पाठ्यक्रम: GS2/ अंतरराष्ट्रीय संबंध, GS3/ ऊर्जा और बुनियादी ढांचा
संदर्भ
- भारत और भूटान ने जल संसाधन प्रबंधन और जलविद्युत विकास में अपनी दीर्घकालिक साझेदारी को पुनः पुष्टि की है। यह घोषणा भूटान की उच्च स्तरीय यात्रा पर गए भारतीय प्रतिनिधिमंडल के दौरान की गई।
भारत–भूटान जलविद्युत संबंध
- प्रारंभिक सहयोग: भारत–भूटान जलविद्युत सहयोग 1961 में जलढाका समझौते पर हस्ताक्षर के साथ प्रारंभ हुआ।
- जलढाका परियोजना भारत की सीमा के अंदर पश्चिम बंगाल में स्थित है और उत्पन्न अधिकांश विद्युत दक्षिणी भूटान को निर्यात की गई।
- 1987 में 336 मेगावाट चुखा जलविद्युत परियोजना का उद्घाटन एक प्रमुख माइलस्टोन था।
- यह भूटान की प्रथम मेगा पावर परियोजना थी।
- इसे भारत द्वारा 60% अनुदान और 40% ऋण के रूप में वित्तपोषित किया गया था, जिसमें ऋण पर 5% ब्याज दर थी और परियोजना शुरू होने के 15 वर्ष बाद भुगतान किया जाना था।
- 1,020 मेगावाट ताला जलविद्युत परियोजना ने द्विपक्षीय सहयोग को सुदृढ़ किया।
- इसे भी भारत सरकार द्वारा 60:40 अनुदान–ऋण मॉडल में वित्तपोषित किया गया और इसने भूटान की निर्यात आय में उल्लेखनीय वृद्धि की।
भारत–भूटान के बीच संस्थागत ढाँचा
- जुलाई 2006 में दोनों देशों ने जलविद्युत शक्ति (HEP) के क्षेत्र में सहयोग पर समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसने सहयोग हेतु औपचारिक ढाँचा प्रदान किया।
- अप्रैल 2014 में दोनों देशों ने संयुक्त उद्यम (JV) जलविद्युत परियोजनाओं के विकास हेतु सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (PSUs) के माध्यम से एक फ्रेमवर्क अंतर-सरकारी समझौते पर हस्ताक्षर किए।
प्रमुख चल रही और नियोजित परियोजनाएँ
- पुनात्सांगचू-I (1,200 मेगावाट): भूवैज्ञानिक समस्याओं के कारण इसमें उल्लेखनीय विलंब और लागत वृद्धि हुई है। 2025 के अंत तक मुख्य बाँध संरचना पर कार्य पुनः आरंभ हुआ।
- संयुक्त उद्यम मॉडल परियोजनाएँ:
- 600 मेगावाट खोलोंगचू जलविद्युत परियोजना
- 180 मेगावाट बुनाखा जलविद्युत परियोजना
- 570 मेगावाट वांगचू जलविद्युत परियोजना
- 770 मेगावाट चामखारचू जलविद्युत परियोजना
भूटान की जलवैज्ञानिक शक्तियाँ
- भूटान की स्थलाकृति और जलवायु बड़े पैमाने पर जलविद्युत के लिए विशेष रूप से अनुकूल हैं।
- प्रमुख भूटानी नदियाँ जैसे पुनात्सांगचू, वांगचू/रैदाक, द्रांगमेचू/मानस, आमोचू/सांकोश आदि हिमपोषित और मानसून-आधारित हैं तथा इनमें तीव्र ढाल है।
- भूटान की हिमनदी झीलें और हिमपिघलन अतिरिक्त जल स्रोत प्रदान करते हैं, यद्यपि वे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) के जोखिम भी उत्पन्न करते हैं।
भारत के लिए महत्त्व
- ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु लक्ष्य: भूटान भारत को स्वच्छ और नवीकरणीय विद्युत प्रदान करता है, जिससे भारत अपने नवीकरणीय ऊर्जा एवं जलवायु प्रतिबद्धताओं को पूरा करने में सक्षम होता है।
- आयातित जलविद्युत भारत की सौर और पवन क्षमता को स्थिर और लचीली ऊर्जा प्रदान कर पूरक बनाता है।
- पूर्वोत्तर में ग्रिड स्थिरता: भारत का पूर्वोत्तर ग्रिड लचीली जलविद्युत क्षमता से लाभान्वित होता है, जो मौसमी माँग और नवीकरणीय परिवर्तनशीलता को प्रबंधित करने में सहायक है।
- थर्मल निर्भरता में कमी: जलविद्युत आयात कोयला-आधारित थर्मल उत्पादन पर निर्भरता कम करता है। इससे कार्बन उत्सर्जन घटता है और ईंधन आयात लागत कम होती है।
- रणनीतिक और आर्थिक आयाम: जलविद्युत भूटान का सबसे बड़ा राजस्व स्रोत है, जिसका अधिकांश हिस्सा भारत को निर्यात से आता है। यह सहयोग हिमालयी क्षेत्र में बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच भारत के रणनीतिक प्रभाव को सुदृढ़ करता है।
चुनौतियाँ
- पर्यावरणीय जोखिम: जलवायु परिवर्तन ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) और पारिस्थितिक क्षति का खतरा बढ़ाता है।
- जलवैज्ञानिक परिवर्तनशीलता: वर्षा और हिमनदी पिघलन के बदलते पैटर्न दीर्घकालिक उत्पादन को प्रभावित करते हैं।
- स्थानीय चिंताएँ: भूमि अधिग्रहण, पारिस्थितिक प्रभाव और आजीविका संबंधी मुद्दों का संवेदनशील प्रबंधन आवश्यक है।
- भूटान के लिए ऋण स्थिरता: जलविद्युत परियोजनाओं हेतु उच्च ऋण लेने से बाहरी ऋण स्तरों पर चिंता बढ़ी है।
आगे की राह
- जलविद्युत सहयोग भारत–भूटान संबंधों का आधारस्तंभ बना हुआ है।
- यह पारस्परिक विश्वास, आर्थिक परस्पर-निर्भरता और साझा रणनीतिक हितों को दर्शाता है।
- सीमापार नदी प्रबंधन को सुदृढ़ करना और पर्यावरणीय रूप से सतत जलविद्युत विकास सुनिश्चित करना आगामी दशकों में इस पारस्परिक रूप से लाभकारी साझेदारी को बनाए रखने के लिए आवश्यक होगा।
स्रोत: DD News
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