पाठ्यक्रम: GS3/ऊर्जा
संदर्भ
- गन्ने और खाद्यान्नों को इथेनॉल उत्पादन की ओर मोड़े जाने से चीनी एवं खाद्य वस्तुओं की बढ़ती कीमतों को लेकर चिंताएँ उत्पन्न हुई हैं। यह भारत के इथेनॉल-मिश्रण कार्यक्रम के अंतर्गत ऊर्जा सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा के बीच संतुलन की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
इथेनॉल क्या है?
- इथेनॉल 99.9% शुद्ध अल्कोहल है, जिसे पेट्रोल के साथ मिश्रित किया जा सकता है। इसका उत्पादन गन्ना, मक्का, गेहूँ आदि उच्च स्टार्च वाली फसलों से किया जा सकता है।
- अल्कोहल उत्पादन में यीस्ट की सहायता से शर्करा का किण्वन किया जाता है। गन्ने के रस या शीरे में शर्करा सुक्रोज के रूप में उपस्थित होती है, जो टूटकर ग्लूकोज और फ्रुक्टोज में परिवर्तित हो जाती है।
इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम
- इथेनॉल मिश्रण से आशय पेट्रोल में इथेनॉल को मिलाकर ऐसा ईंधन मिश्रण तैयार करने की प्रक्रिया से है, जिसका उपयोग आंतरिक दहन इंजन में किया जा सकता है।
- सरकार द्वारा वर्ष 2018 में अधिसूचित ‘राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति’ में वर्ष 2030 तक पेट्रोल में 20% इथेनॉल मिश्रण का सांकेतिक लक्ष्य निर्धारित किया गया था।
- वर्ष 2014 में भारत में पेट्रोल के साथ केवल 1.5% इथेनॉल का मिश्रण किया जाता था।
- सरकार द्वारा किए गए विभिन्न हस्तक्षेपों तथा कार्यक्रम के उत्साहजनक प्रदर्शन के कारण वर्ष 2025 में 20% मिश्रण लक्ष्य प्राप्त कर लिया गया।
- इस कार्यक्रम से अब तक लगभग ₹1.13 लाख करोड़ की विदेशी मुद्रा की बचत तथा लगभग 544 लाख मीट्रिक टन CO₂ उत्सर्जन में संचयी कमी होने की सूचना है।
- जून 2026 में सरकार ने फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के लिए E85 की शुरुआत की। निकट भविष्य में E100 भी उपलब्ध कराए जाने की उम्मीद है।
भारत उच्च इथेनॉल मिश्रण को क्यों बढ़ावा दे रहा है?
- ऊर्जा सुरक्षा में सुधार: भारत अपनी कुल कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 88.5% आयात करता है।
- इथेनॉल मिश्रण बढ़ाने से आयातित तेल पर निर्भरता कम होती है तथा ऊर्जा सुरक्षा और लचीलापन सुदृढ़ होता है।
- इससे विदेशी मुद्रा के बहिर्वाह को नियंत्रित करने तथा व्यापक आर्थिक स्थिरता में सुधार करने में भी सहायता मिलेगी।
- किसानों को लाभ: इथेनॉल उत्पादन गन्ना, मक्का और अधिशेष खाद्यान्नों के लिए एक वैकल्पिक बाजार उपलब्ध कराता है। इससे किसानों को आर्थिक लाभ मिलता है, विशेषकर उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में।
- पर्यावरणीय लाभ: इथेनॉल एक नवीकरणीय ईंधन है और पेट्रोल की तुलना में कम विषैले प्रदूषक उत्पन्न करता है। इथेनॉल का अधिक मिश्रण प्रदूषण को कम करने तथा परिवहन को अधिक स्वच्छ बनाने में सहायक हो सकता है।
- ग्रामीण औद्योगीकरण: डिस्टिलरियों के विस्तार से ग्रामीण बुनियादी ढाँचे के विकास तथा गैर-कृषि रोजगार के सृजन में योगदान मिला है।
- भारत का वैश्विक जैव ईंधन नेतृत्व: भारत G20 शिखर सम्मेलन में शुरू किए गए वैश्विक जैव ईंधन गठबंधन का संस्थापक सदस्य है।
- यह कार्यक्रम सतत जैव ईंधनों के क्षेत्र में भारत की वैश्विक नेतृत्वकारी भूमिका को और सुदृढ़ करता है।
इथेनॉल मिश्रण से संबंधित चिंताएँ
- कच्चे माल की अस्थिरता: गन्ने का उत्पादन अभी भी मानसून पर अत्यधिक निर्भर है। सूखे वाले वर्षों में इथेनॉल की आपूर्ति तथा मिश्रण संबंधी लक्ष्य प्रभावित हो सकते हैं।
- खाद्य कीमतों पर प्रभाव: कृषि उत्पादन का अधिक मात्रा में इथेनॉल उत्पादन की ओर स्थानांतरण चीनी तथा अन्य खाद्य उत्पादों की लागत में वृद्धि कर सकता है।
- ईंधन दक्षता: पेट्रोल की तुलना में इथेनॉल में प्रति लीटर कम ऊर्जा होती है। उपभोक्ताओं ने E10 से E20 मिश्रण की ओर संक्रमण के दौरान वाहन के माइलेज में कमी को लेकर चिंताएँ व्यक्त की हैं।
- वाहनों की अनुकूलता संबंधी समस्याएँ: इथेनॉल अत्यधिक आर्द्रताग्राही होता है, अर्थात यह वायुमंडल से नमी को आसानी से अवशोषित करता है।
- अधिक इथेनॉल मिश्रण ऐसे वाहनों के इंजन के घटकों, ईंधन लाइनों, रबर सील तथा धातु के हिस्सों को हानि पहुँचा सकता है, जिन्हें इस प्रकार के ईंधन के उपयोग के लिए डिजाइन नहीं किया गया है।
सरकार की प्रतिक्रिया
- सरकार ने घरेलू बाजार में उपलब्धता बढ़ाने तथा कीमतों पर नियंत्रण रखने के लिए टैरिफ दर कोटा (TRQ) के अंतर्गत 31 अक्टूबर तक 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात को मंजूरी दी है, क्योंकि घरेलू चीनी कीमतों में वृद्धि हो रही है।
- ये सभी उपाय इथेनॉल खरीद, चीनी उत्पादन, आयात तथा खाद्य कीमतों के प्रबंधन के बीच लचीले एवं समन्वित नीतिगत दृष्टिकोण की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं।
आगे की राह
- द्वितीय पीढ़ी के इथेनॉल की ओर संक्रमण: कृषि अपशिष्ट, फसल अवशेष तथा अन्य गैर-खाद्य कच्चे माल से द्वितीय पीढ़ी के इथेनॉल का उत्पादन बढ़ाया जाना चाहिए, ताकि खाद्य फसलों के साथ प्रतिस्पर्धा से बचा जा सके।
- नीतिगत लचीलापन: इथेनॉल मिश्रण के लक्ष्यों को खाद्य कीमतों, चीनी की उपलब्धता, कच्चे माल की आपूर्ति तथा पर्यावरणीय स्थिरता को ध्यान में रखते हुए लचीला बनाया जाना चाहिए।
- जल उपयोग दक्षता में वृद्धि: विशेष रूप से जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में सूक्ष्म सिंचाई तथा बेहतर फसल प्रबंधन पद्धतियों के माध्यम से जल-कुशल गन्ना उत्पादन को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
स्रोत: TH
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