संक्षिप्त समाचार 22-08-2026

प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान (PM-AASHA)

पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था

समाचार में 

  • PM-AASHA किसानों को सुनिश्चित खरीद, मूल्य स्थिरीकरण तथा प्रभावी बाजार हस्तक्षेप के माध्यम से सहायता प्रदान करने के लिए एक सुदृढ़ एवं व्यवस्थित तंत्र के रूप में उभरा है।

प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान (PM-AASHA)

  • इसे सितंबर 2018 में शुरू किया गया था। यह विभिन्न फसलों एवं विभिन्न बाजार परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अनेक मूल्य-सहायता तंत्रों को एकीकृत करता है।
  • यह एक ऐसा ढाँचा है, जिसके माध्यम से सरकार किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य सुनिश्चित करने का प्रयास करती है।
  • इसका उद्देश्य किसानों को मजबूरी में कम कीमत पर उपज बेचने से बचाना तथा उपभोक्ताओं के लिए कीमतों में स्थिरता बनाए रखना है।

घटक

  • यह चार प्रमुख घटकों को एकीकृत करता है—मूल्य समर्थन योजना (PSS), मूल्य स्थिरीकरण कोष (PSF), मूल्य अंतर भुगतान योजना (PDPS) तथा बाजार हस्तक्षेप योजना (MIS)।
  • मूल्य समर्थन योजना (PSS): इसके अंतर्गत बाजार कीमतों में गिरावट आने पर दलहन, तिलहन एवं खोपरा की न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर खरीद की जाती है, ताकि किसानों को संकटपूर्ण बिक्री से बचाया जा सके। 2024-25 से अरहर (तूर), उड़द और मसूर की राज्य के उत्पादन की 100% तक मात्रा की खरीद की जा सकती है।
  • मूल्य स्थिरीकरण कोष (PSF): इसके अंतर्गत दलहन, प्याज और आलू सहित आवश्यक वस्तुओं का बफर स्टॉक रखा जाता है, ताकि उनकी कीमतों में स्थिरता बनाए रखी जा सके।
  • मूल्य अंतर भुगतान योजना (PDPS): इस योजना के अंतर्गत MSP और बाजार मूल्य के बीच के अंतर की राशि किसानों को भुगतान की जाती है। इसमें मुख्यतः तिलहनों को शामिल किया जाता है तथा भौतिक रूप से उपज की खरीद नहीं की जाती।
  • बाजार हस्तक्षेप योजना (MIS): इसका उद्देश्य टमाटर, प्याज और आलू जैसी शीघ्र खराब होने वाली कृषि उपज के किसानों को बाजार में कीमतों में भारी गिरावट या अत्यधिक आपूर्ति की स्थिति में सहायता प्रदान करना है।

उद्देश्य

  • किसानों को उनकी उपज के लिए अधिक मूल्य आश्वासन प्रदान करना तथा संकटपूर्ण बिक्री को कम करना।
  • उपभोक्ताओं के लिए मूल्य स्थिरता की आवश्यकता के साथ कृषि बाजारों को सुदृढ़ करना।
  • MSP और किसानों द्वारा वास्तव में प्राप्त कीमत के बीच संबंध को सुदृढ़ करना।
  • कृषि आय को प्रभावित करने वाली विभिन्न परिस्थितियों का समाधान करना।

स्रोत: DD

टेरियर साइबर क्वेस्ट 2026 

पाठ्यक्रम: GS3/आंतरिक सुरक्षा

समाचार में 

  • प्रादेशिक सेना ने साइबरपीस(CyberPeace) के सहयोग से टेरियर साइबर क्वेस्ट 2026 (TCQ 3.0) का शुभारंभ किया है।

