पाठ्यक्रम: GS3/भारतीय अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- 20 अगस्त 2026 तक, भारत के संशोधित ढाँचे के अंतर्गत ₹4,895.65 करोड़ मूल्य के 29 प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) प्रस्ताव दर्ज किए गए हैं। यह निवेश को सुगम बनाने के साथ-साथ आवश्यक सुरक्षा उपायों को बनाए रखने की दिशा में नीति में आए बदलाव को दर्शाता है।
प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के बारे में
- प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से आशय एक देश की किसी संस्था या व्यक्ति द्वारा दूसरे देश में स्थित किसी व्यवसाय में दीर्घकालिक हित और प्रबंधन पर महत्वपूर्ण प्रभाव स्थापित करने के उद्देश्य से किए गए निवेश से है।
- इसमें सामान्यतः दीर्घकालिक प्रतिबद्धता शामिल होती है तथा यह पोर्टफोलियो निवेश की तुलना में पूंजी, प्रौद्योगिकी, प्रबंधकीय विशेषज्ञता और वैश्विक बाजारों तक पहुँच उपलब्ध करा सकता है।
- भारत में FDI को विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA), 1999 तथा उससे संबंधित नियमों के अंतर्गत क्षेत्रवार निवेश सीमा, प्रवेश मार्ग और निर्धारित शर्तों के माध्यम से विनियमित किया जाता है।
- निवेश स्वचालित मार्ग अथवा सरकारी मार्ग के माध्यम से किया जा सकता है।
महत्त्व एवं प्रासंगिकता
- पूंजी निर्माण एवं बुनियादी ढाँचे का वित्तपोषण: FDI घरेलू बचत में वृद्धि करते हुए महत्वपूर्ण पूंजीगत परियोजनाओं, परिवहन अवसंरचना तथा औद्योगिक उत्पादन क्षमता के वित्तपोषण में योगदान देता है।
- प्रौद्योगिकी एवं नवाचार का हस्तांतरण: बहुराष्ट्रीय कंपनियों से घरेलू उद्योगों में नवीन प्रौद्योगिकियों, स्वचालन प्रणालियों तथा संगठनात्मक संरचनाओं का हस्तांतरण होता है।
- रोजगार सृजन: FDI प्रवाह विनिर्माण एवं सेवा क्षेत्रों में नई परियोजनाओं से जुड़े होते हैं, जिससे कुशल एवं अकुशल रोजगार के अवसर उत्पन्न होते हैं तथा स्थानीय आपूर्तिकर्ता तंत्र का विकास होता है।
- निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता: वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में विदेशी कंपनियों द्वारा स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं के उपयोग से घरेलू निर्यात क्षमता में सुधार होता है तथा विदेशी मुद्रा भंडार में वृद्धि होती है।
- कौशल विकास एवं मानव पूंजी: विदेशी कंपनियों के प्रवेश के माध्यम से स्थानीय प्रबंधन को वैश्विक सर्वोत्तम कार्य-पद्धतियों, निरंतर तकनीकी प्रशिक्षण तथा कॉरपोरेट प्रशासन के मानकों से परिचित होने का अवसर मिलता है।
- राजकोषीय सुदृढ़ीकरण: मेजबान सरकारों को विदेशी उद्यमों की आर्थिक गतिविधियों के आधार पर कॉरपोरेट आयकर, सीमा शुल्क तथा अन्य करों एवं शुल्कों से अधिक राजस्व प्राप्त होता है।
भारत के FDI से संबंधित प्रमुख सुधार
- स्थलीय सीमा साझा करने वाले देशों (LBCs) से संबंधित FDI (2026): स्थलीय सीमा साझा करने वाले देशों से संबंधित ऐसी संस्थाओं, जिनकी हिस्सेदारी 10% तक गैर-नियंत्रणकारी स्वामित्व के रूप में है, को स्वचालित मार्ग के माध्यम से निवेश करने की अनुमति दी गई है।
- लाभकारी स्वामित्व की जाँच निवेशक संस्था के स्तर पर की जाती है।
- यह व्यवस्था क्षेत्रवार निवेश सीमा, प्रवेश मार्ग तथा अन्य लागू शर्तों के अधीन है।
- इसका उद्देश्य आवश्यक सुरक्षा उपायों को बनाए रखते हुए स्वीकृति संबंधी विलंब को कम करना है।
- वर्तमान सुधार का उद्देश्य अनिश्चितता को कम करना, लेन-देन की समय-सीमा को घटाना तथा निवेश के अनुकूल वातावरण में सुधार करना है।
