पाठ्यक्रम: GS3/ऊर्जा
संदर्भ
- भारत का कोयला क्षेत्र विकसित भारत 2047 के विकास लक्ष्यों के अनुरूप हरित प्रौद्योगिकियों के साथ एकीकृत होकर आगामी पीढ़ी के ईंधन के रूप में उभर रहा है।
भारत में कोयला क्षेत्र
- विकास (1774 से स्वतंत्रता तक): भारत में वाणिज्यिक कोयला खनन 1774 में रानीगंज कोलफील्ड से शुरू हुआ।
- यह ब्रिटिश शासन के दौरान तीव्रता से फैला, जिसने भाप इंजन और उद्योगों को ऊर्जा दी।
- बंगाल कोल कंपनी (1855 में स्थापित) और हावड़ा–रानीगंज रेल लिंक (1853) ने भारत की औद्योगिक कोयला अर्थव्यवस्था की नींव रखी।
- स्वतंत्रता के पश्चात: सिंगरेनी कोलियरीज (1920) और नेशनल कोल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (1956) जैसी राष्ट्रीय पहलों ने राज्य की भागीदारी को बढ़ाया।
- हालांकि, शुरुआती उत्पादन अक्षमताएँ और सुरक्षा चिंताएँ बनी रहीं।
| भारत की ऊर्जा में कोयला – विद्युत उत्पादन में लगभग 70–75% योगदान; और प्राथमिक ऊर्जा आपूर्ति में 55% हिस्सेदारी। – इस्पात, सीमेंट, एल्युमिनियम, उर्वरक और रक्षा निर्माण जैसी उद्योगों को ऊर्जा प्रदान करता है। |
नीतिगत हस्तक्षेप और राष्ट्रीयकरण (1950–1990 के दशक): 1970 के दशक में राष्ट्रीयकरण का उद्देश्य उत्पादन को स्थिर करना और श्रमिक सुरक्षा सुनिश्चित करना था, लेकिन इससे नवाचार धीमा हो गया।
- फ्रेट इक्वलाइजेशन नीति (1952–1995) ने झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ जैसे खनिज-समृद्ध पूर्वी राज्यों को स्थानीय औद्योगीकरण से हतोत्साहित किया।
- 1993 में निजी भागीदारी आई, लेकिन अक्षमताएँ, भ्रष्टाचार और ब्लॉक आवंटन में गड़बड़ियों के कारण सर्वोच्च न्यायालय ने 2014 में 200 से अधिक कोयला ब्लॉकों को रद्द कर दिया, जिससे भारत के कोयला इतिहास में सबसे व्यापक सुधार शुरू हुआ।
भारत के कोयला उद्योग की प्रमुख चिंताएँ और मुद्दे
- नवीकरणीय ऊर्जा के बावजूद कोयले पर बढ़ती निर्भरता: रिकॉर्ड नवीकरणीय क्षमता के बावजूद 250 GW की चरम मांग के कारण कोयले की मांग 8% बढ़ी।
- पर्यावरण और स्थिरता चुनौतियाँ: CPCB ने झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा के खनन क्षेत्रों में गंभीर वायु प्रदूषण की रिपोर्ट दी।
- अवैध खनन, खराब पुनर्वास और भूजल प्रदूषण बार-बार की समस्याएँ हैं।
- कोल इंडिया लिमिटेड (CIL) को अपनी 60% से अधिक खदानों में हरित मानकों का पालन न करने पर दंड मिला।
- परिवहन और अवसंरचना बाधाएँ: रेलवे रेक की कमी जैसी समस्याओं के कारण विद्युत संयंत्रों को आपूर्ति में देरी हुई।
- 10,000 MW से अधिक क्षमता कोयला लॉजिस्टिक्स बाधाओं के कारण इष्टतम स्तर से नीचे चली गई।
- नए डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (DFC) की योजना है, लेकिन कार्यान्वयन में देरी जारी है।
- वित्तीय और परिचालन अक्षमताएँ: कोल इंडिया की उत्पादकता अभी भी वैश्विक मानकों से पीछे है, प्रति कर्मचारी उत्पादन वैश्विक औसत से 30% कम है।
- भूमि अधिग्रहण और स्वीकृति में देरी परिचालन लागत बढ़ाती है।
- आयातित कोयले की कीमतों में उतार-चढ़ाव मिश्रण और विद्युत दरों को प्रभावित करता है।
- श्रम और सुरक्षा चिंताएँ: खदान सुरक्षा एक बड़ी चिंता बनी हुई है। DGMS ने 2025 में 36 मृत्युएँ दर्ज कीं।
- संविदात्मक श्रमिक कोयला कार्यबल का 45% से अधिक हिस्सा हैं, जो प्रायः वेतन संशोधन की मांग के लिए हड़ताल करते हैं।
- जलवायु और न्यायसंगत संक्रमण बहस: COP28 प्रतिबद्धताओं और भारत के 2070 नेट ज़ीरो लक्ष्य ने कोयले को चरणबद्ध तरीके से कम करने पर परिचर्चा को तीव्र किया है।