टेरियर साइबर क्वेस्ट

  • यह एक राष्ट्रीय स्तर की हैकाथॉन है, जिसका उद्देश्य समकालीन रक्षा, साइबर सुरक्षा तथा सूचना क्षेत्र से संबंधित चुनौतियों के लिए नवीन समाधान विकसित करना है।
  • इसका उद्देश्य शिक्षण संस्थानों, उद्योग, अनुसंधान संस्थानों, सरकारी संगठनों तथा सशस्त्र बलों की तकनीकी प्रतिभाओं को एक मंच पर लाना है।
  • यह कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), साइबर सुरक्षा, खतरा न्यूनीकरण तथा डिजिटल जागरूकता जैसे उभरते क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करेगा तथा राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित स्वदेशी समाधानों के विकास को प्रोत्साहित करेगा।

नवीनतम घटनाक्रम 

  • TCQ 3.0 का आयोजन तीन प्रतियोगिता श्रेणियों में किया जाएगा:
    • बग हंटिंग : यह साइबर सुरक्षा चुनौती ऑनलाइन कैप्चर-द-फ्लैग (CTF) क्वालीफायर से शुरू होगी और प्रत्यक्ष लाइव सैंडबॉक्स फिनाले के साथ समाप्त होगी।
      • प्रतिभागियों को अनुकरण किए गए महत्वपूर्ण अवसंरचना परिवेशों में उपस्थित कमजोरियों की पहचान कर उनका दस्तावेजीकरण करना होगा।
    • AI कवच : यह कृत्रिम बुद्धिमत्ता एवं मशीन लर्निंग आधारित चुनौती है, जिसका उद्देश्य पूर्वानुमानात्मक खतरा आसूचना, स्वचालित रक्षा तंत्र तथा विसंगति पहचान के लिए समाधान विकसित करना है।
    • क्रिएटर्स चैलेंज : यह डिजिटल मीडिया एवं कहानी-वाचन प्रतियोगिता है, जिसमें कंटेंट क्रिएटर्स, संचारकर्मियों एवं प्रभावशाली व्यक्तियों को डीपफेक, फिशिंग, ऑनलाइन धोखाधड़ी तथा दुष्प्रचार जैसे खतरों के संबंध में प्रभावी जागरूकता अभियानों के विकास के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।

स्रोत: PIB

स्वाइन फ्लू के बढ़ते मामले 

पाठ्यक्रम: GS2/स्वास्थ्य

समाचार में 

  • दिल्ली में स्वाइन फ्लू के 1,777 पुष्ट मामले सामने आए हैं। अस्पतालों ने विगत दो सप्ताह के दौरान सभी आयु वर्गों में बीमारी के मामलों में वृद्धि की सूचना दी है।

स्वाइन इन्फ्लुएंजा

  • स्वाइन इन्फ्लुएंजा सूअरों में होने वाला एक श्वसन संबंधी रोग है, जो टाइप-A इन्फ्लुएंजा वायरस के कारण होता है। ये वायरस नियमित रूप से सूअरों में इन्फ्लुएंजा के प्रकोप का कारण बनते हैं।
  • इसके सबसे सामान्य उपप्रकार H1N1, H1N2 और H3N2 हैं।
    • वर्ष 2009 में यह एक वैश्विक महामारी का कारण बना था। इसके बाद से H1N1, H3N2 तथा इन्फ्लुएंजा-B के कुछ स्ट्रेन विश्वभर में प्रमुख रूप से प्रसारित होते रहे हैं।
  • मनुष्यों में संक्रमण: यह एक संक्रामक रोग है और एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैल सकता है, हालाँकि इसके प्रसार की तीव्रता अलग-अलग हो सकती है।
    • यह मुख्यतः खाँसने और छींकने के माध्यम से फैलता है। संक्रमित सतह को छूने के बाद उसी हाथ से मुँह या नाक को छूने पर भी संक्रमण हो सकता है।
    • स्वाइन इन्फ्लुएंजा उत्तर एवं दक्षिण अमेरिका, यूरोप तथा एशिया के कुछ हिस्सों में सामान्य रूप से पाया जाता है। अफ्रीका में भी इसके मामले सामने आए हैं।

