ड्रोन क्रय से ड्रोन साझेदारी की दिशा में परिवर्तन 

पाठ्यक्रम: GS3/रक्षा तकनीक; आंतरिक सुरक्षा

संदर्भ

  • भारत द्वारा हाल ही में घरेलू निर्माताओं से 2 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य के सैन्य ड्रोन की खरीद देश के रक्षा आधुनिकीकरण तथा आत्मनिर्भर भारत अभियान की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह कदम स्वदेशी विनिर्माण क्षमता को सुदृढ़ करने के साथ-साथ रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को भी प्रोत्साहन देता है।

ड्रोन/यूएवी (UAV) के बारे में

  • ड्रोन अथवा मानवरहित हवाई वाहन (UAVs) ऐसे विमान होते हैं जिनमें कोई पायलट सवार नहीं होता। इन्हें दूरस्थ रूप से नियंत्रित किया जा सकता है अथवा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), जीपीएस, सेंसर तथा संचार प्रणालियों जैसी तकनीकों की सहायता से स्वायत्त रूप से संचालित किया जा सकता है।
  • प्रमुख उपयोग: निगरानी एवं टोही
    • सीमा निगरानी
    • सटीक सैन्य प्रहार
    • रसद एवं आपूर्ति वितरण
    • आपदा प्रबंधन एवं आपातकालीन प्रतिक्रिया
    • कृषि निगरानी एवं मानचित्रण

आधुनिक युद्ध में ड्रोन की भूमिका

  • लागत-कुशल शक्ति गुणक: ड्रोन अपेक्षाकृत कम लागत पर उन कार्यों को सम्पन्न कर सकते हैं, जिनके लिए सामान्यतः अत्यधिक महंगे लड़ाकू विमान एवं हथियार प्रणालियों की आवश्यकता होती है।
    • हाल ही में रूस-यूक्रेन युद्ध में प्रयुक्त फर्स्ट-पर्सन व्यू (FPV) ड्रोन लाखों डॉलर मूल्य के बख्तरबंद युद्धक वाहनों को सफलतापूर्वक नष्ट करने में सक्षम सिद्ध हुए हैं।
  • बेहतर परिस्थितिजन्य जागरूकता: वास्तविक समय में प्राप्त खुफिया, निगरानी एवं टोही (ISR) सूचनाएँ युद्धक्षेत्र में त्वरित एवं प्रभावी निर्णय लेने में सहायता करती हैं।
  • सटीकता एवं कम जोखिम: ड्रोन के माध्यम से सैनिकों के जीवन को जोखिम में डाले बिना सटीक सैन्य प्रहार किए जा सकते हैं।
  • इलेक्ट्रॉनिक युद्ध एवं अनुकूलनशील प्रणालियाँ: आधुनिक युद्धक्षेत्रों में जैमिंग तथा इलेक्ट्रॉनिक हमले सामान्य हो चुके हैं।
    • ऐसी परिस्थितियों में ड्रोन प्रणालियों को प्रभावी बनाए रखने हेतु उनका निरंतर उन्नयन आवश्यक होता है।
  • नवाचार चक्र : ड्रोन प्रौद्योगिकी का विकास कुछ ही महीनों में हो सकता है। अतः इसके लिए पारंपरिक रक्षा प्रणालियों की अपेक्षा अधिक लचीली खरीद नीतियों की आवश्यकता होती है, क्योंकि पारंपरिक प्रणालियाँ दशकों तक अपरिवर्तित रह सकती हैं।