- भारत के पास 13 कोयला-निर्भर जिलों के लिए कोई ‘जस्ट ट्रांज़िशन’ योजना नहीं है।
- प्रभावित श्रमिकों के लिए कोई स्पष्ट पुनः कौशल या मुआवजा तंत्र उपस्थित नहीं है।
- आयात निर्भरता और ऊर्जा सुरक्षा: भारत ने 2025 में 220 मिलियन टन से अधिक कोयला आयात किया, जो 2024 से 9% अधिक है।
- घरेलू उत्पादन खपत से धीमी गति से बढ़ा, मुख्यतः मानसून व्यवधान और उपकरण की कमी के कारण।
- सरकार का मिशन कोकिंग कोल इस्पात-ग्रेड कोयले के लक्ष्यों से पीछे है।
- नीतिगत अनिश्चितता और नियामक देरी: नीलामी नियमों और खदान पट्टे नवीनीकरण में बार-बार बदलाव ने निजी भागीदारी को हतोत्साहित किया।
- कोल ऑक्शन राउंड (2025) में केवल 35% खदानों पर बोली लगी।
प्रमुख सुधार और पहल (2014–26)
- कोल माइंस (स्पेशल प्रोविज़न) अधिनियम 2015 तथा खनिज एवं खनन (विकास और विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2015: इनसे पारदर्शी नीलामी संभव हुई, वाणिज्यिक कोयला खनन खोला गया और भारत की कोयला नीति वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं के अनुरूप हुई।
- रिकॉर्ड उत्पादन: भारत ने FY2024–25 में 1,029 मिलियन टन (MT) उत्पादन किया, प्रथम बार 1 बिलियन टन का आँकड़ा पार किया।
- कोल इंडिया लिमिटेड (CIL): 773 MT
- सिंगरेनी कोलियरीज कंपनी लिमिटेड (SCCL): 83 MT
- कैप्टिव और वाणिज्यिक खदानें: 170 MT से अधिक
- आयात में कमी: FY2024–25 में विद्युत के लिए कोयला आयात 20% से अधिक घटा, जिससे भारत ने लगभग ₹30,000 करोड़ विदेशी मुद्रा बचाई।
- राजस्व वृद्धि: कोयला नीलामी से राज्यों को ₹58,000 करोड़ का राजस्व मिला।
- रोज़गार प्रभाव: कोयला मूल्य श्रृंखला से 1.3 करोड़ से अधिक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार जुड़े हैं।
- भविष्य का लक्ष्य: कोयला मंत्रालय का लक्ष्य 2030 तक 1.25–1.5 बिलियन टन उत्पादन है।
स्वच्छ कोयला और प्रौद्योगिकी एकीकरण
- कोल गैसीफिकेशन मिशन 2030: 2030 तक प्रति वर्ष 100 MT कोयला गैसीफिकेशन का लक्ष्य।
- अंडरग्राउंड कोल गैसीफिकेशन (UCG) परियोजनाएँ: 2025 में प्रथम बार UCG ब्लॉकों की नीलामी की घोषणा, स्वच्छ ईंधन रूपांतरण पर ध्यान।
- धोया हुआ कोयला और दक्षता: राख की मात्रा कम करने और तापीय दक्षता बढ़ाने के लिए 35 से अधिक कोयला वॉशरीज़ निर्माणाधीन।
- कार्बन कैप्चर पायलट: NTPC, CIL और NLC इंडिया संयुक्त रूप से कार्बन कैप्चर और उपयोग (CCU) परियोजनाएँ चला रहे हैं।
- डिजिटल खदानें: 350 से अधिक खदानें ड्रोन-आधारित निगरानी, IoT सेंसर और कोल माइन सर्विलांस एंड मैनेजमेंट सिस्टम CMSMS) के माध्यम से उपग्रह निगरानी से लैस।
- कोल एक्सचेंज: वास्तविक समय मूल्य खोज सक्षम करने का लक्ष्य, पारदर्शी बाज़ार-आधारित तंत्र को बढ़ावा देना।
विकसित भारत 2047 की ओर मार्ग
- भारत की कोयला नीति ऊर्जा स्वतंत्रता, पर्यावरणीय जिम्मेदारी और आर्थिक लचीलापन का संतुलन बनाती है, तथा भारत एकीकृत लो-एमिशन कोल इकोसिस्टम की परिकल्पना करता है जहाँ:
- कोयला खनन डिजिटाइज्ड, स्वचालित और परिपत्र हो।
- कोयला नवीकरणीय ऊर्जा और हरित हाइड्रोजन के साथ सह-अस्तित्व में हो।
- भारत सतत संसाधन प्रबंधन में एक वैश्विक मानक के रूप में उभरे।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न] भारत का कोयला क्षेत्र पारंपरिक ऊर्जा स्रोत से आगामी पीढ़ी के ईंधन में रूपांतरण किस प्रकार देश के सतत विकास और ऊर्जा सुरक्षा की दिशा को आकार दे रहा है? |
स्रोत: BL
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