रोकथाम एवं उपचार 

  • इसका उपचार मुख्यतः सहायक उपचार पर आधारित होता है। यह एक वायरल संक्रमण है, इसलिए एंटीबायोटिक दवाएँ इस पर प्रभावी नहीं होती हैं।
  • यदि एंटीवायरल दवा ओसेल्टामिविर का सेवन संक्रमण के शुरुआती चरण में किया जाए, तो बीमारी की गंभीरता को कम किया जा सकता है। इसलिए समय पर चिकित्सकीय सहायता लेना और जाँच करवाना महत्वपूर्ण है।
  • बुखार को पैरासिटामोल के माध्यम से नियंत्रित किया जा सकता है।
  • भारत में चतु:संयोजी इन्फ्लुएंजा वैक्सीन उपलब्ध है। प्रत्येक वर्ष टीकाकरण का परामर्श विशेष रूप से 60 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्तियों तथा कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली वाले लोगों को दी जाती है, क्योंकि इन्फ्लुएंजा के स्ट्रेन में प्रायः बदलाव होते रहते हैं और उसी के अनुसार टीकों को भी अद्यतन किया जाता है।

स्रोत:IE

मोबाइल फोन विनिर्माण योजना 

पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था

संदर्भ

  • इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने ₹62,500 करोड़ के बजटीय परिव्यय के साथ मोबाइल फोन विनिर्माण योजना (MPMS) को अधिसूचित किया है।

मोबाइल फोन विनिर्माण योजना (MPMS) के बारे में

  • इस योजना का उद्देश्य विनिर्माण के पैमाने का विस्तार करना, घरेलू आपूर्ति शृंखलाओं को सुदृढ़ करना तथा भारतीय मोबाइल फोन ब्रांडों को स्वदेशी प्रौद्योगिकी, बौद्धिक संपदा एवं डिजाइन क्षमताओं के विकास में सहायता प्रदान करना है।

MPMS की प्रमुख विशेषताएँ 

  • इस योजना के अंतर्गत दो लक्षित खंड हैं:
    • लक्षित खंड 1 (TS1): यह मोबाइल फोन विनिर्माण को प्रोत्साहित करता है तथा 2.25% से 5% तक अलग-अलग दर पर प्रोत्साहन प्रदान करता है।
    • लक्षित खंड 2 (TS2): यह भारतीय मोबाइल फोन ब्रांडों को सहायता प्रदान करता है। इसके अंतर्गत भारतीय ब्रांडों के लिए 5% प्रोत्साहन तथा भारतीय डिजाइन और अनुसंधान एवं विकास (R&D) के लिए अतिरिक्त 3% प्रोत्साहन प्रदान किया जाता है।
      • इसके अतिरिक्त, योजना के अंतर्गत भारतीय ब्रांडों को गैर-वित्तीय सहायता भी प्रदान की जाएगी।
        • TS2 के अंतर्गत आवेदकों को 1 वर्ष की प्रारंभिक तैयारी अवधि प्रदान की जा सकती है।
  • अवधि: योजना की अवधि 5 वर्ष, अर्थात वित्तीय वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक होगी।
  • अतिरिक्त प्रोत्साहन: योजना के अंतर्गत दोनों लक्षित खंडों के लिए प्रमुख घटकों/उप-असेंबली की घरेलू खरीद पर अधिकतम 1.5% का अतिरिक्त प्रोत्साहन प्रदान किया जाएगा।
    • योजना के अंतर्गत आवेदक भारत में पंजीकृत मोबाइल फोन निर्माता होंगे, जिनमें इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण सेवा (EMS) प्रदाता भी शामिल हैं।