भारत का घरेलू ड्रोन उद्योग

  • विकसित होता विनिर्माण क्षेत्र: भारत में 600 से अधिक ड्रोन एवं ड्रोन-पुर्ज़ा निर्माता कार्यरत हैं तथा 100 से अधिक कंपनियाँ सैन्य ड्रोन का उत्पादन कर रही हैं।
    • ड्रोन डिज़ाइन, सॉफ्टवेयर, सेंसर तथा विश्लेषणात्मक प्रणालियों के विकास में स्टार्ट-अप्स की भागीदारी निरंतर बढ़ रही है।
  • नागरिक-सैन्य नवाचार का परस्पर संबंध: सर्वेक्षण, मानचित्रण, रसद, आपदा प्रबंधन तथा कृषि क्षेत्र में विकसित प्रौद्योगिकियों का उपयोग सैन्य उद्देश्यों के लिए भी किया जा सकता है।
  • उभरते हुए अनुप्रयोग: कठिन भौगोलिक क्षेत्रों में लॉजिस्टिक्स हेतु इंडिया पोस्ट एवं स्काई एयर का सहयोग।
    • सरकारी परियोजनाओं के अंतर्गत कृषि छिड़काव एवं फसल निगरानी।
    • अवसंरचना निरीक्षण तथा आपदा प्रबंधन कार्यों में ड्रोन का उपयोग।

ड्रोन पारिस्थितिकी तंत्र की चुनौतियाँ

  • लेन-देन आधारित खरीद प्रणाली: वर्तमान रक्षा खरीद प्रणाली मुख्यतः लेन-देन आधारित है।
    • जब किसी उपकरण की आवश्यकता होती है, तब निविदा जारी की जाती है और संबंधित उत्पाद की खरीद की जाती है।
    • यद्यपि यह मॉडल स्थिर प्रौद्योगिकियों के लिए उपयुक्त है, किंतु तीव्र गति से विकसित होने वाली ड्रोन तकनीक के लिए उपयुक्त नहीं है।
  • उन्नयन की धीमी प्रक्रिया: ड्रोन के प्रभावी उपयोग के लिए उनके सॉफ्टवेयर, सेंसर एवं संचार प्रणालियों का नियमित उन्नयन आवश्यक है।
    • वर्तमान खरीद प्रणाली प्रायः इन परिवर्तनों की गति के साथ सामंजस्य स्थापित करने में कठिनाई अनुभव करती है।
  • इलेक्ट्रॉनिक युद्ध के प्रति संवेदनशीलता: जीपीएस स्पूफिंग, जैमिंग आदि जैसे उभरते खतरे ड्रोन प्रणालियों में निरंतर संशोधन एवं सुधार की आवश्यकता उत्पन्न करते हैं।
  • उत्पादों की दीर्घकालिक मांग की सीमित दृश्यता: निर्माताओं के लिए भविष्य के आदेशों का अनुमान लगाना कठिन होता है, जिसके कारण अनुसंधान एवं विकास तथा उत्पादन क्षमता विस्तार में निवेश हेतु पर्याप्त प्रोत्साहन नहीं मिल पाता।
  • प्रमुख घटकों पर निर्भरता: उन्नत सेंसर, सेमीकंडक्टर, संचार उपकरण एवं प्रणोदन प्रणालियों के घरेलू उत्पादन में भारत अभी भी पर्याप्त आत्मनिर्भर नहीं हो पाया है।

