पाठ्यक्रम: जीएस-3/अर्थव्यवस्था
सन्दर्भ
- आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) 2025 से कोविड-19 महामारी के बाद 2020 से महिला श्रम बल भागीदारी दर (FLFPR) में महत्वपूर्ण वृद्धि का पता चलता है।
परिचय
- 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों के लिए समग्र FLFPR 2019-20 में 30% से बढ़कर 2025 में 40% हो गई।
- ग्रामीण क्षेत्रों में यह वृद्धि अधिक स्पष्ट रही, जहाँ FLFPR 33% से बढ़कर 45.9% हो गई, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 23.3% से बढ़कर 27.7% हुई।
- ग्रामीण क्षेत्रों में औसत वार्षिक प्रतिशत-बिंदु (AAPP) परिवर्तन: पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, गुजरात, ओडिशा, बिहार, राजस्थान और हरियाणा में AAPP अखिल भारतीय ग्रामीण औसत से अधिक दर्ज किया गया।
- शहरी क्षेत्रों में AAPP परिवर्तन: राजस्थान और गुजरात में विशेष रूप से मजबूत सुधार दर्ज किए गए। उत्तराखंड, केरल, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, ओडिशा, बिहार और आंध्र प्रदेश में भी AAPP अखिल भारतीय शहरी औसत से अधिक रहा।
- राज्यों के बीच तथा ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच महिला श्रम बल भागीदारी में सुधार की गति में काफी अंतर है।
- AAPP FLFPR में सुधार की गति को मापता है, लेकिन यह भागीदारी के पूर्ण स्तर को नहीं दर्शाता।
- किसी राज्य का AAPP कम हो सकता है क्योंकि वहाँ पहले से ही FLFPR का स्तर अधिक है, जबकि किसी अन्य राज्य में AAPP अधिक हो सकता है, लेकिन वहाँ कुल महिला श्रम बल भागीदारी अभी भी कम हो सकती है।
भारत में FLFPR में वृद्धि के लिए जिम्मेदार कारक
- स्वरोजगार और ग्रामीण आजीविका का विस्तार: वृद्धि का एक महत्वपूर्ण हिस्सा स्वरोजगार, पारिवारिक उद्यमों और कृषि गतिविधियों में बढ़ी हुई भागीदारी से जुड़ा है, विशेष रूप से ग्रामीण भारत में।
- महिला स्वयं सहायता समूहों (SHGs) का विस्तार: DAY-NRLM जैसी योजनाओं ने महिलाओं की ऋण, कौशल, उद्यमिता और विविध आजीविका के साधनों तक पहुँच का विस्तार किया है।
- रोजगार के अवसरों का विस्तार: विनिर्माण, सेवाओं, खुदरा, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और अन्य गैर-कृषि गतिविधियों जैसे क्षेत्रों में वृद्धि ने धीरे-धीरे महिलाओं के लिए रोजगार के अधिक अवसर पैदा किए हैं।
- महिलाओं की शिक्षा और कौशल में सुधार: बढ़ती शैक्षिक उपलब्धि और कौशल विकास कार्यक्रमों में अधिक भागीदारी ने महिलाओं की रोजगार क्षमता तथा श्रम बाजार में प्रवेश करने की उनकी आकांक्षाओं को बढ़ाया है।
- सामाजिक दृष्टिकोण और आकांक्षाओं में बदलाव: महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता, वित्तीय स्वायत्तता और उद्यमिता के प्रति बढ़ती जागरूकता ने धीरे-धीरे पारंपरिक लैंगिक भूमिकाओं को चुनौती दी है।
- ग्रामीण परिवारों में अधिक आर्थिक आवश्यकता: गरीब परिवारों के लिए महिलाओं की श्रम भागीदारी आय के एक महत्वपूर्ण अतिरिक्त स्रोत और आजीविका सुरक्षा का साधन हो सकती है।
- महिला रोजगार को समर्थन देने वाली सरकारी नीतियाँ: स्वयं सहायता समूहों, कौशल विकास, उद्यमिता, वित्तीय समावेशन और ग्रामीण आजीविका से जुड़ी पहलों ने महिलाओं की आर्थिक भागीदारी में आने वाली कुछ बाधाओं को कम किया है।
महिलाओं के नेतृत्व वाले विकास में बाधाएँ
- लैंगिक पूर्वाग्रह: प्रगति के बावजूद, कई महिलाओं को ऐसे रूढ़िबद्ध विचारों का सामना करना पड़ता है जो उनकी क्षमता और नेतृत्व कौशल पर सवाल उठाते हैं।
- कार्य-जीवन संतुलन: पेशेवर जिम्मेदारियों को पारंपरिक पारिवारिक भूमिकाओं के साथ संतुलित करना विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है, जिससे अक्सर अत्यधिक तनाव और थकान की स्थिति उत्पन्न होती है।
