पाठ्यक्रम: GS3/ऊर्जा क्षेत्र
संदर्भ
- भारत इस दशक में पाँच अतिरिक्त परमाणु रिएक्टरों को परिचालन में लाने तथा वर्ष 2047 तक अपनी परमाणु ऊर्जा क्षमता को 100 GW तक बढ़ाने की दिशा में कार्य कर रहा है।
भारत में परमाणु ऊर्जा की स्थिति
- स्थापित क्षमता: भारत में वर्तमान में 25 सक्रिय परमाणु रिएक्टर हैं, जिनकी कुल क्षमता 8.7 गीगावाट-इलेक्ट्रिक (GWe) है। देश के परमाणु ऊर्जा रिएक्टरों ने वर्ष 2024-25 में 56,681 मिलियन यूनिट विद्युत का उत्पादन किया।
- निरंतर योगदान: परमाणु ऊर्जा का भारत के कुल विद्युत उत्पादन में योगदान लंबे समय से लगभग 3% रहा है।
- प्रस्तावित विस्तार: आगामी कुछ वर्षों में भारत की परमाणु ऊर्जा क्षमता में लगभग तीन गुना वृद्धि करने की योजना है।
- अंतरराष्ट्रीय सहयोग के साथ स्वदेशी रूप से विकसित 700 मेगावाट (MW) तथा 1,000 MW क्षमता वाले रिएक्टरों पर कार्य चल रहा है और वर्ष 2031-32 तक स्थापित क्षमता 22.38 GW तक पहुँचने की संभावना है।
- अंतरराष्ट्रीय सहयोग: भारत ने शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए असैन्य परमाणु सहयोग के संबंध में 18 देशों के साथ अंतर-सरकारी समझौते (IGAs) किए हैं। यह भारत के परमाणु कार्यक्रम में बढ़ते वैश्विक विश्वास को दर्शाता है।
- निर्माणाधीन रिएक्टर: लगभग 8 GWe क्षमता वाले 10 रिएक्टर निर्माणाधीन हैं। इसके अतिरिक्त लगभग 6.6 GWe क्षमता वाली 10 अन्य इकाइयाँ परियोजना-पूर्व चरण में हैं।
भारत का त्रि-चरणीय परमाणु कार्यक्रम
- स्थापना: भारत की परमाणु ऊर्जा यात्रा स्वतंत्रता के कुछ ही समय बाद वर्ष 1948 में परमाणु ऊर्जा आयोग की स्थापना के साथ शुरू हुई।
- वर्ष 1956 में एशिया का प्रथम अनुसंधान रिएक्टर ‘अप्सरा’ ट्रॉम्बे स्थित भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) में क्रिटिकल हुआ।
- वर्ष 1969 में जापान के पश्चात भारत एशिया का दूसरा देश बना, जिसने तारापुर में परमाणु ऊर्जा संयंत्र स्थापित किया।
- भारत के परमाणु कार्यक्रम के जनक डॉ. होमी जे. भाभा ने परमाणु ऊर्जा के विकास के लिए तीन-चरणीय कार्यक्रम की परिकल्पना की थी।
- प्रथम चरण — दाबित भारी जल रिएक्टर (PHWRs)
- भारतीय परमाणु कार्यक्रम के प्रथम चरण में PHWRs के एक बेड़े का निर्माण किया गया।
- इन रिएक्टरों के लिए विखंडनीय पदार्थ के रूप में थोड़ी मात्रा में यूरेनियम-235 (U-235) युक्त प्राकृतिक यूरेनियम का उपयोग किया जाता है, जिसमें मुख्यतः यूरेनियम-238 (U-238) होता है।
- इनमें ड्यूटेरियम ऑक्साइड (भारी जल) का उपयोग मंदक तथा शीतलक के रूप में किया जाता है।
- इस चरण का प्रमुख उद्देश्य यूरेनियम ईंधन से उप-उत्पाद के रूप में प्लूटोनियम-239 (Pu-239) का उत्पादन करना था।
- प्लूटोनियम-239 एक विखंडनीय पदार्थ है, जिसका उपयोग परमाणु रिएक्टरों में ईंधन के रूप में किया जाता है।
- द्वितीय चरण — तीव्र प्रजनक रिएक्टर (FBRs)
- कार्यक्रम के दूसरे चरण में तीव्र प्रजनक रिएक्टरों (FBRs) का उपयोग किया जाता है।
- FBRs को तीव्र न्यूट्रॉन स्पेक्ट्रम में कार्य करने तथा जितनी मात्रा में विखंडनीय पदार्थ की खपत होती है, उससे अधिक मात्रा में विखंडनीय पदार्थ उत्पन्न करने के लिए डिजाइन किया गया है।