पात्रता मानदंड 

  • TS1 के अंतर्गत भारत में पंजीकृत मोबाइल फोन निर्माताओं, जिनमें EMS कंपनियाँ भी शामिल हैं, का वित्तीय वर्ष 2025-26 में न्यूनतम ₹10,000 करोड़ का कारोबार होना आवश्यक है।
    • वर्तमान ब्रांडों को वित्तीय वर्ष 2025-26 के बिक्री स्तर से अतिरिक्त कम-से-कम ₹5,000 करोड़ की वार्षिक बिक्री प्राप्त करनी होगी।
    • किसी नए ब्रांड को भारत में ₹10,000 करोड़ की वार्षिक बिक्री प्राप्त करने के बाद पात्र माना जाएगा तथा इसके पश्चात उसे वर्ष-दर-वर्ष ₹5,000 करोड़ की निर्धारित बिक्री सीमा पूरी करनी होगी।
  • TS2 के अंतर्गत आवेदकों का वित्तीय वर्ष 2025-26 में न्यूनतम ₹1,000 करोड़ का कारोबार होना चाहिए तथा उन्हें भारतीय ब्रांड के लिए निर्धारित मानदंडों को पूरा करना होगा।

अपेक्षित परिणाम 

  • योजना की अवधि के दौरान भारत में मोबाइल फोन का संचयी उत्पादन लगभग ₹39 लाख करोड़ तक पहुँचने की संभावना है।
  • MPMS से लगभग 60,000 प्रत्यक्ष रोजगार सृजित होने की संभावना है, जिससे वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण केंद्र के रूप में भारत की स्थिति सुदृढ़ होगी।

इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण में वृद्धि

  • भारत वर्तमान में मात्रा के आधार पर विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन निर्माता है। देश में उपयोग किए जाने वाले मोबाइल फोन में से 99.2% का विनिर्माण घरेलू स्तर पर किया जाता है।
  • बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण के लिए उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन योजना (PLI-LSEM) ने भारत को मोबाइल फोन विनिर्माण एवं निर्यात के वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस योजना की अवधि 31 मार्च 2026 को समाप्त हो गई।

स्रोत: PIB, DD News

VB-G RAM G की प्रगति एवं MGNREGA से तुलना

पाठ्यक्रम: GS2/शासन

संदर्भ 

  • सर्वोच्च न्यायालय ने निरस्त किए गए महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) की सराहना करते हुए इसे एक कल्याणकारी योजना बताया और इस विषय पर विचार किया कि क्या काम के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मौलिक अधिकार का दर्जा दिया जा सकता है।

VB-G RAM G के बारे में

  • इसने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, 2005 (MGNREGA) का स्थान लिया है।
    • यह बदलाव “मांग-आधारित ढाँचे” से “आपूर्ति-आधारित योजना” की ओर परिवर्तन को दर्शाता है।
  • विस्तारित आजीविका गारंटी: यह प्रत्येक वित्तीय वर्ष में प्रत्येक ग्रामीण परिवार के लिए अकुशल शारीरिक श्रम करने के इच्छुक वयस्क सदस्यों को 100 दिनों से बढ़ाकर 125 दिनों की वैधानिक मजदूरी रोजगार गारंटी प्रदान करेगा।
  • केंद्र प्रायोजित योजना: यह योजना केंद्र प्रायोजित योजना के रूप में लागू की जाएगी। इसके अंतर्गत पूर्वोत्तर एवं हिमालयी राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के लिए 90:10 तथा अन्य सभी राज्यों के लिए 60:40 के अनुपात में वित्तीय भागीदारी होगी।
  • कृषि के चरम मौसम को सुनिश्चित करना: राज्यों को वित्तीय वर्ष में कुल 60 दिनों की ऐसी अवधि पहले से अधिसूचित करने का अधिकार होगा, जो बुवाई एवं कटाई के चरम समय को कवर करेगी। इस अवधि में अधिनियम के अंतर्गत कार्य नहीं किए जाएंगे, जिससे महत्वपूर्ण कृषि मौसम में पर्याप्त कृषि श्रम उपलब्ध कराया जा सके।
  • राज्यों को आवश्यकता-आधारित आवंटन: राज्य पंचायतों की श्रेणी तथा स्थानीय विकास आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए जिलों एवं ग्राम पंचायतों के बीच निधियों का पारदर्शी और आवश्यकता-आधारित आंतरिक वितरण सुनिश्चित करेंगे।
  • बेरोजगारी भत्ता: यदि पात्र आवेदकों को निर्धारित अवधि के अंदर काम उपलब्ध नहीं कराया जाता है, तो राज्य सरकारों के लिए बेरोजगारी भत्ते का भुगतान करना अनिवार्य होगा।
  • VGPP आधारित योजना निर्माण: योजना निर्माण विकसित ग्राम पंचायत योजनाओं (VGPPs) के माध्यम से किया जाएगा। इन्हें ग्राम पंचायतों द्वारा तैयार किया जाएगा तथा राष्ट्रीय स्थानिक योजना प्रणालियों के साथ एकीकृत किया जाएगा।
  • संस्थागत निगरानी: कानून के प्रावधानों की समीक्षा, निगरानी तथा प्रभावी कार्यान्वयन के लिए क्रमशः केंद्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी परिषद तथा राज्य ग्रामीण रोजगार गारंटी परिषदों का गठन किया जाएगा।

