भारत का नेट-ज़ीरो मार्ग: महत्वाकांक्षा, निवेश और सुधार

पाठ्यक्रम: GS3/पर्यावरण

संदर्भ

  • नीति आयोग की विकसित भारत और नेट-ज़ीरो परिदृश्य रिपोर्ट के अनुसार, भारत 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन प्राप्त कर सकता है तथा 2047 तक विकसित अर्थव्यवस्था बन सकता है। किंतु इस परिवर्तन के लिए व्यापक वित्तीय और संरचनात्मक बदलावों की आवश्यकता होगी।

नेट-ज़ीरो क्या है?

  • नेट-ज़ीरो उस अवस्था को दर्शाता है जहाँ एक निश्चित अवधि में वातावरण में छोड़ी गई ग्रीनहाउस गैसों (GHGs) की मात्रा, हटाई गई मात्रा के बराबर होती है।
  • यह निम्नलिखित उपायों के संयोजन से प्राप्त किया जाता है:
    • उत्सर्जन में कमी: जीवाश्म ईंधन से नवीकरणीय ऊर्जा की ओर स्थानांतरण, ऊर्जा दक्षता में सुधार, परिवहन और उद्योग का विद्युतीकरण, स्वच्छ प्रौद्योगिकियों को अपनाना।
    • उत्सर्जन हटाना: प्राकृतिक अवशोषक जैसे वन, मृदा और आर्द्रभूमि, तथा तकनीकी समाधान जैसे कार्बन कैप्चर, उपयोग एवं भंडारण (CCUS)।
  • यह सभी ग्रीनहाउस गैसों (CO₂, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड आदि) को सम्मिलित करता है और व्यापक आर्थिक डीकार्बोनाइजेशन पर केंद्रित है।

नेट-ज़ीरो क्यों महत्वपूर्ण है?

  • वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5–2°C तक सीमित करना आवश्यक है, जैसा कि पेरिस समझौते में उल्लिखित है।
  • यह चरम मौसम, समुद्र-स्तर वृद्धि और पारिस्थितिकी तंत्र हानि जैसे जलवायु जोखिमों को कम करने में सहायक है।
  • यह स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण, नवाचार और सतत आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करता है।

नीति आयोग की रिपोर्ट में उजागर प्रमुख चिंताएँ

  • वित्तीय अंतराल: 2070 तक नेट-ज़ीरो प्राप्त करने हेतु $22.7 ट्रिलियन की आवश्यकता है, जबकि घरेलू संसाधन एकत्रित के पश्चात भी $6.53 ट्रिलियन का अंतर शेष है।
    • अंतर्राष्ट्रीय वित्त पर निर्भरता: जलवायु वित्त की उपलब्धता, समयबद्धता और शर्तों से जुड़े जोखिम।
  • वर्तमान निवेश की अपर्याप्तता: वर्तमान जलवायु निवेश प्रवाह (~$135 बिलियन वार्षिक) दीर्घकालिक डीकार्बोनाइजेशन की आवश्यकता से बहुत कम है।
    • स्वच्छ ऊर्जा के लिए वित्तपोषण भविष्य की मांग वृद्धि की तुलना में अपर्याप्त बना हुआ है।
  • ऊर्जा क्षेत्र संक्रमण जोखिम: 6,500–7,000 GW नवीकरणीय क्षमता तक पहुँचना ग्रिड स्थिरता, भंडारण और प्रसारण अवसंरचना से संबंधित चुनौतियाँ उत्पन्न करता है।
    • संक्रमणकालीन ईंधन के रूप में कोयले पर निरंतर निर्भरता ऊर्जा सुरक्षा और उत्सर्जन कमी के बीच तनाव उत्पन्न करती है।
  • ऊर्जा मांग में वृद्धि: शीतलन, उद्योग और डेटा केंद्रों की तीव्र वृद्धि दक्षता लाभ को संतुलित कर सकती है।
    • केवल शीतलन ही आवासीय विद्युत मांग का एक प्रमुख कारक बनकर उभरा है।
  • औद्योगिक प्रौद्योगिकी अनिश्चितता: कठिन-से-घटाने वाले क्षेत्रों में हरित हाइड्रोजन और कार्बन कैप्चर जैसी प्रौद्योगिकियाँ अभी महंगी और सीमित हैं।
  • महत्वपूर्ण खनिजों पर निर्भरता: स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण लिथियम, तांबा, निकल आदि पर निर्भरता बढ़ाता है।
    • आयात पर निर्भरता, आपूर्ति श्रृंखला के संकेन्द्रण और मूल्य अस्थिरता से जुड़े जोखिम।
  • वित्तीय प्रणाली की सीमाएँ: कॉर्पोरेट बॉन्ड बाजार और घरेलू बचत का वित्तीयकरण अभी अपर्याप्त है।
    • समर्पित हरित वित्त संस्थान की अनुपस्थिति, समन्वित पूंजी तैनाती को सीमित करती है।
  • नीतिगत एवं क्रियान्वयन चुनौतियाँ: दीर्घकालिक नीति स्थिरता, अंतर-क्षेत्रीय समन्वय और सख्त प्रवर्तन आवश्यक है।
    • सुधारों में विलंब संक्रमण लागत को उल्लेखनीय रूप से बढ़ा सकता है।

