पाठ्यक्रम: GS3/पर्यावरण
संदर्भ
- भारत विश्व का सबसे बड़ा चावल निर्यातक है, जबकि यह अत्यधिक जल-संकटग्रस्त देश है, जो एक नीतिगत विरोधाभास को दर्शाता है।
परिचय
- भारत ने चीन को पीछे छोड़ते हुए विश्व का सबसे बड़ा चावल उत्पादक बनने का स्थान प्राप्त किया और अब यह वैश्विक चावल निर्यात का लगभग 40% हिस्सा है।
- नवीनतम वित्तीय वर्ष में चावल निर्यात 2 करोड़ (20 मिलियन) मीट्रिक टन को पार कर गया।

- भारत 179 अन्य देशों को चावल निर्यात करता है।
- बासमती निर्यात का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया को जाता है, जहाँ सऊदी अरब, इराक, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश अमेरिका से भी बड़े बाज़ार हैं।
भारत के चावल निर्यात से जुड़ी चिंताएँ
- भूजल का क्षय: चावल की खेती अत्यधिक जल-गहन है, जो पंजाब–हरियाणा की कृषि-पर्यावरणीय स्थिति के लिए उपयुक्त नहीं है।
- जलभृतों को अति-शोषित के रूप में वर्गीकृत किया गया है और कमजोर मानसून वर्षों में पुनर्भरण तनाव में वृद्धि होती है।
- एक दशक में भूजल स्तर ~30 फीट से गिरकर 80–200 फीट तक पहुँच गया है।
- ये राज्य वार्षिक पुनर्भरण से 35–57% अधिक भूजल निकालते हैं।
- प्रोत्साहन संरचना: चावल का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) एक दशक में ~70% बढ़ा है।
- मुफ्त या सब्सिडी वाली बिजली भूजल के अति-शोषण को प्रोत्साहित करती है।
- सरकारी सब्सिडी किसानों को कम जल-गहन फसलों की ओर जाने से हतोत्साहित करती है।
- खेती की बढ़ती लागत: किसानों को गहरे बोरवेल खोदने और बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए मजबूत पंपों में निवेश करने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
- जलवायु संवेदनशीलता: भूजल-निर्भर खेती जलवायु परिवर्तनशीलता के प्रति जोखिम बढ़ाती है।
- यह कमजोर मानसून या गर्मी के तनाव की अवधि में लचीलापन कम कर देती है।
- नैतिक चिंता: 1 किलोग्राम चावल उत्पादन में 3,000–4,000 लीटर जल की खपत होती है, जो वैश्विक औसत से कहीं अधिक है।
- यह जल-संकटग्रस्त देश से जल-गहन फसलों के निर्यात पर नैतिक और रणनीतिक प्रश्न उठाता है।
- वैश्विक प्रभाव: सबसे बड़ा चावल निर्यातक होने के नाते, भारत के चावल उत्पादन में किसी भी कमी का प्रभाव वैश्विक खाद्य कीमतों और खाद्य सुरक्षा पर पड़ता है।
- पर्यावरणीय चिंताएँ: चावल एक अर्ध-जलीय पौधा है जिसकी खेती जलमग्न खेतों में होती है, जहाँ यह स्थिर पानी की परत के नीचे पनपता है।
- यह स्थिति बैक्टीरिया के लिए आदर्श अवायवीय वातावरण बनाती है, जो सड़ते हुए जैविक पदार्थ पर पनपते हैं और मीथेन छोड़ते हैं।
- यह घटना वैश्विक मीथेन उत्सर्जन में महत्वपूर्ण योगदान देती है।
आगे की राह
- सतत फसल पैटर्न की ओर बदलाव: जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में धीरे-धीरे जल-गहन चावल की खेती को हतोत्साहित करें और MSP सुधार व खरीद विविधीकरण के माध्यम से बाजरा, दालें एवं मक्का को बढ़ावा दें।
- जल-स्मार्ट कृषि: डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR), सूक्ष्म-सिंचाई और प्रिसिजन फार्मिंग को बढ़ाएँ; भूजल के अति-शोषण को रोकने के लिए मुफ्त विद्युत का तार्किकरण करें।
- अंतरराष्ट्रीय समन्वय: आयातक देशों और वैश्विक संस्थानों के साथ जुड़ें ताकि मूल्य अस्थिरता कम हो तथा संकट के दौरान उत्तरदायी खाद्य व्यापार सुनिश्चित हो।
- डेटा-आधारित निर्णय: भूजल, उत्पादन और भंडार पर वास्तविक समय डेटा का उपयोग करें ताकि निर्यात निर्णय आकस्मिक प्रशासनिक नियंत्रणों के बजाय वैज्ञानिक आधार पर हों।
निष्कर्ष
- एक सतत चावल निर्यात रणनीति को किसान कल्याण, पारिस्थितिक सीमाएँ, खाद्य सुरक्षा और वैश्विक उत्तरदायी के बीच संतुलन बनाना चाहिए, जिससे भारत केवल सबसे बड़ा निर्यातक ही नहीं बल्कि एक जिम्मेदार कृषि शक्ति बन सके।
Source: TH
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