भारत ने पवन ऊर्जा क्षमता में वार्षिक वृद्धि का अब तक का सर्वाधिक स्तर प्राप्त किया

पाठ्यक्रम: GS3/नवीकरणीय ऊर्जा

संदर्भ

  • भारत ने वर्ष 2025-26 में पवन ऊर्जा क्षमता में अब तक की सर्वाधिक वार्षिक वृद्धि 6.05 गीगावाट (GW) हासिल की है, जिससे कुल स्थापित क्षमता 56 गीगावाट से अधिक हो गई है।

परिचय

  • यह वृद्धि वित्तीय वर्ष 2024-25 की तुलना में लगभग 46% अधिक है।
  • गुजरात, कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे राज्यों ने इस वर्ष क्षमता वृद्धि में प्रमुख योगदान दिया है।
  • यह उपलब्धि नीति की स्पष्टता, ट्रांसमिशन अवसंरचना की तैयारी, प्रतिस्पर्धी टैरिफ निर्धारण तथा सुदृढ़ परियोजना पाइपलाइन के कारण क्षेत्र में आई नई गति को दर्शाती है।

भारत की ऊर्जा हिस्सेदारी

  • वर्ष 2025 तक देश की कुल स्थापित विद्युत क्षमता 500 गीगावाट को पार कर 509.6 गीगावाट तक पहुँच गई है।
  • गैर-जीवाश्म ऊर्जा स्रोतों से स्थापित क्षमता 2025 में 262.74 गीगावाट हो गई है, जो कुल स्थापित क्षमता का 51.5% है।
  • सौर ऊर्जा की स्थापित क्षमता 2025 में 132.85 गीगावाट तक पहुँच गई है।
  • जीवाश्म ईंधन आधारित स्रोत: 244.80 गीगावाट (लगभग 49%), जिसमें कोयला देश की ऊर्जा आवश्यकताओं का लगभग आधा भाग पूरा करता है तथा कुल विद्युत उत्पादन में लगभग 74% योगदान देता है।
  • वैश्विक स्तर पर भारत सौर ऊर्जा क्षमता में तीसरे, पवन ऊर्जा क्षमता में चौथे तथा कुल नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में चौथे स्थान पर है।
भारत के ऊर्जा लक्ष्य

उत्सर्जन तीव्रता में कमी: भारत ने 2005 के स्तर की तुलना में 2035 तक अपनी GDP की उत्सर्जन तीव्रता (CO₂ प्रति इकाई) को 47% तक कम करने का लक्ष्य निर्धारित किया है।भारत 2005 से 2020 के बीच लगभग 36% उत्सर्जन तीव्रता में कमी ला चुका है।गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता का विस्तार: भारत ने 2035 तक अपनी कुल स्थापित विद्युत क्षमता का 60% गैर-जीवाश्म स्रोतों से प्राप्त करने का लक्ष्य रखा है।भारत 2026 तक ही 50% से अधिक गैर-जीवाश्म क्षमता प्राप्त कर चुका है, जो पूर्व निर्धारित लक्ष्य से आगे है।कार्बन सिंक का निर्माण: भारत ने 2035 तक वन एवं वृक्षावरण के माध्यम से 3.5 से 4 अरब टन CO₂ समतुल्य का कार्बन सिंक बनाने का संकल्प लिया है।