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA)

  • महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA), 2005 ग्रामीण परिवारों को कानूनी रूप से मजदूरी रोजगार की गारंटी प्रदान करता था।
  • इसे वर्ष 2006 में लागू किया गया तथा वर्ष 2009 में इसका नाम बदलकर MGNREGA कर दिया गया।
  • इसका प्रमुख उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों के उन सभी परिवारों को प्रत्येक वित्तीय वर्ष में कम-से-कम 100 दिनों का सुनिश्चित मजदूरी रोजगार प्रदान करके ग्रामीण लोगों की आजीविका स्थिरता को बढ़ावा देना था, जिनके वयस्क सदस्य अकुशल शारीरिक श्रम करने के इच्छुक हों।
  • कार्यान्वयन: यह एक मांग-आधारित एवं अधिकार-आधारित कार्यक्रम था, जिसका मुख्यतः ग्राम पंचायतों के माध्यम से कार्यान्वयन किया जाता था।
  • भत्ते: यदि काम उपलब्ध कराने में 15 दिनों से अधिक की देरी होती थी, तो बेरोजगारी भत्ता देय होता था। साथ ही, कम-से-कम एक-तिहाई (33%) प्रतिभागियों का महिलाएँ होना सुनिश्चित किया जाता था।

नए ढाँचे से संबंधित चिंताएँ 

  • मांग-आधारित से आवंटन-आधारित दृष्टिकोण: केंद्र के बढ़े हुए नियंत्रण से ग्रामीण रोजगार की अधिकार-आधारित प्रकृति कमजोर हो सकती है।
  • राज्यों पर बढ़ा वित्तीय भार: MGNREGA के अंतर्गत केंद्र की अपेक्षाकृत अधिक वित्तीय भागीदारी की तुलना में अधिकांश राज्यों को अब व्यय का 40% हिस्सा वहन करना होगा।
  • रोजगार सृजन: रोजगार के गारंटी वाले दिनों में वृद्धि के बावजूद VB-G RAM G अधिनियम के अंतर्गत रोजगार सृजन में 50% की कमी आई है।

