पाठ्यक्रम: GS2/शासन एवं कल्याणकारी नीतियाँ; GS3/समावेशी विकास
संदर्भ
- हालिया नीतिगत परिवर्तनों, विशेषकर चार श्रम संहिताओं के कार्यान्वयन तथा मनरेगा (MGNREGA) के स्थान पर प्रस्तावित “विकसित भारत–गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) विधेयक, 2025” ने असमानता, श्रमिक कल्याण तथा ग्रामीण संकट पर परिचर्चा को पुनः तीव्र कर दिया है।
भारत की विकास यात्रा में असमानता का विश्लेषण
- असमानता से अभिप्राय आय, संपत्ति, उपभोग, अवसरों तथा सामाजिक एवं राजनीतिक शक्ति के असमान वितरण से है।
- यह वर्ग, जाति, लिंग, धर्म, क्षेत्र तथा ग्रामीण-शहरी विभाजन के आधार पर विद्यमान हो सकती है।
- असमानता का मापन विभिन्न आँकड़ा स्रोतों, सर्वेक्षण पद्धतियों तथा संकेतकों — जैसे गिनी सूचकांक (Gini Index), दशांश हिस्सेदारी (Decile Shares) और उपभोग अनुपात — पर निर्भर करता है।
भारत में असमानता के प्रकार
- आय असमानता : आय असमानता का अर्थ व्यक्तियों अथवा समूहों के बीच आय के असमान वितरण से है।
- प्रमुख प्रवृत्तियाँ: उच्च आय वर्ग राष्ट्रीय आय के असंगत रूप से बड़े हिस्से पर अधिकार रखता है।
- असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की मजदूरी स्थिर बनी हुई है।
- कॉर्पोरेट लाभ श्रमिक आय की तुलना में अधिक तीव्र गति से बढ़े हैं।
- प्रमाण: विश्व असमानता डेटाबेस के अनुसार शीर्ष 1% जनसंख्या राष्ट्रीय आय एवं संपत्ति के बड़े हिस्से पर नियंत्रण रखती है, जबकि औपचारिक एवं अनौपचारिक क्षेत्रों के बीच वेतन वृद्धि असमान बनी हुई है।
- प्रमुख प्रवृत्तियाँ: उच्च आय वर्ग राष्ट्रीय आय के असंगत रूप से बड़े हिस्से पर अधिकार रखता है।
- संपत्ति असमानता: संपत्ति असमानता, आय असमानता की तुलना में कहीं अधिक गहरी है।
- कारण: परिसंपत्तियों का असमान स्वामित्व
- भूमि का संकेन्द्रण
- उत्तराधिकार संबंधी लाभ
- अभिजात वर्ग द्वारा वित्तीय परिसंपत्तियों का संचय
- प्रभाव: सामाजिक गतिशीलता में कमी
- पीढ़ीगत असमानता में वृद्धि
- आर्थिक शक्ति का संकेन्द्रण
- कारण: परिसंपत्तियों का असमान स्वामित्व
- उपभोग असमानता : उपभोग व्यय का आकलन प्रायः राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (NSSO) के सर्वेक्षणों द्वारा किया जाता है।
- HCES 2023-24 के निष्कर्ष: भारत का उपभोग गिनी सूचकांक लगभग 0.29 आँका गया है, जो विश्व बैंक द्वारा प्रचलित 0.25 के अनुमान से अधिक है।
- शहरी क्षेत्रों में गैर-खाद्य मासिक प्रति व्यक्ति उपभोग व्यय (MPCE) अखिल भारतीय औसत से लगभग 1.5 गुना अधिक है।
- ग्रामीण गैर-खाद्य व्यय राष्ट्रीय औसत से काफी कम बना हुआ है।
- शहरी भारत के शीर्ष 10% लोग कुल गैर-खाद्य व्यय का लगभग 27% हिस्सा वहन करते हैं, जबकि शेष 90% जनसंख्या का योगदान केवल 73% है।
- MPCE अंतर: शहरी शीर्ष दशांश, निम्नतम दशांश की तुलना में लगभग 6 गुना अधिक व्यय करता है।
- ग्रामीण शीर्ष दशांश, ग्रामीण निम्नतम दशांश से लगभग 4.5 गुना अधिक व्यय करता है।