- दर्ज किए गए 29 प्रस्ताव सूचना प्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), सूचना एवं संचार, विनिर्माण, औषधि, डेटा केंद्र तथा परिवहन सेवाओं जैसे क्षेत्रों से संबंधित हैं। इनमें मॉरीशस, अमेरिका, दक्षिण कोरिया, जापान, सिंगापुर, लक्ज़मबर्ग तथा केमैन द्वीपसमूह सहित विभिन्न अधिकार-क्षेत्रों के निवेशक शामिल हैं।
- FEMA (गैर-ऋण लिखत) नियम, 2019 में संशोधन: संशोधित प्रावधानों को 1 मई 2026 को अधिसूचित किया गया।
- पात्र निवेशक निर्धारित रिपोर्टिंग आवश्यकताओं का अनुपालन करते हुए अतिरिक्त पूर्व सरकारी स्वीकृति के बिना निवेश कर सकते हैं।
- पूर्व सरकारी स्वीकृति: वर्ष 2020 में ऐसे FDI के लिए पूर्व सरकारी स्वीकृति की व्यवस्था लागू की गई थी, जिसमें लाभकारी स्वामी भारत के साथ स्थलीय सीमा साझा करने वाले किसी देश में स्थित हो अथवा उस देश का नागरिक हो।
- इस उपाय का प्रमुख उद्देश्य बढ़ती आर्थिक-सुरक्षा संबंधी चिंताओं के बीच अवसरवादी अधिग्रहण को रोकना तथा रणनीतिक परिसंपत्तियों की सुरक्षा करना था।
- FDI के प्रवेश मार्गों का उदारीकरण: समय के साथ भारत ने कई क्षेत्रों को क्रमशः सरकारी मार्ग से हटाकर स्वचालित मार्ग के अंतर्गत किया है। इससे प्रशासनिक बाधाएँ कम हुई हैं तथा निवेश संबंधी पूर्वानुमेयता में सुधार हुआ है।
- क्षेत्रवार FDI सीमा में वृद्धि: सरकार ने निर्धारित शर्तों के अधीन रक्षा, बीमा, दूरसंचार और अंतरिक्ष सहित कुछ क्षेत्रों में FDI की सीमा बढ़ाई है, ताकि पूंजी और प्रौद्योगिकी को आकर्षित किया जा सके।
- राष्ट्रीय एकल खिड़की प्रणाली (NSWS): उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) के अंतर्गत विकसित NSWS निवेशकों को विभिन्न सरकारी स्वीकृतियों की पहचान करने और उनके लिए आवेदन करने हेतु एकल डिजिटल मंच उपलब्ध कराता है।
संबंधित मुद्दे एवं चिंताएँ
- नियामकीय जटिलता: केंद्र और राज्य स्तर के बहु-स्तरीय प्राधिकरणों के बीच प्रशासनिक समन्वय की जटिलता परियोजनाओं के क्रियान्वयन में निरंतर विलंब का कारण बनती है।
- असमान निवेश प्रवाह: विदेशी निवेश का प्रवाह अभी भी कुछ ही औद्योगिक रूप से विकसित राज्यों—महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु और दिल्ली—तक अधिक केंद्रित है, जबकि पूर्वी तथा आंतरिक क्षेत्र अपेक्षाकृत पीछे रह गए हैं।
- भूराजनीतिक जोखिम: बड़े पैमाने पर व्यापार युद्ध और वैश्विक नीतियों में बदलाव से बाजार की दक्षता के बजाय राजनीतिक संरेखण के आधार पर पूंजी के प्रवाह की दिशा प्रभावित हो सकती है।
- घरेलू MSMEs के लिए खतरा: खुदरा या स्थानीय विनिर्माण क्षेत्र में विदेशी पूंजी के अनियंत्रित एवं अत्यधिक प्रवाह से छोटे घरेलू व्यवसायों पर वैश्विक कंपनियों की व्यापक पैमाने की अर्थव्यवस्था के साथ प्रतिस्पर्धा करने का दबाव बढ़ सकता है।
- नीतिगत अस्थिरता एवं कर विवाद: सीमा शुल्क, स्थानीय अनुपालन संबंधी अनिवार्यताएँ तथा उद्योग-विशिष्ट कर मानक अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के लिए परिचालन संबंधी अनिश्चितता उत्पन्न करते हैं।
आगे की राह
- भारत को जोखिम-आधारित FDI व्यवस्था बनाए रखनी चाहिए, जिसमें निष्क्रिय एवं गैर-नियंत्रणकारी निवेश तथा रणनीतिक नियंत्रण से जुड़े निवेश के बीच स्पष्ट अंतर किया जाए।
- सुदृढ़ लाभकारी-स्वामित्व सत्यापन, विभिन्न एजेंसियों के बीच सूचना साझा करने की व्यवस्था तथा निवेश के बाद निगरानी से वास्तविक निवेश में अनावश्यक विलंब किए बिना नियमों के उल्लंघन और परिहार को रोका जा सकता है।
- व्यापक उद्देश्य पूंजी और प्रौद्योगिकी के प्रवाह को राष्ट्रीय सुरक्षा, घरेलू क्षमता निर्माण तथा पारदर्शी नियमन के साथ संतुलित करना होना चाहिए।
- FDI संबंधी नियमों में पूर्वानुमेयता, त्वरित स्वीकृति प्रक्रिया तथा लक्षित सुरक्षा उपाय भारत को वैश्विक निवेश के लिए एक आकर्षक गंतव्य बनाए रखने में सहायक हो सकते हैं।
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