काम के अधिकार के रूप में मौलिक अधिकार

  • भारतीय संविधान काम के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता नहीं देता है।
  • संविधान के भाग IV के अनुच्छेद 41 में राज्य को अपनी आर्थिक क्षमता एवं विकास की सीमाओं के अंदर बेरोजगारी, वृद्धावस्था, बीमारी, दिव्यांगता अथवा अन्य अनुचित अभाव की स्थितियों में काम, शिक्षा तथा सार्वजनिक सहायता के अधिकार को सुरक्षित करने का निर्देश दिया गया है।
    • यह राज्य के नीति-निदेशक तत्वों (DPSPs) का हिस्सा है और इसलिए न्यायालयों द्वारा सीधे प्रवर्तनीय नहीं है।
  • हालाँकि, यह तर्क दिया जा रहा है कि रोजगार गरिमापूर्ण जीवन के लिए आवश्यक है, जो अनुच्छेद 21 की व्यापक व्याख्या का हिस्सा है।

स्रोत: TH

GST अपीलीय न्यायाधिकरण (GSTAT)

पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था

संदर्भ

  • GST अपीलीय न्यायाधिकरण (GSTAT) के समक्ष अपेक्षा से कम संख्या में मामले दायर किए गए हैं।

GSTAT के बारे में 

  • यह केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम (CGST Act), 2017 के अंतर्गत स्थापित एक वैधानिक अर्ध-न्यायिक निकाय है।
    • GSTAT का ई-फाइलिंग पोर्टल वर्ष 2025 में परिचालन में लाया गया था तथा समय-सीमा से बाहर हो चुके मामलों में अपील दायर करने की अंतिम तिथि 31 जुलाई 2026 निर्धारित की गई थी।
  • GSTAT दूसरा अपीलीय प्राधिकरण है और करदाताओं तथा कर अधिकारियों के बीच विवादों के समाधान के लिए एकीकृत मंच प्रदान करता है।
  • वहीं, प्रथम अपीलीय प्राधिकरण के रूप में आयुक्त (अपील) स्तर का अधिकारी होता है, जिसके समक्ष करदाता किसी कनिष्ठ अधिकारी द्वारा जारी आदेश अथवा निर्णय के विरुद्ध अपील कर सकता है।
  • GSTAT ने राजस्व विभाग एवं वित्त मंत्रालय के साथ परामर्श के बाद एक टोकन प्रणाली शुरू की थी।
    • इसके अंतर्गत उन व्यवसायों को, जिनके मामलों की समय-सीमा 31 जुलाई को समाप्त हो रही थी, ई-फाइलिंग पोर्टल पर टोकन जारी करने की सुविधा दी गई।
    • टोकन जारी होने के बाद संबंधित व्यवसायों को अपील न्यायाधिकरण के समक्ष मामला दायर करने के लिए 60 दिनों का समय दिया गया।

स्रोत: IE

प्रारंभिक स्तर की न्यायिक सेवा के लिए पात्रता मानदंड

पाठ्यक्रम: GS2/न्यायपालिका

संदर्भ 

  • सर्वोच्च न्यायालय ने 2025 के अपने निर्णय को बरकरार रखा है, जिसमें अधीनस्थ न्यायपालिका में प्रवेश से पहले पूर्व पेशेवर अनुभव की आवश्यकता निर्धारित की गई थी। हालांकि, न्यायालय ने इस आवश्यकता के लागू होने के तरीके में महत्वपूर्ण परिवर्तन किया है।

पृष्ठभूमि

  • शेट्टी आयोग ने वर्ष 2002 में तीन वर्ष की वकालत संबंधी अनिवार्यता को समाप्त करने की सिफारिश की थी।
    • आयोग का तर्क था कि विधि के विद्यार्थी पहले से ही इंटर्नशिप एवं व्यावहारिक प्रशिक्षण के माध्यम से न्यायालयों की कार्यप्रणाली से परिचित होते हैं और इसलिए तीन वर्ष का अनिवार्य वकालती अनुभव आवश्यक नहीं है।
    • सर्वोच्च न्यायालय ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए नए विधि स्नातकों को स्नातक की उपाधि प्राप्त करने के तुरंत बाद न्यायिक भर्ती प्रक्रिया में भाग लेने के लिए पात्र बना दिया था।
  • मई 2025 में, सर्वोच्च न्यायालय ने इस शर्त को पुनः लागू किया कि सिविल जज (कनिष्ठ प्रभाग) परीक्षा में शामिल होने वाले अभ्यर्थियों के लिए परीक्षा देने से पहले बार में तीन वर्ष का अनुभव होना आवश्यक है।