- शहरी सर्वाधिक समृद्ध वर्ग, ग्रामीण सबसे गरीब वर्ग की तुलना में लगभग 9 गुना अधिक व्यय करता है।


- ग्रामीण-शहरी असमानता : शहरी भारत को बेहतर अवसंरचना, उच्च मजदूरी तथा अधिक रोजगार अवसर प्राप्त हैं।
- इसके विपरीत, ग्रामीण भारत कृषि संकट, अल्परोज़गारी तथा कमजोर सार्वजनिक सेवाओं जैसी समस्याओं का सामना कर रहा है।
- जाति-आधारित असमानता : ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदाय — जैसे अनुसूचित जातियाँ (SCs), अनुसूचित जनजातियाँ (STs) तथा अन्य पिछड़ा वर्ग (OBCs) — अब भी निम्न शैक्षिक उपलब्धि, वेतन भेदभाव, सीमित संपत्ति स्वामित्व तथा व्यवसायिक पृथक्करण का सामना कर रहे हैं।
- लैंगिक असमानता : महिलाएँ श्रमबल भागीदारी, वेतन, शिक्षा तथा संपत्ति स्वामित्व में असमानताओं का सामना करती हैं।
- इसके अतिरिक्त, अवैतनिक देखभाल कार्य, अनौपचारिक रोजगार तथा व्यवसायिक पृथक्करण जैसी चुनौतियाँ भी विद्यमान हैं।
- भारत में महिला श्रमबल भागीदारी दर वैश्विक औसत से अभी भी कम है।
- NSS सर्वेक्षणों द्वारा असमानता का कम आकलन: राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (NSS) उपभोग सर्वेक्षण अत्यंत समृद्ध वर्ग को पर्याप्त रूप से शामिल नहीं कर पाते। अतः वास्तविक असमानता संभवतः कहीं अधिक है।
- कथित रूप से शीर्ष 10% समृद्ध वर्ग के लगभग एक-चौथाई लोगों ने प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना (PMGKY) का लाभ प्राप्त किया।
- इनमें से लगभग 13% लोगों के पास बीपीएल (BPL) राशन कार्ड भी पाए गए।
भारत में असमानता के कारण
- असमान आर्थिक विकास : 1991 के बाद के आर्थिक सुधारों ने विकास को तीव्र गति प्रदान की, किंतु इसके लाभ समान रूप से वितरित नहीं हुए।
- विकास मुख्यतः शहरी कुशल श्रमिकों, कॉर्पोरेट क्षेत्रों तथा सेवा उद्योगों के पक्ष में केंद्रित रहा।
- उपेक्षित वर्ग: कृषि श्रमिक, लघु किसान, असंगठित क्षेत्र के श्रमिक।
- श्रम का अनौपचारिकीकरण : भारत के कुल कार्यबल का 90% से अधिक भाग असंगठित क्षेत्र में कार्यरत है।
- प्रमुख समस्याएँ:
- निम्न मजदूरी
- सामाजिक सुरक्षा का अभाव
- रोजगार असुरक्षा
- कानूनी संरक्षण की कमी
- प्रमुख समस्याएँ:
- शैक्षिक असमानताएँ : क्षेत्रीय असंतुलन, डिजिटल विभाजन तथा कमजोर सार्वजनिक विद्यालय व्यवस्था के कारण गुणवत्तापूर्ण शिक्षा अनेक लोगों की पहुँच से बाहर बनी हुई है।
- फलस्वरूप, असमानता पीढ़ी-दर-पीढ़ी पुनरुत्पादित होती रहती है।
- कृषि संकट : कृषि क्षेत्र खंडित भू-स्वामित्व, निम्न उत्पादकता, जलवायु संवेदनशीलता तथा मूल्य अस्थिरता जैसी समस्याओं से प्रभावित है।
- ग्रामीण आय, शहरी आय की तुलना में स्थिर बनी हुई है।
- स्वास्थ्य सेवाओं तक असमान पहुँच : उच्च निजी स्वास्थ्य व्यय, अपर्याप्त ग्रामीण स्वास्थ्य अवसंरचना तथा गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं तक असमान पहुँच आर्थिक संवेदनशीलता को और बढ़ाती है।
असमानता का प्रभाव
- आर्थिक प्रभाव : घरेलू मांग में कमजोरी, असमान उपभोग वृद्धि, उत्पादकता में कमी।