नीति आयोग की रिपोर्ट में दिए गए प्रमुख सुझाव

  • राष्ट्रीय हरित वित्त संस्थान की स्थापना: भारत के नेट-ज़ीरो संक्रमण हेतु बड़े पैमाने पर पूंजी एकत्रण, एकत्रित करने और तैनात करने के लिए एक समर्पित राष्ट्रीय हरित वित्त संस्थान का निर्माण किया जाए।
    • यह संस्थान परियोजनाओं के जोखिम को कम करने और निजी तथा अंतर्राष्ट्रीय निवेश आकर्षित करने में सहायक होगा।
  • अंतर्राष्ट्रीय जलवायु वित्त एकत्रण: विकसित देशों को भारत की वित्तीय कमी को पूरा करने हेतु $6.53 ट्रिलियन जलवायु वित्त उपलब्ध कराना चाहिए।
    • अंतर्राष्ट्रीय वित्त की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए भारत का वैश्विक पूंजी बाजारों के साथ एकीकरण सुदृढ़ किया जाए।
  • घरेलू वित्तीय बाजारों को गहरा करना: कॉर्पोरेट बॉन्ड बाजार को GDP के लगभग 16% से बढ़ाकर 2070 तक लगभग 30% तक किया जाए।
    • घरेलू बचत का वित्तीयकरण ~60% से बढ़ाकर 75% तक किया जाए ताकि दीर्घकालिक पूंजी को मुक्त किया जा सके।
  • नवीकरणीय ऊर्जा विस्तार को तीव्र करना: 2070 तक सौर और पवन क्षमता को 6,500–7,000 GW तक बढ़ाया जाए।
    • ग्रिड स्थिरता सुनिश्चित करने हेतु बैटरी भंडारण और पम्प्ड हाइड्रो में निवेश किया जाए।
  • विभिन्न क्षेत्रों में विद्युतीकरण को बढ़ावा देना: डीकार्बोनाइजेशन की रीढ़ के रूप में विद्युतीकरण को स्थापित किया जाए, विशेषकर परिवहन और उद्योग में।
    • नेट-ज़ीरो मार्ग के अंतर्गत सड़क परिवहन का 70% से अधिक विद्युतीकरण लक्ष्य रखा जाए।
  • मांग-पक्ष प्रबंधन को सुदृढ़ करना: सख्त उपकरण दक्षता मानकों और भवन ऊर्जा कोड लागू किए जाएँ।
    • बढ़ती ऊर्जा मांग, विशेषकर शीतलन हेतु, प्रबंधन के लिए व्यवहारिक परिवर्तन प्रोत्साहित किए जाएँ।
  • औद्योगिक डीकार्बोनाइजेशन का समर्थन: ऊर्जा दक्षता में सुधार किया जाए और सर्कुलर अर्थव्यवस्था की प्रथाओं को बढ़ावा दिया जाए।
    • कठिन-से-घटाने वाले क्षेत्रों में हरित हाइड्रोजन और कार्बन कैप्चर को शीघ्र अपनाया जाए।
  • महत्वपूर्ण खनिज सुरक्षा सुनिश्चित करना: लिथियम, तांबा और निकल जैसे महत्वपूर्ण खनिजों के लिए घरेलू अन्वेषण, पुनर्चक्रण एवं विविधीकृत आयात स्रोतों को बढ़ावा दिया जाए।
  • संक्रमण के दौरान ऊर्जा सुरक्षा बनाए रखना: विश्वसनीय विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित करने हेतु संक्रमणकालीन ईंधन के रूप में कोयले का उपयोग किया जाए, साथ ही परमाणु और नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार किया जाए।

निष्कर्ष

  • नीति आयोग का विश्लेषण रेखांकित करता है कि भारत का नेट-ज़ीरो लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है, किंतु इसके लिए घरेलू स्तर पर साहसिक सुधार और विकसित देशों से पर्याप्त वित्तीय सहयोग आवश्यक है। 
  • वित्त, ऊर्जा, उद्योग और वैश्विक सहयोग में समन्वित कार्रवाई ही यह तय करेगी कि भारत जलवायु नेतृत्व को आर्थिक विकास के साथ संरेखित कर पाएगा या नहीं।

स्रोत: DD News

 

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