- उत्पीड़न और भेदभाव: कार्यस्थल पर उत्पीड़न अभी भी एक महत्वपूर्ण समस्या है, जो शत्रुतापूर्ण वातावरण पैदा करता है और महिलाओं को आत्मविश्वास के साथ अपनी बात रखने से हतोत्साहित करता है।
- शिक्षा तक पहुँच का अभाव: गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक सीमित पहुँच, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, लड़कियों के भविष्य के अवसरों को प्रभावित करती है।
- आर्थिक असमानता: महिलाओं को अक्सर वेतन में अंतर, सीमित रोजगार अवसर और असमान वित्तीय स्वतंत्रता का सामना करना पड़ता है।
- बाल विवाह: विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में बाल विवाह की व्यापकता महिलाओं के स्वास्थ्य, शिक्षा और स्वायत्तता को प्रभावित करती है।
श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए सरकारी पहल:
- प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (PMMY): PMMY के तहत महिलाएँ बिना किसी संपार्श्विक के सूक्ष्म ऋण प्राप्त कर छोटे उद्यम स्थापित कर सकती हैं। इससे महिलाओं को पूंजी तक पहुँच से संबंधित बाधाओं को दूर करने में सहायता मिलती है।
- बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना: यह योजना लैंगिक भेदभाव और हिंसा को रोकने के लिए कार्य करती है तथा लड़कियों के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण में बदलाव पर ध्यान केंद्रित करती है।
- यह शिक्षा, स्वास्थ्य और सशक्तीकरण को बढ़ावा देती है, जिससे अप्रत्यक्ष रूप से महिलाओं की श्रम बल में भागीदारी बढ़ती है।
- मातृत्व लाभ (संशोधन) अधिनियम, 2017: इस अधिनियम के तहत 10 से अधिक कर्मचारियों वाले प्रतिष्ठानों में कार्यरत महिलाओं के लिए मातृत्व अवकाश 12 सप्ताह से बढ़ाकर 26 सप्ताह कर दिया गया।
- नीति आयोग का महिला उद्यमिता मंच (WEP): यह मंच व्यवसाय में महिलाओं के लिए मार्गदर्शन, नेटवर्किंग, वित्त पोषण और कौशल विकास के अवसर प्रदान करता है।
- स्वयं सहायता समूह (SHGs) और राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM): NRLM अपने SHG घटक के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं को ऐसे समूह बनाने के लिए प्रोत्साहित करता है, जो ऋण, उद्यमिता प्रशिक्षण और विपणन के अवसरों तक पहुँच प्राप्त कर सकें।
- राष्ट्रीय क्रेच योजना: यह योजना कामकाजी माताओं, विशेष रूप से असंगठित क्षेत्र में कार्यरत महिलाओं को सहायता प्रदान करती है। इसके तहत आस-पास के स्थानों पर डे-केयर केंद्र स्थापित किए जाते हैं, जहाँ महिलाएँ काम के दौरान अपने बच्चों को छोड़ सकती हैं।
- मिशन शक्ति: यह महिला एवं बाल विकास मंत्रालय (MWCD) द्वारा 2021–2025 की अवधि के लिए शुरू किया गया महिला सशक्तीकरण कार्यक्रम है।
- इसका उद्देश्य महिलाओं के कल्याण, सुरक्षा और सशक्तीकरण के लिए हस्तक्षेपों को मजबूत करना तथा महिलाओं को राष्ट्र निर्माण में समान भागीदार बनाना है।
निष्कर्ष
- भारत में महिला श्रम बल भागीदारी दर (FLFPR) में वृद्धि अधिक आर्थिक सशक्तीकरण और अधिक समावेशी विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाती है।
- हालाँकि, इस गति को बनाए रखने के लिए केवल भागीदारी बढ़ाने से आगे बढ़कर गुणवत्तापूर्ण, उचित पारिश्रमिक वाले और सुरक्षित रोजगार सुनिश्चित करने की आवश्यकता है।
- वेतन में लैंगिक अंतर, कौशल विकास, बाल देखभाल, कार्यस्थल की सुरक्षा और औपचारिक रोजगार तक पहुँच में मौजूद अंतर को दूर करने से FLFPR में वृद्धि को स्थायी जनसांख्यिकीय और आर्थिक लाभांश में बदलने में सहायता मिल सकती है।
स्रोत: TH