पाठ्यक्रम: GS2/ स्वास्थ्य, GS3/ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
संदर्भ
- कैंडिडा ऑरिस पर किए गए एक शोध से पता चलता है कि फफूंदरोधी दवाओं के प्रति प्रतिरोध जीन उत्परिवर्तन, जीन के दोहरीकरण तथा कोशिका में क्षतिपूरक तंत्रों के माध्यम से विकसित हो सकता है।
फफूंद संक्रमण क्या हैं?
- फफूंद संक्रमण रोगजनक फफूंद के कारण होने वाले रोग हैं, जो त्वचा, नाखून, फेफड़ों, रक्तप्रवाह तथा शरीर के अन्य अंगों को प्रभावित कर सकते हैं।
- डर्मेटोफाइट्स ऐसी फफूंद हैं जो त्वचा, नाखून और बालों के संक्रमण के सामान्य कारण हैं, जबकि कैंडिडा ऑरिस जैसे यीस्ट गंभीर प्रणालीगत संक्रमण उत्पन्न कर सकते हैं।
- प्रतिरक्षा-क्षीण व्यक्तियों में फफूंद संक्रमण विशेष रूप से खतरनाक होते हैं, क्योंकि ये आक्रामक होकर जीवन के लिए घातक हो सकते हैं।
कैंडिडा ऑरिस चिंता का विषय क्यों है?
- कैंडिडा ऑरिस एक उभरता हुआ बहु-दवा-प्रतिरोधी यीस्ट है, जो विशेष रूप से स्वास्थ्य देखभाल संस्थानों में रक्तप्रवाह तथा अन्य आक्रामक संक्रमण उत्पन्न करता है।
- इसकी प्रथम पहचान वर्ष 2009 में जापान में हुई थी और इसके बाद कई देशों में इसके मामले सामने आए हैं।
- भारत में परीक्षण किए गए C. ऑरिस के 90% से अधिक नैदानिक आइसोलेट्स एज़ोल वर्ग की फफूंदरोधी दवाओं, जैसे फ्लुकोनाज़ोल, के प्रति प्रतिरोधी पाए गए तथा इनमें से कई पॉलीन वर्ग की दवाओं के प्रति भी प्रतिरोधी थे।
फफूंदरोधी प्रतिरोध वृद्धि के कारण
- वैश्विक तापन: अधिकांश फफूंद सामान्यतः मानव शरीर के तापमान पर अच्छी तरह जीवित नहीं रह पातीं, जिससे मनुष्यों को संक्रमित करने की उनकी क्षमता सीमित रहती है।
- बढ़ता वैश्विक तापमान अधिक ऊष्मा-सहिष्णु फफूंद को अनुकूल परिस्थितियाँ प्रदान करता है, जिससे वे धीरे-धीरे अधिक उष्ण परिस्थितियों के अनुकूल हो सकती हैं।
- फफूंदरोधी दवाओं का बार-बार या अनुचित उपयोग फफूंद पर चयनात्मक दबाव डालता है, जिससे प्रतिरोधी उपभेदों के जीवित रहने और उनकी संख्या बढ़ने की संभावना बढ़ जाती है।
- सीमित नैदानिक सुविधाएँ: अनेक स्वास्थ्य देखभाल संस्थानों में फफूंद की प्रजातियों की पहचान करने तथा दवाओं के प्रति उनकी संवेदनशीलता का परीक्षण करने की पर्याप्त क्षमता नहीं है।
- इसके परिणामस्वरूप संक्रमणों का उपचार अप्रभावी दवाओं से किया जा सकता है, जिससे प्रतिरोधी फफूंद के बने रहने की संभावना बढ़ जाती है।
- सीमित उपचार विकल्प: बैक्टीरिया की तुलना में फफूंद और मानव कोशिकाओं के बीच जैविक अंतर कम होते हैं। इसलिए ऐसी दवाएँ विकसित करना कठिन है जो रोगी की कोशिकाओं को नुकसान पहुँचाए बिना केवल फफूंद को नष्ट कर सकें।
ईगल प्रभाव
- ईगल प्रभाव एक विरोधाभासी घटना है, जिसमें कुछ फफूंद फफूंदरोधी दवा की कम सांद्रता के संपर्क में आने पर प्रभावित होने के बजाय बहुत अधिक सांद्रता में दवा के संपर्क में आने पर जीवित रह सकती हैं या पुनः वृद्धि कर सकती हैं।
- C. ऑरिस में ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि दवा की उच्च सांद्रता क्षतिपूरक जैविक मार्गों को सक्रिय कर देती है, जैसे काइटिन संश्लेषण में वृद्धि।
- अतः फफूंदरोधी दवा की मात्रा बढ़ाना हमेशा अधिक उपचारात्मक लाभ सुनिश्चित नहीं करता।
चुनौतियाँ
- अनेक स्वास्थ्य देखभाल संस्थानों में फफूंद के निदान और पहचान के लिए पर्याप्त अवसंरचना उपलब्ध नहीं है।
- पारंपरिक संवेदनशीलता परीक्षण असामान्य प्रतिरोध तंत्रों, जैसे विरोधाभासी वृद्धि, को पूरी तरह से प्रदर्शित नहीं कर सकते।
- प्रतिरोध से संबंधित उत्परिवर्तनों की पहचान के लिए उन्नत जीनोमिक परीक्षण महँगे हो सकते हैं और उन्हें नियमित रूप से लागू करना कठिन हो सकता है।
- प्रभावी फफूंदरोधी दवाओं के सीमित वर्ग उपचार की विफलता के जोखिम को बढ़ाते हैं।
- कमजोर निगरानी के कारण उभरते हुए प्रतिरोधी फफूंद उपभेदों की पहचान में विलंब हो सकता है।
आगे की राह
- फफूंद की निगरानी का सुदृढ़ीकरण: उभरते हुए तथा दवा-प्रतिरोधी फफूंद रोगजनकों की निगरानी के लिए एकीकृत राष्ट्रीय निगरानी प्रणालियाँ स्थापित की जानी चाहिए।
- निदान में सुधार: विशेष रूप से तृतीयक स्वास्थ्य देखभाल अस्पतालों में फफूंद कल्चर, फफूंदरोधी संवेदनशीलता परीक्षण तथा जीनोमिक विधियों तक पहुँच का विस्तार किया जाना चाहिए।
- वन हेल्थ दृष्टिकोण: फफूंदरोधी प्रतिरोध का अध्ययन मानव, पशु और पर्यावरणीय पारिस्थितिक तंत्रों में समग्र रूप से किया जाना चाहिए, विशेषकर जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में।
स्रोत: TH
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