अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (ANRF): विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों और उद्योगों के बीच अनुसंधान सहयोग को बढ़ावा देता है।
    • अनुसंधान, विकास एवं नवाचार योजना (RDI Scheme): रणनीतिक एवं उभरती प्रौद्योगिकियों में निजी क्षेत्र के निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए पर्याप्त वित्तीय सहायता प्रदान करती है।
    • उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन योजना (PLI Scheme): चयनित क्षेत्रों में घरेलू विनिर्माण, निवेश, उत्पादन के विस्तार और तकनीकी उन्नयन को प्रोत्साहित करती है।
    • स्टार्ट-अप इंडिया : उद्यमिता, नवाचार और अनुकूल स्टार्ट-अप पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा देता है।
    • अटल नवाचार मिशन : इनक्यूबेशन केंद्रों और अटल टिंकरिंग लैब्स के माध्यम से नवाचार एवं उद्यमशीलता क्षमताओं को प्रोत्साहित करता है।
    • भारत सेमीकंडक्टर मिशन : घरेलू सेमीकंडक्टर विनिर्माण और डिजाइन क्षमताओं के विकास को समर्थन प्रदान करता है।
    • राष्ट्रीय क्वांटम मिशन : क्वांटम प्रौद्योगिकियों में अनुसंधान एवं विकास को बढ़ावा देता है।
  • ये पहलें भारत के नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ कर सकती हैं, बशर्ते इनके साथ व्यापक व्यावसायिक वातावरण में भी सुधार किया जाए।

उभरती चुनौतियाँ

  • नीतिगत हस्तक्षेपों के बावजूद कई महत्त्वपूर्ण चुनौतियाँ बनी हुई हैं:
    • उद्योग एवं शिक्षा जगत के बीच कमजोर सहयोग तथा अनुसंधान का सीमित व्यावसायीकरण।
    • उन्नत मशीनरी, घटकों और महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों के आयात पर निर्भरता।
    • खंडित आपूर्ति शृंखलाएँ और अपर्याप्त औद्योगिक अवसंरचना।
    • नियामकीय अनिश्चितता तथा संविदाओं के प्रवर्तन में कठिनाइयाँ।
    • वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) का सीमित एकीकरण।
    • बढ़ती तकनीकी प्रतिस्पर्धा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के कारण नवाचार चक्रों में तीव्र परिवर्तन।
  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता उत्पाद विकास की अवधि को कम कर रही है। इससे प्रतिस्पर्धात्मकता के निर्धारण में तीव्रता, अनुकूलनशीलता और कुशल क्रियान्वयन का महत्त्व लगातार बढ़ रहा है।

आगे की राह: वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण

  • भारत को R&D व्यय को नवाचार का एकमात्र या पृथक संकेतक मानने के दृष्टिकोण से आगे बढ़कर ऐसा अनुकूल वातावरण तैयार करने पर ध्यान देना चाहिए, जो वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी विनिर्माण को प्रोत्साहित करे।
  • प्रमुख प्राथमिकताएँ निम्नलिखित हैं:
    • नियामकीय सरलीकरण : पारदर्शी एवं पूर्वानुमेय नियमों के माध्यम से अनावश्यक अनुमोदनों, अनुपालन आवश्यकताओं और नीतिगत अनिश्चितता को कम करना।
    • प्रतिस्पर्धी इनपुट लागत : आवश्यक औद्योगिक इनपुट पर शुल्कों को तर्कसंगत बनाना, बिजली की गुणवत्ता एवं किफायत में सुधार करना तथा लॉजिस्टिक्स लागत को कम करना।
    • औद्योगिक क्लस्टरों का विकास : विश्वसनीय अवसंरचना, कुशल लॉजिस्टिक्स, सरल मंजूरी प्रक्रियाओं और कुशल श्रमिकों की उपलब्धता के साथ बड़े एवं एकीकृत विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र स्थापित करना।
    • निजी R&D का सुदृढ़ीकरण: लक्षित प्रोत्साहनों, सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP), प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और विश्वविद्यालय-उद्योग सहयोग को सुदृढ़ करके उद्योग-आधारित अनुसंधान को बढ़ावा देना।
    • व्यापार सुगमता में सुधार: कराधान, संविदाओं के प्रवर्तन, भूमि तक पहुँच तथा विवाद निपटान में होने वाली देरी को दूर करना।
    • निर्यातोन्मुख विनिर्माण को प्रोत्साहन: भारतीय कंपनियों को वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में एकीकृत करना तथा उत्पादकता, गुणवत्ता और तकनीकी उन्नति पर आधारित प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करना।
    • जोखिम लेने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करना : वेंचर कैपिटल नेटवर्क को सुदृढ़ करना, डीप-टेक स्टार्ट-अप को समर्थन देना तथा ऐसा संस्थागत वातावरण विकसित करना, जिसमें वास्तविक व्यावसायिक विफलताओं को अत्यधिक दंडित न किया जाए।

निष्कर्ष 

  • भारत की नवाचार संबंधी महत्त्वाकांक्षाओं को केवल R&D के लिए सरकारी वित्तपोषण बढ़ाकर प्राप्त नहीं किया जा सकता। इसके लिए ऐसा वातावरण निर्मित करना आवश्यक है, जिसमें व्यवसाय कुशलतापूर्वक विनिर्माण कर सकें, वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकें तथा अनुसंधान में पुनर्निवेश के लिए पर्याप्त प्रतिफल अर्जित कर सकें।
  • संरक्षित विनिर्माण अर्थव्यवस्था से वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी उत्पादन शक्ति बनने की दिशा में परिवर्तन भारत को नवाचार में केवल भागीदार से आगे बढ़ाकर वैश्विक नवाचार नेतृत्वकर्ता बनाने के लिए आवश्यक है।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न:] भारत में सतत नवाचार तथा अनुसंधान एवं विकास (R&D) में निजी क्षेत्र के बढ़ते निवेश के लिए वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी विनिर्माण एक पूर्वापेक्षा है। विवेचना कीजिए। 

स्रोत: HT

 

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