- इस चरण में प्रथम चरण से प्राप्त प्लूटोनियम-239 तथा यूरेनियम-238 को ईंधन के रूप में उपयोग करके ऊर्जा के साथ-साथ अधिक Pu-239 और U-233 का उत्पादन किया जाता है।
- यूरेनियम-233 (U-233) एक अन्य विखंडनीय पदार्थ है, जिसका उपयोग परमाणु रिएक्टरों में ईंधन के रूप में किया जा सकता है।
- तृतीय चरण — उन्नत भारी जल रिएक्टर (AHWRs)
- कार्यक्रम के तीसरे चरण में उन्नत भारी जल रिएक्टरों (AHWRs) की तैनाती की परिकल्पना की गई है।
- इन रिएक्टरों में थोरियम-232 (Th-232) का उपयोग ईंधन के रूप में किया जाएगा, जिससे U-233 तथा विद्युत का उत्पादन किया जा सकेगा। इसमें Pu-239 का भी उपयोग किया जाएगा।
- भारत में थोरियम के पर्याप्त भंडार हैं। इस चरण का प्रमुख उद्देश्य परमाणु ईंधन के रूप में थोरियम की क्षमता का उपयोग करना है।
चुनौतियाँ
- सीमित घरेलू अनुभव: भारत का परमाणु कार्यक्रम मुख्यतः दाबित भारी जल रिएक्टर (PHWRs) और तीव्र प्रजनक रिएक्टरों (FBRs) पर आधारित रहा है। इसके कारण लाइट वाटर रिएक्टर (LWR) के डिजाइन एवं संचालन में घरेलू अनुभव अपेक्षाकृत सीमित है।
लाइट वाटर रिएक्टर
- लाइट वाटर रिएक्टर (LWRs): वर्तमान में LWRs वैश्विक परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम का प्रमुख आधार हैं और विश्व की असैन्य परमाणु रिएक्टर क्षमता में इनकी हिस्सेदारी 85% से अधिक है।
- इनमें शीतलक तथा न्यूट्रॉन मंदक, दोनों के रूप में सामान्य हल्के जल का उपयोग किया जाता है।
- भारी जल रिएक्टरों की तुलना में LWRs का डिजाइन और इंजीनियरिंग अपेक्षाकृत सरल होता है, क्योंकि इनमें शीतलक एवं मंदक दोनों के रूप में सामान्य जल का उपयोग किया जाता है।
- कम लागत: पैमाने की अर्थव्यवस्थाओं के कारण इनके निर्माण की लागत सामान्यतः कम हो सकती है तथा इन्हें अधिक तापीय दक्षता वाला माना जाता है।
- घरेलू यूरेनियम की सीमित उपलब्धता: भारत के पास निम्न-श्रेणी के यूरेनियम के अपने भंडार हैं। इसके अतिरिक्त भारत यूरेनियम का आयात भी करता है।
- परमाणु ऊर्जा की दीर्घकालिक वृद्धि अन्य देशों के साथ ईंधन आपूर्ति संबंधी व्यवस्थाओं पर निर्भर करती है।
- उच्च पूंजीगत लागत: परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के लिए अत्यधिक पूंजी निवेश तथा लंबे निर्माण काल की आवश्यकता होती है।
- प्रौद्योगिकी संबंधी चुनौतियाँ: भारत वर्तमान में लघु मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) जैसी उन्नत प्रौद्योगिकियों का प्रारंभिक स्तर पर विकास कर रहा है।
- सार्वजनिक सुरक्षा एवं चिंताएँ: परमाणु दुर्घटनाओं की आशंका के कारण स्थानीय विरोध और परियोजनाओं के पूरा होने में विलंब की संभावना बनी रहती है।
- थोरियम संबंधी अंतराल: यद्यपि भारत के पास थोरियम के बड़े भंडार हैं, लेकिन इसका वाणिज्यिक उपयोग करने वाली प्रौद्योगिकी अभी विकासाधीन है।
सरकार की पहल
- परमाणु ऊर्जा मिशन एवं क्षमता लक्ष्य: सरकार ने परमाणु ऊर्जा क्षमता को वर्ष 2047 तक लगभग 100 GW तक बढ़ाने के उद्देश्य से परमाणु ऊर्जा मिशन शुरू किया है।
