संस्कृति और भाषाओं के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता

पाठ्यक्रम: GS1/ संस्कृति , GS2/ शासन

संदर्भ

  • भारत कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) को संस्थागत रूप दे रहा है ताकि डिजिटल, भाषाई और साक्षरता विभाजन को समाप्त कर सके। इसके लिए राष्ट्रीय प्लेटफ़ॉर्मों का एक समूह विकसित किया जा रहा है, जो सांस्कृतिक धरोहर को सुलभ डिजिटल संपत्तियों में परिवर्तित करता है।

एआई संचालित राष्ट्रीय हस्तक्षेप

  • भाषिणी (BHASHINI): 2022 में राष्ट्रीय भाषा अनुवाद मिशन के अंतर्गत प्रारंभ किया गया। भाषिणी को भारत की व्यापक भाषाई विविधता को डिजिटल क्षेत्र में संबोधित करने हेतु विकसित किया गया। यह पहल डिजिटल प्रणालियों में भाषा और वाणी क्षमताओं को सीधे समाहित करने पर केंद्रित है।
  • भारतीय भाषाओं के लिए प्रौद्योगिकी विकास (TDIL): इसका उद्देश्य मूल भाषा प्रौद्योगिकियों का विकास और मानकीकरण है, जिनमें शामिल हैं:
    • मशीन अनुवाद
    • भारतीय लिपियों के लिए ऑप्टिकल कैरेक्टर रिकग्निशन (OCR)
    • वाणी से पाठ और पाठ से वाणी प्रणालियाँ
    • हस्तलिपि पहचान और लिप्यंतरण उपकरण
  • अनुवादिनी (AICTE): अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) द्वारा विकसित एक एआई-आधारित बहुभाषी अनुवाद प्लेटफ़ॉर्म। इसका उद्देश्य शैक्षणिक, तकनीकी और ज्ञान-संबंधी सामग्री का भारतीय भाषाओं में बड़े पैमाने पर अनुवाद करना है।
  • ज्ञान भारतम् मिशन: यह एक राष्ट्रीय मिशन है जिसका लक्ष्य भारत की पांडुलिपि धरोहर और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों का सर्वेक्षण, प्रलेखन, डिजिटलीकरण एवं प्रसार करना है। इसमें राष्ट्रीय डिजिटल भंडार का निर्माण भी शामिल है।
  • ज्ञान-सेतु: यह एक राष्ट्रीय चुनौती के रूप में प्रारंभ किया गया, जिसका उद्देश्य पांडुलिपि संरक्षण, व्याख्या, पुनर्स्थापन और पहुँच के लिए एआई-आधारित समाधान प्राप्त करना है।
  • आदि वाणी: यह एक एआई-आधारित प्लेटफ़ॉर्म है जो जनजातीय भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन और पुनर्जीवन के लिए बनाया गया है। ये भाषाएँ भारत की सांस्कृतिक एवं मौखिक धरोहर का केंद्रीय भाग हैं।

