पाठ्यक्रम: जीएस-3/कृषि
चर्चा में क्यों ?
- पुनर्योजी कृषि दीर्घकालिक कृषि उत्पादन, पर्यावरणीय स्थिरता और कृषि लाभप्रदता को समर्थन प्रदान कर रही है।
परिचय
- भारत के कृषि और संबद्ध क्षेत्रों में वित्त वर्ष 2016 से वित्त वर्ष 2025 के दौरान दशकीय आधार पर 4.45% की वृद्धि दर्ज की गई है।
- इस विस्तार को समर्थन देने के लिए कृषि की पारिस्थितिक जड़ों को पुनर्स्थापित करना आवश्यक है।
- गहन कृषि के कारण रसायनों का अत्यधिक उपयोग, मृदा स्वास्थ्य में गिरावट और अनियमित वर्षा जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं, जिससे कृषि आदानों की लागत बढ़ती है, जलवायु संबंधी झटके और गंभीर होते हैं तथा छोटे और सीमांत किसान अधिक संवेदनशील हो जाते हैं।
- हालाँकि, पुनर्योजी कृषि मृदा स्वास्थ्य और पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं को बहाल करने, जलवायु परिवर्तन के प्रति लचीलापन बढ़ाने तथा बाहरी आदानों पर निर्भरता को न्यूनतम करने में सहायता कर सकती है।
पुनर्योजी कृषि
- यह कृषि के लिए एक समग्र रणनीति है, जिसका उद्देश्य मृदा स्वास्थ्य को बहाल करना और जैव विविधता में सुधार करना है।
- इसका उद्देश्य कृषि प्रणालियों की दीर्घकालिक उत्पादकता और लचीलेपन को सुनिश्चित करना है। स्वस्थ मिट्टी अधिक खाद्य और पोषण प्रदान करती है, अधिक कार्बन का अवशोषण करती है तथा जैव विविधता का आश्रय होती है।

पुनर्योजी कृषि के अंतर्गत आने वाली प्रथाएँ
- सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियाँ: यह फॉगर्स, स्प्रिंकलर और ड्रिपर सहित विभिन्न माध्यमों से पौधों की जड़ों तक पानी पहुँचाती हैं। इससे पानी की बर्बादी कम होती है और जल उपयोग दक्षता बेहतर होती है।
- कृषि मशीनीकरण: कृषि में कुछ कृषि कार्यों को आसान और स्वचालित बनाने के लिए मशीनों और उपकरणों का उपयोग करना।
- यह पानी, ईंधन और उर्वरकों जैसे महत्वपूर्ण आदानों के उपयोग को अनुकूलित करने में मदद करता है, जिससे अपव्यय और कार्बन पदचिह्न कम होता है।
- नाइट्रोजन उर्वरक का प्रबंधन: इसका मुख्य उद्देश्य उपयुक्त उर्वरक का चयन करना और सही समय पर सही मात्रा में उसका उपयोग करना है।
- प्राकृतिक खेती: यह भारत की स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों पर आधारित और रसायनों से मुक्त कृषि पद्धति है।
- यह तकनीक देशी मवेशियों से प्राप्त सामग्री से तैयार बीजामृत, जीवामृत, घनजीवामृत, नीमास्त्र और दशपर्णी जैसे जैविक आदानों के उपयोग पर आधारित है।
- एकीकृत कृषि प्रणाली (IFS): यह कृषि उत्पादन प्रणालियों के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण है, जिसमें एक ही प्रणाली में एक से अधिक कृषि उद्यमों को एकीकृत किया जाता है।
- यह अंतरफसली खेती, फसल चक्र, बहुफसली खेती और मिश्रित खेती जैसी रणनीतियों को प्रोत्साहित करती है, जो संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग करती हैं।
- कृषि वानिकी: यह अधिक टिकाऊ और लाभदायक कृषि पद्धति विकसित करने के लिए फल एवं बागान फसलों को बारहमासी वृक्ष प्रणालियों के साथ एकीकृत करने की प्रक्रिया है।
- जलवायु-लचीली कृषि (CRA): यह उन प्रथाओं और प्रौद्योगिकियों को संदर्भित करती है, जो कृषि प्रणालियों की जलवायु परिवर्तन से संबंधित तनावों और झटकों से निपटने की क्षमता को बढ़ाती हैं।
पुनर्योजी कृषि के लाभ
- पर्यावरणीय प्रभाव
- मृदा का पुनर्स्थापन: पुनर्योजी दृष्टिकोण मृदा में जैविक पदार्थ, मृदा संरचना और दीर्घकालिक मृदा उर्वरता को बहाल करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप कृषि उत्पादकता बनी रहती है।
- जैव विविधता में सुधार: पुनर्योजी कृषि पद्धतियाँ परागणकर्ताओं, लाभकारी कीटों और मृदा सूक्ष्मजीवों की अधिक विविधता को बढ़ावा देती हैं। इससे संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र में सामंजस्य बना रहता है।
- जलवायु परिवर्तन का शमन: ये प्रौद्योगिकियाँ पर्यावरण से जितना कार्बन उत्सर्जित करती हैं, उससे अधिक कार्बन अवशोषित करती हैं, जिससे कृषि से होने वाले उत्सर्जन की प्रभावी रूप से भरपाई होती है।
- पुनर्योजी कृषि सतत विकास लक्ष्य (SDG) 13 — जलवायु कार्रवाई के साथ अत्यधिक अनुकूल है।
- जल दक्षता: स्वस्थ मिट्टी अधिक पानी धारण करती है, जिससे जल का बहाव कम होता है।
