भारत–वियतनाम संबंध: उन्नत व्यापक सामरिक साझेदारी 

पाठ्यक्रम: GS2/अंतर्राष्ट्रीय संबंध

संदर्भ 

  • हाल ही में वियतनाम के राष्ट्रपति की भारत यात्रा के दौरान भारत और वियतनाम ने अपने द्विपक्षीय संबंधों को “उन्नत व्यापक सामरिक साझेदारी” के स्तर तक ऊँचा किया।

भारत–वियतनाम संबंध

  • ऐतिहासिक विकास :भारत और वियतनाम के बीच प्राचीन सांस्कृतिक संबंध हैं, जिनमें बौद्ध धर्म, चंपा सभ्यता में हिंदू प्रभाव एवं समुद्री व्यापार संबंध शामिल हैं।
  • आधुनिक राजनयिक संबंध : 1972 में राजनयिक संबंध स्थापित हुए।
    • वियतनाम ने भारत की उपनिवेशवाद-विरोधी और गुटनिरपेक्ष नीतियों का समर्थन किया। भारत ने युद्धोत्तर पुनर्निर्माण में वियतनाम का सहयोग किया।
    • 2007: सामरिक साझेदारी स्थापित।
    • 2016: संबंधों को व्यापक सामरिक साझेदारी में उन्नत किया गया।
    • 2026: संबंधों को उन्नत व्यापक सामरिक साझेदारी तक ऊँचा किया गया।
  • वियतनाम प्रथम आसियान देश था जिसके साथ भारत ने सामरिक साझेदारी स्थापित की।

2026 यात्रा की प्रमुख उपलब्धियाँ 

  • व्यापार और आर्थिक सहयोग: विगत दशक में व्यापार दोगुना होकर 16 अरब डॉलर तक पहुँचा; 2030 तक 25 अरब डॉलर का लक्ष्य निर्धारित।
    • कृषि पहुँच: भारत अंगूर और अनार का निर्यात करेगा; वियतनाम ड्यूरियन और पोमेलो का निर्यात करेगा।
    • हस्ताक्षरित समझौते: दुर्लभ खनिज सहयोग, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, पांडुलिपि संरक्षण, डिजिटल भुगतान और शहरी शासन से संबंधित 11 समझौते।
  • रक्षा और सुरक्षा सहयोग: संयुक्त सैन्य अभ्यास, समुद्री सुरक्षा, रक्षा उद्योग सहयोग, संयुक्त अनुसंधान और सह-उत्पादन, हाइड्रोग्राफी सहयोग, नौसैनिक बंदरगाह यात्राएँ, वायुसेना सहभागिता, खोज एवं बचाव अभियान।
    • महासागर दृष्टि : क्षेत्रीय सुरक्षा और विकास हेतु परस्पर एवं समग्र प्रगति।
  • हिंद-प्रशांत और दक्षिण चीन सागर: नौवहन की स्वतंत्रता, विवादों का शांतिपूर्ण समाधान, अंतर्राष्ट्रीय कानून और UNCLOS 1982 का पालन।
    • संयुक्त वक्तव्य ने अप्रत्यक्ष रूप से चीन की आक्रामक नीति का उल्लेख किया और गैर-सैन्यीकरण, आत्मसंयम तथा नियम-आधारित समुद्री व्यवस्था पर बल दिया।

भारत–वियतनाम संबंधों का महत्व

  • हिंद-प्रशांत में सामरिक अभिसरण: दोनों देश स्वतंत्र, खुले और समावेशी हिंद-प्रशांत का समर्थन करते हैं तथा चीन की आक्रामकता को लेकर समान चिंताएँ साझा करते हैं।
  • समुद्री सहयोग: नीली अर्थव्यवस्था, समुद्री क्षेत्र जागरूकता और नौसैनिक सहभागिता में सहयोग।
  • रक्षा साझेदारी: वियतनाम आसियान में भारत का सबसे सुदृढ़ रक्षा साझेदार है।
    • भारत वियतनामी सशस्त्र बलों के प्रशिक्षण, रक्षा ऋण और स्वदेशी रक्षा निर्यात का समर्थन करता है।
  • आर्थिक परस्परता:
    • भारत: औषधि, सूचना प्रौद्योगिकी, कृषि।
    • वियतनाम: इलेक्ट्रॉनिक्स, विनिर्माण, आपूर्ति श्रृंखला एकीकरण।
  • आसियान केंद्रीयता: वियतनाम भारत और आसियान के बीच सेतु का कार्य करता है।

संबंधित चुनौतियाँ और चिंताएँ

  • चीन कारक: दक्षिण चीन सागर में चीन की आक्रामकता क्षेत्रीय तनाव उत्पन्न करती है। भारत को अपने सामरिक हितों का संतुलन सावधानी से करना होगा।
  • व्यापार असंतुलन और सीमित संपर्क: व्यापार क्षमता का पूर्ण उपयोग नहीं हुआ है; प्रत्यक्ष शिपिंग और हवाई संपर्क अपर्याप्त हैं।
  • धीमी रक्षा औद्योगिक सहयोग: रक्षा परियोजनाओं के क्रियान्वयन में तीव्रता की आवश्यकता; संयुक्त विनिर्माण अब तक सीमित।
  • आसियान की भू-राजनीतिक संवेदनशीलताएँ: आसियान देश खुले तौर पर चीन-विरोधी रुख से बचते हैं; भारत को रणनीतिक कूटनीति बनाए रखनी होगी।
  • आपूर्ति श्रृंखला की कमजोरियाँ: विनिर्माण और महत्वपूर्ण खनिजों में चीन पर निर्भरता अधिक है।

आगे की राह

  • रक्षा विनिर्माण का विस्तार: नौसैनिक प्रणालियों, मिसाइलों और निगरानी तकनीकों का संयुक्त उत्पादन।
  • संपर्क सुधार: प्रत्यक्ष समुद्री गलियारे, उड़ान संपर्क में वृद्धि और डिजिटल व्यापार प्लेटफ़ॉर्म।
  • आपूर्ति श्रृंखला लचीलापन: दुर्लभ खनिज, अर्धचालक और इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण में सहयोग।
  • समुद्री सहयोग को बढ़ावा: संयुक्त गश्त, श्वेत नौवहन समझौते और सूचना साझा करना।
  • सांस्कृतिक और शैक्षिक आदान-प्रदान को बढ़ावा: बौद्ध कूटनीति, शैक्षणिक साझेदारी और पर्यटन सहयोग।
  • आसियान के माध्यम से अधिक सहभागिता: पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन और आसियान रक्षा मंत्रियों की बैठक प्लस (ADMM+) में भारत की भूमिका को गहरा करना।

Source: TH

 

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