संस्कृति और भाषाओं के संरक्षण में एआई की भूमिका

  • सांस्कृतिक संरक्षण: एआई नाजुक पांडुलिपियों का उच्च गति से स्कैनिंग, OCR, मेटाडेटा निष्कर्षण और बुद्धिमान सूचीकरण सक्षम करता है।
    • उदाहरण: ज्ञान भारतम् मिशन ने 44 लाख से अधिक पांडुलिपियों का प्रलेखन किया है, जिनमें से कई पहले अप्राप्य थीं या क्षय के जोखिम में थीं।
  • ज्ञान का लोकतंत्रीकरण: एआई-आधारित वाणी से पाठ और वास्तविक समय अनुवाद साक्षरता एवं भाषा अवरोधों को कम करते हैं।
    • उदाहरण: काशी तमिल संगमम् 2.0 के दौरान भाषिणी का उपयोग कर भाषणों का वास्तविक समय में अनुवाद किया गया, जिससे सहज बहुभाषी सहभागिता संभव हुई।
  • सामाजिक समावेशन: यह जनजातीय और हाशिए पर स्थित समुदायों को डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र में एकीकृत करता है।
    • उदाहरण: आदि वाणी प्लेटफ़ॉर्म संताली, भीली और गोंडी जैसी भाषाओं को डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र में ला रहा है।
  • आर्थिक सशक्तिकरण: एआई सांस्कृतिक और रचनात्मक क्षेत्रों में आजीविका को सुदृढ़ करता है, दृश्यता, बाज़ार पहुँच, उत्पादकता एवं प्रामाणिकता सत्यापन में सुधार करता है।
  • डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना: एआई भारत की भाषाई विविधता को बड़े पैमाने पर सार्वजनिक प्रणालियों में बहुभाषी और वाणी-आधारित क्षमताओं को समाहित कर तकनीकी शक्ति में परिवर्तित करता है।
    • उदाहरण: भाषिणी ने कुंभ सह’एआई’यक बहुभाषी चैटबॉट को संचालित किया, जिसने 11 भाषाओं में मार्गदर्शन, कार्यक्रम अपडेट और खोया-पाया सहायता प्रदान की।

चुनौतियाँ

  • डिजिटल विभाजन: ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों में सीमित इंटरनेट कनेक्टिविटी, कम डिजिटल साक्षरता और स्मार्ट उपकरणों की कमी एआई प्लेटफ़ॉर्मों के प्रभावी उपयोग को बाधित करती है।
  • एल्गोरिथ्मिक पक्षपात: असमान या प्रमुख-भाषा डेटासेट पर प्रशिक्षित एआई प्रणालियाँ अर्थ को विकृत कर सकती हैं, सांस्कृतिक सूक्ष्मताओं को नज़रअंदाज़ कर सकती हैं या छोटी भाषाई समुदायों को हाशिए पर डाल सकती हैं।
  • संदर्भगत सीमाएँ: मशीन अनुवाद और वाणी पहचान उपकरण बोलियों, उच्चारणों, मुहावरों एवं सांस्कृतिक रूप से निहित ज्ञान प्रणालियों के साथ संघर्ष करते हैं।
  • पारंपरिक ज्ञान संरक्षण: पांडुलिपियों और मौखिक परंपराओं का डिजिटलीकरण स्वामित्व, सहमति और स्वदेशी ज्ञान के संभावित दुरुपयोग को लेकर चिंताएँ उत्पन्न करता है।

आगे की राह

  • समुदाय-केंद्रित दृष्टिकोण: एआई मॉडल स्थानीय समुदायों, भाषाविदों और जनजातीय समूहों की सक्रिय भागीदारी से विकसित किए जाने चाहिए ताकि सांस्कृतिक संवेदनशीलता, संदर्भगत सटीकता एवं ज्ञान प्रणालियों पर स्वामित्व सुनिश्चित हो सके।
  • ऑफ़लाइन और कम-बैंडविड्थ एआई समाधान: एआई प्रणालियाँ दूरस्थ और कम कनेक्टिविटी वाले क्षेत्रों में प्रभावी ढंग से कार्य करने हेतु डिज़ाइन की जानी चाहिए ताकि डिजिटल विभाजन को समाप्त किया जा सके।
  • सार्वजनिक–निजी–शैक्षणिक सहयोग: सरकारी संस्थानों, स्टार्टअप्स, शोध निकायों और नागरिक समाज संगठनों के बीच साझेदारी नवाचार एवं बड़े पैमाने पर कार्यान्वयन को तीव्र कर सकती है।
  • बहुभाषी एआई में वैश्विक नेतृत्व: भारत समावेशी बहुभाषी एआई में वैश्विक नेतृत्व स्थापित कर सकता है, और अपनी भाषा प्रौद्योगिकियों को अन्य भाषाई विविधता वाले देशों में निर्यात कर सकता है।

स्रोत: PIB

 

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