नवीनतम घटनाक्रम

  • सर्वोच्च न्यायालय का अब भी यह मत है कि नए विधि स्नातकों को न्यायालयों के कामकाज का पूर्व अनुभव प्राप्त किए बिना अधीनस्थ न्यायपालिका में प्रवेश नहीं करना चाहिए।
  • इसके पीछे तर्क: इसका मूल आधार यह है कि सिविल जज अपने करियर के प्रारंभिक चरण से ही जीवन, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, संपत्ति तथा व्यक्तिगत अधिकारों से संबंधित मामलों का निर्णय करते हैं।
  • अभ्यर्थियों के लिए न्यायिक सेवा परीक्षा में शामिल होने से पहले तीन वर्ष का प्रासंगिक अनुभव अनिवार्य होगा।
    • इस अवधि की गणना अभ्यर्थी के राज्य बार काउंसिल में नामांकन की तिथि से की जाएगी।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित नया ढाँचा 

  • अप्रैल 2027 से, अभ्यर्थियों के लिए परीक्षा में शामिल होने से पहले कम-से-कम एक वर्ष का वास्तविक वकालती अनुभव होना आवश्यक होगा। इस अनुभव को उच्च न्यायालयों द्वारा निर्धारित तंत्र के अंतर्गत प्रमाणित किया जाएगा।
    • इसके बाद भी चयनित अभ्यर्थियों को नियमित न्यायिक दायित्व संभालने से पहले एक वर्ष का अकादमी प्रशिक्षण तथा एक वर्ष का क्लर्कशिप कार्यक्रम पूरा करना होगा।
  • न्यायालय ने स्नातकोत्तर शिक्षा की अवधि को इस अनुभव की आवश्यकता में शामिल करने से भी मना किया है। न्यायालय के अनुसार, शैक्षणिक अध्ययन न्यायालयों की कार्यप्रणाली से व्यावहारिक परिचय का विकल्प नहीं हो सकता।
  • न्यायालय ने निर्देश दिया है कि यह नया ढाँचा पाँच वर्षों तक लागू रहेगा, जिसके बाद इसकी प्रभावशीलता की समीक्षा की जाएगी।

स्रोत: IE

विरासत ग्राम 

पाठ्यक्रम: GS2/सरकारी पहल

समाचार में 

  • ओडिशा सरकार ने घोषणा की है कि अंगुल जिले के तालचेर के निकट स्थित गुरूजांग गाँव, जो स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की जन्मस्थली है, को एक विरासत ग्राम के रूप में विकसित किया जाएगा।

समाचार के बारे में अधिक जानकारी 

  • विश्व हिंदू परिषद के नेता स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की वर्ष 2008 में वामपंथी उग्रवादियों द्वारा हत्या कर दी गई थी। उन पर धार्मिक वैमनस्य को बढ़ावा देने के आरोप लगाए गए थे।

विरासत ग्राम क्या हैं और ये सामान्य गाँवों से किस प्रकार भिन्न हैं?