संक्रमण में चुनौतियाँ

  • वास्तविक उत्पादन में सीमित हिस्सेदारी: तीव्र क्षमता वृद्धि के बावजूद, नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी 2013-14 में 19.6% से बढ़कर 2024-25 में केवल 22% हुई है, जो संरचनात्मक समस्याओं को दर्शाती है।
  • अंतराल (Intermittency) की चुनौती: सौर और पवन ऊर्जा की अनियमित प्रकृति के कारण निरंतर आपूर्ति कठिन होती है, जिससे ग्रिड स्थिरता और उच्च मांग की पूर्ति हेतु कोयला अभी भी आवश्यक है।
  • ऊर्जा भंडारण की कमी: बड़े पैमाने पर ऊर्जा भंडारण (जैसे बैटरी प्रणाली) का विकास सीमित है, जिससे उच्च मांग या कम उत्पादन के समय नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग में बाधा आती है।
  • आयात पर निर्भरता: बैटरी, सौर एवं पवन प्रौद्योगिकियों हेतु आवश्यक खनिज (जैसे लिथियम, कोबाल्ट, दुर्लभ मृदा तत्व) के लिए भारत आयात पर निर्भर है, जिससे वैश्विक आपूर्ति जोखिम उत्पन्न होते हैं।
  • वित्तीय एवं नीतिगत बाधाएँ: सौर, पवन और भंडारण प्रणालियों के लिए उच्च प्रारंभिक लागत।
    • नीतियों के क्रियान्वयन और नियामकीय स्वीकृतियों में विलंब।
  • भूमि एवं संसाधन सीमाएँ: बड़े पैमाने पर परियोजनाओं के लिए भूमि की सीमित उपलब्धता।
    • भूमि अधिग्रहण में पर्यावरणीय एवं सामाजिक संघर्ष।
  • प्रौद्योगिकी एवं कौशल अंतर: भंडारण, स्मार्ट ग्रिड एवं हाइब्रिड प्रणालियों हेतु उन्नत तकनीकों की आवश्यकता।
    • नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में कुशल कार्यबल की कमी।

सरकारी पहल

  • राष्ट्रीय सौर मिशन (NSM): वर्ष 2010 में प्रारंभ, जिसका उद्देश्य ग्रिड-संयुक्त एवं ऑफ-ग्रिड सौर परियोजनाओं के माध्यम से सौर क्षमता का विस्तार करना है।
  • राष्ट्रीय स्वच्छ ऊर्जा कोष (NCEF): स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकी में अनुसंधान एवं नवाचार को बढ़ावा देने तथा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी हेतु स्थापित।
  • राष्ट्रीय पवन ऊर्जा मिशन: भारत में पवन ऊर्जा के विकास एवं विस्तार पर केंद्रित, 2030 तक 140 गीगावाट का लक्ष्य।
    • पवन टरबाइन निर्माण में प्रयुक्त घटकों पर रियायती सीमा शुल्क तथा 2028 तक अंतर-राज्यीय ट्रांसमिशन प्रणाली (ISTS) शुल्क में छूट।
  • वित्तीय सहायता एवं प्रोत्साहन: बड़े पैमाने की परियोजनाओं हेतु व्यवहार्यता अंतर अनुदान (VGF)।
    • सौर पीवी निर्माण हेतु उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना।
    • रूफटॉप सौर एवं ऑफ-ग्रिड प्रणालियों के लिए सब्सिडी।
    • नवीकरणीय ऊर्जा प्रमाणपत्र (RECs) के माध्यम से हरित ऊर्जा व्यापार को बढ़ावा।
  • अवसंरचना विकास: ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर के माध्यम से ग्रिड एकीकरण में सुधार।
    • पीएम-कुसुम योजना द्वारा कृषि पंपों का सौरकरण।
    • पुनर्गठित वितरण क्षेत्र योजना (RDSS) द्वारा वितरण कंपनियों को सुदृढ़ करना।
  • उभरती प्रौद्योगिकियाँ एवं परियोजनाएँ: बैटरी भंडारण, हाइब्रिड प्रणालियों तथा राउंड-द-क्लॉक (RTC) ऊर्जा को प्रोत्साहन।
    • ऑफशोर पवन एवं फ्लोटिंग सौर परियोजनाओं का संवर्धन।
    • हरित हाइड्रोजन विकास हेतु राष्ट्रीय हाइड्रोजन मिशन पर ध्यान।
  • अंतर्राष्ट्रीय साझेदारियाँ: अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) के माध्यम से वैश्विक सौर सहयोग को बढ़ावा।
    • स्वच्छ ऊर्जा निवेश एवं प्रौद्योगिकी हेतु विभिन्न देशों एवं वैश्विक कोषों के साथ सहयोग।

Source: PIB

 

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