- सामाजिक प्रभाव: सामाजिक बहिष्करण, अपराध एवं अशांति, हाशियाकरण।
- राजनीतिक प्रभाव: लोकतांत्रिक विमुखता, अभिजात वर्ग द्वारा नीतिगत नियंत्रण, सामाजिक एकता का कमजोर होना।
हालिया नीतिगत परिवर्तनों का प्रभाव
- श्रम संहिताएँ और असंगठित श्रमिक : भारत का 90% से अधिक कार्यबल असंगठित क्षेत्र में कार्यरत है, जिससे सामाजिक सुरक्षा संरक्षण अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है।
- चार श्रम संहिताओं का उद्देश्य श्रम कानूनों को सरल बनाना, व्यवसाय सुगमता में सुधार करना तथा श्रम बाजारों का औपचारिकीकरण करना है।
- हालाँकि, इनसे श्रमिकों की सामूहिक सौदेबाजी शक्ति कमजोर होने, संविदा आधारित रोजगार बढ़ने, रोजगार सुरक्षा में कमी आने तथा श्रमिक संगठनों के कमजोर पड़ने की आशंका व्यक्त की जा रही है।
- मनरेगा का प्रतिस्थापन : प्रस्तावित “विकसित भारत–गारंटी फॉर रोजगार एवं आजीविका मिशन (ग्रामीण) विधेयक, 2025” का उद्देश्य मनरेगा (MGNREGA) का स्थान लेना है।
- प्रमुख चिंताएँ:
- अधिकार-आधारित ढाँचे का कमजोर होना
- कार्यान्वयन का संभावित केंद्रीकरण
- डिजिटलीकरण के कारण बहिष्करण संबंधी त्रुटियाँ
- मजदूरी भुगतान में विलंब
- ग्रामीण सुरक्षा जाल का कमजोर होना
- मनरेगा ऐतिहासिक रूप से आजीविका स्थिरीकरण, संकट-जनित प्रवासन नियंत्रण तथा ग्रामीण मजदूरी के न्यूनतम स्तर को बनाए रखने का महत्वपूर्ण माध्यम रहा है।
असमानता कम करने हेतु सरकारी पहलें
- कल्याणकारी योजनाएँ : प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना , प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN), आयुष्मान भारत, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, ई-श्रम पोर्टल, जल जीवन मिशन।
- वित्तीय समावेशन : जन धन योजना, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT), यूपीआई (UPI) तंत्र।
- कौशल विकास : स्किल इंडिया मिशन, प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY)।
आगे की राह
- ग्रामीण रोजगार को सुदृढ़ बनाना: रोजगार गारंटी की अधिकार-आधारित प्रकृति को बनाए रखना, समयबद्ध मजदूरी भुगतान सुनिश्चित करना।
- आँकड़ों की गुणवत्ता में सुधार: उच्च आय वर्गों का बेहतर आकलन, NSS एवं कर संबंधी आँकड़ों के एकीकरण में पारदर्शिता बढ़ाना।
- सामाजिक सुरक्षा का विस्तार: असंगठित श्रमिकों हेतु सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा,प्रवासी श्रमिकों के लिए पोर्टेबल लाभ सुनिश्चित करना।
- वर्गीय एवं क्षेत्रीय असमानताओं का समाधान: कृषि उत्पादकता में वृद्धि, श्रम-प्रधान विनिर्माण को प्रोत्साहन।
- प्रगतिशील राजकोषीय नीतियाँ :तर्कसंगत संपत्ति कराधान पर विमर्श, स्वास्थ्य एवं शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय में वृद्धि।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न]:भारत में असमानता की प्रकृति एवं कारणों का परीक्षण कीजिए। समावेशी एवं न्यायसंगत विकास सुनिश्चित करने हेतु उपाय सुझाइए। |
स्रोत: TH
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