पाठ्यक्रम: जीएस-2/सामाजिक मुद्दे; शिक्षा
सन्दर्भ
- भारत ने साक्षरता के क्षेत्र में प्रगति की है। PLFS 2025 के अनुसार, भारत की समग्र साक्षरता दर 81.1% है, जबकि ग्रामीण, लैंगिक और शैक्षिक स्तरों के बीच लगातार बने हुए अंतर पर जोर दिया गया है।
साक्षरता का परिचय
- स्कूली शिक्षा और साक्षरता विभाग साक्षरता को समझ के साथ पढ़ने, लिखने और गणना करने की क्षमता के रूप में परिभाषित करता है, जिसमें पहचानने, समझने, व्याख्या करने और सृजन करने की क्षमता के साथ-साथ डिजिटल और वित्तीय साक्षरता भी शामिल है।
- किसी राज्य/केंद्र शासित प्रदेश द्वारा 95% साक्षरता प्राप्त करने पर उसे पूर्णतः साक्षर माना जाता है।
- वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, साक्षरता 7 वर्ष और उससे अधिक आयु के व्यक्तियों के लिए किसी भी भाषा में समझ के साथ पढ़ने और लिखने की क्षमता है।
- यूनेस्को के अनुसार, साक्षरता समस्याओं को हल करने तथा कार्य, सीखने और दैनिक जीवन में भाग लेने के लिए पढ़ने, लिखने, संख्याओं और डिजिटल सामग्री का उपयोग करने की क्षमता है।
- इस प्रकार, साक्षरता समावेशन, समानता और मानव विकास की नींव के रूप में लगातार अधिक महत्त्वपूर्ण होती जा रही है।
भारत की साक्षरता में प्रगति
भारत ने एक बड़े परिवर्तन का अनुभव किया है:
- समग्र साक्षरता वर्ष 1951 में 18.32% से बढ़कर 2011 में 74.04% हो गई।
- पुरुष साक्षरता 27.15% से बढ़कर 82.14% हुई, जबकि महिला साक्षरता 8.86% से बढ़कर 65.46% हो गई।
- शहरी साक्षरता 34.59% से बढ़कर 84.1% हुई, जबकि ग्रामीण साक्षरता 12.10% से बढ़कर 67.8% हो गई।
- वर्ष 2001–11 के बीच, ग्रामीण महिला साक्षरता में 26% की वृद्धि हुई, जबकि ग्रामीण पुरुषों में यह वृद्धि 10% रही।
- PLFS 2025 के अनुसार समग्र साक्षरता 81.1% है। 7 वर्ष और उससे अधिक आयु के व्यक्तियों में शहरी साक्षरता 89% और ग्रामीण साक्षरता 77.4% थी; ग्रामीण महिला साक्षरता केवल 70.3% रही।

विद्यालयी शिक्षा: पहुँच, प्रतिधारण और सीखना
- साक्षरता में वृद्धि इस बात पर निर्भर करती है कि बच्चे विद्यालय में प्रवेश करें, विद्यालय में बने रहें और शिक्षा के विभिन्न स्तरों के माध्यम से आगे बढ़ें।
- UDISE+ 2025-26 के अनुसार,विद्यालयों में 24.72 करोड़ विद्यार्थी नामांकित थे।
- सकल नामांकन अनुपात (GER): बुनियादी स्तर पर 42.8%, प्रारंभिक स्तर पर 91.7%, मध्य स्तर पर 89.6% और माध्यमिक स्तर पर 71.7%।
- विद्यालय छोड़ने की दर विभिन्न स्तरों पर बढ़ती है, जो प्रारंभिक स्तर पर 1.8% से बढ़कर माध्यमिक स्तर पर 7% हो जाती है।
- प्रतिधारण दर बुनियादी स्तर पर 98.5% से घटकर माध्यमिक स्तर पर 51.9% रह जाती है।
- संक्रमण दर बुनियादी–प्रारंभिक स्तर के बीच 99.2%, प्रारंभिक–मध्य स्तर के बीच 93.8% और मध्य–माध्यमिक स्तर के बीच 88.3% है।
- इस प्रकार, माध्यमिक स्तर पर प्रतिधारण और सीखने की निरंतरता महत्त्वपूर्ण चिंताएँ बनी हुई हैं।
उच्च शिक्षा और मानव पूंजी
उच्च शिक्षा में भागीदारी का विस्तार हुआ है:
- नामांकन 2014-15 में 3.42 करोड़ से बढ़कर 2023-24 में 4.50 करोड़ हो गया।
- इसी अवधि में सकल नामांकन अनुपात (GER) 23.7% से बढ़कर 30% हो गया।
- उच्च शिक्षा में उत्तीर्ण विद्यार्थियों की संख्या 2014-15 में 88.28 लाख से बढ़कर 2023-24 में 1.09 करोड़ से अधिक हो गई।
- महिलाओं और वंचित समूहों की बढ़ती भागीदारी सहित यह विस्तार मानव पूंजी निर्माण में सहायक है तथा 2035 तक उच्च शिक्षा में 50% सकल नामांकन अनुपात के राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के लक्ष्य का समर्थन करता है।
भारत की साक्षरता में प्रमुख मुद्दे और चिंताएँ