- यह मिट्टी के कटाव तथा नदियों और झीलों में तलछट एवं विषैले पदार्थों के पहुँचने को कम करके जलीय पारिस्थितिकी तंत्र को भी लाभ पहुँचाती है।
- आर्थिक और सामाजिक परिणाम
- लाभप्रदता: स्वस्थ मिट्टी का अर्थ है सिंथेटिक उर्वरकों, कीटनाशकों और सिंचाई की कम आवश्यकता।
- इससे कृषि आदानों की लागत कम होती है, उपज स्थिर रहती है और किसानों की शुद्ध आय बढ़ती है।
- रोजगार सृजन: पुनर्योजी कृषि खेती, परामर्श सेवाओं, प्रौद्योगिकी और पारिस्थितिक प्रबंधन के क्षेत्र में नए रोजगार के अवसर पैदा करती है।
- अधिक लचीलापन: पुनर्योजी कृषि वाले खेत जलवायु और बाजार की परिस्थितियों में होने वाले बदलावों के प्रति अधिक लचीले होते हैं।
चुनौतियाँ
- संक्रमण में देरी और अस्थायी उपज में कमी: प्राकृतिक रूप से मौजूद सूक्ष्मजीवी गतिविधियों को पुनर्स्थापित होने में 3 से 5 वर्ष लगते हैं; इसलिए उपज में कुछ समय के लिए कमी आ सकती है, जिसके बाद उपज में सुधार होकर वह आदान लागत से अधिक हो सकती है।
- प्रारंभिक पूंजी की अधिक आवश्यकता: विशेष उपकरण, जैसे बिना जुताई वाली बीज ड्रिल या चक्रीय पशुधन चराई के लिए बाड़, के लिए शुरुआत में पर्याप्त निवेश की आवश्यकता होती है।
- ज्ञान और श्रम की कमी: सामान्य रासायनिक कृषि कार्यक्रम फसलों की विविधता और चक्रीय चराई की आवश्यकताओं के अनुकूल नहीं होते। इनके लिए व्यापक क्षेत्रीय कृषि संबंधी ज्ञान की आवश्यकता होती है।
- नीति और प्रमाणन में अंतराल: कई क्षेत्रों में अभी भी पारंपरिक रसायन-प्रधान वाणिज्यिक फसलें उगाई जा रही हैं और आधिकारिक पुनर्योजी कृषि प्रमाणन की प्रक्रिया अभी चल रही है।
लक्षित हस्तक्षेप
- राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन: इसकी घोषणा 2024 में की गई थी। इसका उद्देश्य किसानों को धीरे-धीरे प्राकृतिक खेती की ओर स्थानांतरित करने में सहायता के लिए एक सक्षम समर्थन पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना है।
- इसके तहत अधिकतम एक एकड़ प्रति किसान के लिए दो वर्षों तक प्रत्येक वर्ष ₹4,000 प्रति एकड़ का उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन दिया जाता है।
- इसमें किसानों को जीवामृत और बीजामृत जैसे जैविक आदानों तक सरल पहुँच सुनिश्चित करने के लिए आवश्यकता-आधारित 10,000 जैव-इनपुट संसाधन केंद्र स्थापित करने की परिकल्पना की गई है।
- परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY): 2015 में शुरू की गई यह योजना भारत के जैविक कृषि आंदोलन का एक प्रमुख स्तंभ बन गई है।
- प्रति बूंद अधिक फसल: देश में 2015-16 से प्रति बूंद अधिक फसल (PDMC) योजना लागू की जा रही है।
- यह सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों, विशेष रूप से ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई, के माध्यम से खेतों में जल उपयोग की दक्षता बढ़ाने को प्रोत्साहित करती है।
- वर्षा आधारित क्षेत्र विकास परियोजना (RADP): इसे 2014-15 से एकीकृत कृषि प्रणाली (IFS) के समर्थन के लिए क्षेत्र-आधारित क्लस्टर तकनीक के माध्यम से लागू किया गया है।
- इसमें मौजूदा पद्धतियों के अधिक प्रभावी उपयोग और समुदाय की अधिक भागीदारी को शामिल किया गया है। किसानों को IFS प्रणाली अपनाने के लिए प्रति परिवार ₹30,000 की प्रोत्साहन राशि दी जाती है।
- प्रत्येक क्लस्टर को प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण गतिविधियों में सहायता के लिए ₹10,000 का वजीफा भी दिया जाएगा।
- कृषि वानिकी पर उप-मिशन: पूर्ववर्ती कृषि वानिकी पर उप-मिशन (SMAF) को 2023-24 से प्रधानमंत्री राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (PM-RKVY) के अंतर्गत कृषि वानिकी घटक के रूप में पुनर्गठित किया गया है।
- यह किसानों के लिए गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री (QPM) उपलब्ध कराने हेतु कृषि वानिकी नर्सरियों की स्थापना को प्रोत्साहित करता है।
- मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना: मृदा स्वास्थ्य कार्ड (SHC) योजना 2015 में शुरू की गई थी और यह वैज्ञानिक परीक्षण के माध्यम से किसानों को प्रत्येक भू-स्वामित्व के लिए भूखंड-वार मृदा परीक्षण के निष्कर्ष उपलब्ध कराती है।
स्रोत :PIB