भारत में ड्रोन पारिस्थितिकी तंत्र से संबंधित पहलें एवं प्रयास

  • ड्रोन नियम, 2021: इन नियमों ने अनुपालन संबंधी बाधाओं को कम करके, अनुमोदन प्रक्रियाओं का डिजिटलीकरण करके तथा उपयोग के दायरे का विस्तार करके एक उद्योग-अनुकूल वातावरण विकसित किया है।
  • उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना: ड्रोन एवं ड्रोन घटकों के लिए पीएलआई योजना घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहन देने, अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने तथा निवेश एवं नवाचार को आकर्षित करने में सहायक होगी।
  • रक्षा अधिग्रहण सुधार: प्रस्तावित रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (DAP) वाणिज्यिक ऑफ-द-शेल्फ (COTS) प्रणालियों की खरीद को सुगम बनाएगी, जिससे सशस्त्र बलों को वाणिज्यिक ड्रोन खरीदने में सुविधा होगी।
    • रक्षा खरीद मैनुअल (DPM) उन्नयन एवं रखरखाव हेतु आवश्यक वित्तीय प्रावधान भी उपलब्ध कराता है।
  • ड्रोन शक्ति कार्यक्रम: इस कार्यक्रम का उद्देश्य स्टार्ट-अप्स को प्रोत्साहित कर, कृषि अनुप्रयोगों का विस्तार कर तथा घरेलू घटकों के उपयोग को प्रोत्साहन देकर ड्रोन-एज़-ए-सर्विस (DrAAS) मॉडल को प्रोत्साहित करना है।
  • नागरिक उपयोगों का विस्तार: विभिन्न सरकारी विभाग शासन एवं सेवा वितरण के लिए व्यापक रूप से ड्रोन का उपयोग कर रहे हैं। इनमें शामिल हैं—
    • स्वामित्व योजना (SVAMITVA) के अंतर्गत मानचित्रण
    • कृषि निगरानी
    • आपदा प्रबंधन
    • लॉजिस्टिक्स एवं स्वास्थ्य सेवाओं की आपूर्ति
    • ग्रामीण क्षेत्रों में इंडिया पोस्ट द्वारा पार्सल वितरण
  • रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत: सरकार की समग्र स्वदेशीकरण रणनीति घरेलू डिज़ाइन एवं विकास, विनिर्माण, आयात प्रतिस्थापन तथा सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्रों के बीच सहयोग को प्रोत्साहित करेगी।
  • नमो ड्रोन दीदी पहल: यह कार्यक्रम महिला स्व-सहायता समूहों द्वारा कृषि कार्यों में ड्रोन के उपयोग को प्रोत्साहन देगा, जिससे नागरिक उपयोगों का विस्तार होगा तथा ड्रोन निर्माण की मांग में वृद्धि होगी।

आगे की राह : साझेदारी-आधारित खरीद दृष्टिकोण की ओर

  • प्रबंधित सेवा दृष्टिकोण: ड्रोन को केवल एक वस्तु के रूप में खरीदने के बजाय सेना निम्नलिखित प्रावधानों सहित आपूर्तिकर्ताओं के साथ दीर्घकालिक अनुबंध कर सकती है—
    • रखरखाव एवं जीवन-चक्र समर्थन
    • सॉफ्टवेयर एवं फर्मवेयर अद्यतन
    • पुर्ज़ों का प्रतिस्थापन
    • क्षमताओं में निरंतर सुधार
    • नए खतरों के प्रति त्वरित प्रतिक्रिया
  • सुनिश्चित उपलब्धता एवं त्वरित उत्पादन क्षमता: दीर्घकालिक अनुबंध निर्माताओं के लिए मांग की पूर्वानुमेयता सुनिश्चित करेंगे तथा आपातकालीन परिस्थितियों में सेना को उत्पादन क्षमता के तीव्र विस्तार की सुविधा प्रदान करेंगे।
  • नवाचार समर्थन संरचना: सैन्य क्षेत्र एवं उद्योग जगत के बीच संयुक्त सहयोग नवाचारों के त्वरित प्रतिपुष्टि, परीक्षण तथा कार्यान्वयन को संभव बनाएगा।
  • क्षमता-आधारित खरीद दृष्टिकोण: मुख्य उद्देश्य केवल उपकरण खरीदना नहीं होना चाहिए, बल्कि संपूर्ण प्रणाली के जीवनकाल के दौरान उसकी क्षमता को बनाए रखना एवं सुदृढ़ करना होना चाहिए।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न]: लेन-देन आधारित खरीद मॉडल से साझेदारी-आधारित खरीद ढाँचे की ओर संक्रमण की आवश्यकता का परीक्षण कीजिए। भारत की रक्षा तैयारी को सुदृढ़ करने हेतु इसके लाभों, चुनौतियों तथा आवश्यक नीतिगत उपायों पर चर्चा कीजिए। 

स्रोत: TH

 

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