- ग्रामीण–शहरी विभाजन: PLFS 2025 के अनुसार, 7 वर्ष और उससे अधिक आयु की ग्रामीण और शहरी आबादी के बीच साक्षरता में 11.6 प्रतिशत अंकों का अंतर है।
- लैंगिक असमानता: ग्रामीण महिला साक्षरता पुरुष साक्षरता की तुलना में अभी भी काफी कम है।
- माध्यमिक स्तर पर विद्यार्थियों का बाहर होना: विद्यालय छोड़ने और घटती प्रतिधारण दर की समस्या उच्च विद्यालयी स्तरों पर अधिक स्पष्ट हो जाती है।
- बुनियादी साक्षरता से आगे: डिजिटल, वित्तीय, संख्यात्मक और महत्त्वपूर्ण जीवन कौशल तेजी से आवश्यक होते जा रहे हैं।
- समानता और समावेशन: क्षेत्रीय और सामाजिक असमानताओं पर निरंतर ध्यान देने की आवश्यकता है।
- सीखने की गुणवत्ता: केवल नामांकन पर्याप्त नहीं है; इसे बुनियादी दक्षताओं और सार्थक सीखने में परिवर्तित होना आवश्यक है।
सरकारी पहल
- उल्लास (नव भारत साक्षरता कार्यक्रम): यह उन 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के वयस्कों को लक्षित करता है, जो औपचारिक स्कूली शिक्षा से वंचित रह गए हैं।
- यह मिश्रित प्रारूप के माध्यम से कार्यात्मक साक्षरता, संख्यात्मकता, महत्त्वपूर्ण जीवन कौशल और आजीवन सीखने को एकीकृत करता है।
- इसका लक्ष्य 2022–27 के दौरान 5 करोड़ शिक्षार्थियों को शामिल करना है, जिसके लिए ₹1,037.90 करोड़ का प्रावधान किया गया है।
- लगभग 4.03 करोड़ शिक्षार्थियों और 52.20 लाख स्वयंसेवकों ने पंजीकरण कराया है, जबकि अब तक 3.3 करोड़ से अधिक लोग FLNAT में भाग ले चुके हैं।
- वर्ष 2024 से 2026 के बीच दस (10) राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों ने स्वयं को पूर्णतः साक्षर घोषित किया है। इनमें लद्दाख, मिजोरम, गोवा, त्रिपुरा, हिमाचल प्रदेश, चंडीगढ़, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, सिक्किम, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर शामिल हैं।

- निपुण भारत (2021): इसका उद्देश्य 2026-27 तक सार्वभौमिक बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मकता प्राप्त करना है, ताकि 3–8 वर्ष की आयु के बच्चों में कक्षा 2 तक बुनियादी कौशल सुनिश्चित किए जा सकें।
अन्य सहायक योजनाएँ:
- समग्र शिक्षा: समावेशी स्कूली शिक्षा, बुनियादी शिक्षा, शिक्षक विकास और व्यावसायिक शिक्षा के एकीकरण पर केंद्रित।
- पीएम श्री: 14,500 से अधिक आदर्श विद्यालयों को सुदृढ़ करना।
- पीएम ई-विद्या: बहु-माध्यमीय डिजिटल, ऑनलाइन और प्रसारण-आधारित शिक्षा, जिससे लगभग 25 करोड़ बच्चों को लाभ मिलने की उम्मीद है।
- पीएम पोषण: 10.36 लाख विद्यालयों में 11.20 करोड़ विद्यार्थियों को गर्म पका हुआ भोजन उपलब्ध कराना, जिससे पोषण और विद्यालयी भागीदारी को समर्थन मिलता है।
साक्षरता और विकसित भारत
- साक्षरता महिलाओं के सशक्तीकरण, सामाजिक समावेशन, रोजगार क्षमता, उत्पादकता, नवाचार और आर्थिक भागीदारी में योगदान देती है।
- यह संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य 4 के केंद्र में है, जिसका उद्देश्य समावेशी और समान गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तथा आजीवन सीखने के अवसर सुनिश्चित करना है।
आगे की राह
- भारत की चुनौती अब साक्षरता तक पहुँच से आगे बढ़कर साक्षरता की गुणवत्ता की ओर बढ़ना है। प्राथमिकताओं में शामिल होना चाहिए:
- ग्रामीण-शहरी और लैंगिक असमानताओं को कम करना;
- बुनियादी शिक्षा को सुदृढ़ करना;
- माध्यमिक स्तर पर विद्यालय छोड़ने की दर को कम करना;
- डिजिटल और वित्तीय साक्षरता का विस्तार करना;
- शिक्षक क्षमता और सीखने के परिणामों में सुधार करना;
- शिक्षा को रोजगार योग्य और भविष्य के लिए तैयार कौशल से जोड़ना;
- वयस्क साक्षरता में सामुदायिक भागीदारी को बनाए रखना;
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