- यह मिशन घरेलू क्षमताओं को बढ़ाने तथा उन्नत प्रौद्योगिकियों को अपनाने पर बल देता है।
- स्वदेशी रिएक्टर विकास:भारत स्मॉल रिएक्टर जैसे रिएक्टरों का विकास किया जा रहा है, ताकि इन्हें व्यापक स्तर पर तैनात किया जा सके।
- यद्यपि ये PHWR तथा SMR के विभिन्न रूप हैं, फिर भी ये व्यापक परमाणु नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र की आधारशिला तैयार कर रहे हैं।
- त्रि-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम: भारत की दीर्घकालिक रणनीति PHWRs, तीव्र प्रजनक रिएक्टरों तथा थोरियम-आधारित रिएक्टरों के माध्यम से देश के थोरियम भंडार का उपयोग करना है।
- SHANTI अधिनियम, 2025: यह परमाणु ऊर्जा क्षमता के विस्तार, उन्नत रिएक्टर प्रौद्योगिकियों तथा परमाणु ऊर्जा उत्पादन में व्यापक भागीदारी को सक्षम बनाता है।
- अनुसंधान एवं विकास के लिए वित्तपोषण: केंद्रीय बजट 2025-26 में उन्नत परमाणु प्रौद्योगिकियों में अनुसंधान एवं विकास के लिए लगभग ₹20,000 करोड़ का महत्वपूर्ण वित्तपोषण आवंटित किया गया।
- अंतरराष्ट्रीय सहयोग एवं प्रौद्योगिकी तक पहुँच: सरकार अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों तथा प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की ऐसी व्यवस्थाओं पर कार्य कर रही है, जो विभिन्न प्रौद्योगिकियों में अनुभव संबंधी अंतराल को कम करने में सहायता कर सकती हैं।
आगे की राह
- भारत स्वदेशी लघु रिएक्टर कार्यक्रम पर कार्य कर रहा है, जिसके अंतर्गत भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र द्वारा प्रदर्शन के लिए SMR के तीन प्रकार विकसित किए जा रहे हैं।
- इनमें 200 MWe भारत स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (BSMR-200), 55 MWe का लघु मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) तथा हाइड्रोजन उत्पादन के लिए 5 MWt उच्च-तापमान गैस-शीतित रिएक्टर शामिल हैं।
- सरकार ने वर्ष 2033 तक कम-से-कम पाँच स्वदेशी रूप से डिजाइन किए गए और परिचालन में आने वाले SMRs स्थापित करने का लक्ष्य रखा है।
- पुराने ताप विद्युत संयंत्र स्थलों का पुनः उपयोग: सरकार पुराने ताप विद्युत संयंत्रों के स्थलों को परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के स्थलों के रूप में पुनः उपयोग करने की संभावनाओं का अध्ययन कर रही है।
- ऐसे पुनः उपयोग किए गए स्थल बड़े पारंपरिक रिएक्टरों की तुलना में SMRs तथा कम क्षमता वाली परमाणु परियोजनाओं के लिए अंततः अधिक उपयुक्त हो सकते हैं।
- तमिलनाडु के कलपक्कम में स्वदेशी रूप से डिजाइन एवं निर्मित प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) ने अप्रैल 2026 में सफलतापूर्वक अपनी प्रथम क्रिटिकलिटी प्राप्त की, जिससे सतत परमाणु शृंखला अभिक्रिया की शुरुआत हुई।
- इस उपलब्धि के साथ भारत अपने त्रि-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के दूसरे चरण में प्रवेश कर गया है।
- पूर्ण रूप से परिचालन में आने के बाद भारत रूस के बाद वाणिज्यिक तीव्र प्रजनक रिएक्टर का संचालन करने वाला विश्व का दूसरा देश बन जाएगा।
स्रोत: IE
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