  • विरासत ग्राम ऐसे पारंपरिक ग्रामीण बस्तियाँ होती हैं, जिन्हें उनकी विशिष्ट सांस्कृतिक विरासत, परंपराओं, वास्तुकला एवं जीवनशैली को संरक्षित और प्रदर्शित करने के उद्देश्य से विकसित या संरक्षित किया जाता है।
  • सामान्य गाँवों के विपरीत, जहाँ समय के साथ विकास एवं आधुनिकीकरण के कारण बस्ती की प्रकृति स्वाभाविक रूप से बदलती रहती है, विरासत ग्रामों में सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण पर अधिक बल दिया जाता है।
  • ये गाँव सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ावा देते हैं तथा आगंतुकों को स्थानीय समुदाय की पारंपरिक जीवनशैली, वास्तुकला, हस्तशिल्प, त्योहारों एवं प्रथाओं का अनुभव करने का अवसर प्रदान करते हैं।
  • विरासत संरक्षण में दोनों प्रकार की विरासत शामिल हो सकती है:
    • मूर्त विरासत: पारंपरिक घर, वास्तुकला, स्मारक तथा कलाकृतियाँ।
    • अमूर्त विरासत : रीति-रिवाज, त्योहार, लोककथाएँ, हस्तशिल्प, संगीत तथा पारंपरिक ज्ञान।
  • उदाहरण: हिमाचल प्रदेश का प्रागपुर व्यापक रूप से भारत के प्रथम विरासत ग्राम के रूप में जाना जाता है।
    • अन्य उदाहरणों में किसामा (नागालैंड), रेइक (मिजोरम) तथा खासी हेरिटेज विलेज (मेघालय) शामिल हैं।

स्रोत: TH

पॉलीसिलिकॉन 

पाठ्यक्रम: GS3/विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी; अर्थव्यवस्था

संदर्भ 

  • भारत सरकार पॉलीसिलिकॉन विनिर्माण के लिए एक सहायता योजना शुरू करने की योजना बना रही है। इसका लक्ष्य वर्ष 2030 तक 30 GW की घरेलू क्षमता विकसित करना है। घरेलू सौर ऊर्जा मूल्य शृंखला को सुदृढ़ करने के लिए इस क्षेत्र में ₹25,000 करोड़ से अधिक के निवेश का लक्ष्य रखा गया है।

पॉलीसिलिकॉन के बारे में

  • पॉलीसिलिकॉन, जिसे बहुक्रिस्टलीय सिलिकॉन या संक्षेप में Poly-Si भी कहा जाता है, सिलिकॉन का अत्यधिक शुद्ध रूप है और सौर फोटोवोल्टिक (PV) विनिर्माण में प्रयुक्त मूल कच्चा माल है।
  • यह पारंपरिक सौर विनिर्माण शृंखला का अपस्ट्रीम तथा अत्यधिक विद्युत-गहन चरण है।
  • पॉलीसिलिकॉन को इंगट में परिवर्तित किया जाता है, जिन्हें काटकर वेफर बनाए जाते हैं। इसके बाद वेफरों को सौर सेल में प्रसंस्कृत किया जाता है और इन सौर सेल को जोड़कर सौर मॉड्यूल तैयार किए जाते हैं।
  • वैश्विक पॉलीसिलिकॉन उत्पादन में चीन का प्रभुत्व है। वैश्विक उत्पादन में चीन की हिस्सेदारी लगभग 94% है। इसके बाद जर्मनी और अमेरिका का स्थान है।
    • वर्तमान में भारत में वाणिज्यिक स्तर पर पॉलीसिलिकॉन के उत्पादन की महत्वपूर्ण क्षमता उपलब्ध नहीं है और इस महत्वपूर्ण अपस्ट्रीम कच्चे माल के लिए भारत अत्यंत सीमा तक आयात पर निर्भर है।

स्रोत: TH

 

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पाठ्यक्रम: GS3/ऊर्जा संदर्भ गन्ने और खाद्यान्नों को इथेनॉल उत्पादन की ओर मोड़े जाने से चीनी एवं खाद्य वस्तुओं की बढ़ती कीमतों को लेकर चिंताएँ उत्पन्न हुई हैं। यह भारत के इथेनॉल-मिश्रण कार्यक्रम के अंतर्गत ऊर्जा सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा के बीच संतुलन की आवश्यकता को रेखांकित करता है। इथेनॉल क्या है? इथेनॉल 99.9% शुद्ध अल्कोहल...
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