पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था और शासन
संदर्भ
- सरकार ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स को एक नया परामर्श जारी किया है, जिसमें उन्हें अश्लील, अभद्र, अश्लील (पोर्नोग्राफ़िक) और अन्य अवैध सामग्री को अपने प्लेटफ़ॉर्म से हटाने में अधिक सख्ती बरतने के लिए कहा गया है।
परिचय
- कारण: इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) को बार-बार शिकायतें मिली हैं कि ऑनलाइन प्रसारित होने वाली कुछ सामग्री शालीनता एवं अश्लीलता से संबंधित कानूनों का पालन नहीं करती।
- आईटी नियम, 2021 के अंतर्गत, प्लेटफ़ॉर्म्स को यह सुनिश्चित करने के लिए “उचित प्रयास” करने की आवश्यकता है कि उपयोगकर्ता अश्लील, पोर्नोग्राफ़िक या अवैध सामग्री अपलोड या साझा न करें।
- परामर्श:
- MeitY ने प्लेटफ़ॉर्म्स से सुनिश्चित करने को कहा है कि उपयोगकर्ताओं को रिपोर्टिंग और शिकायत निवारण प्रणाली तक आसान पहुँच हो।
- विशेष रूप से बड़े सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स को स्वचालित एवं तकनीक-आधारित उपकरणों का उपयोग करने के लिए कहा गया है, ताकि ऐसी सामग्री को सक्रिय रूप से फैलने से रोका जा सके और तीव्रता से हटाया जा सके।
- 24-घंटे हटाने का नियम: प्लेटफ़ॉर्म्स को शिकायत प्राप्त होने के 24 घंटे के अंदर “प्रथम दृष्टया” यौन प्रकृति की सामग्री, जिसमें प्रतिरूपण भी शामिल है, को हटाना या उसकी पहुँच अक्षम करनी होगी।
- आईटी अधिनियम और/या आईटी नियम, 2021 के प्रावधानों का अनुपालन न करने पर मध्यस्थों, प्लेटफ़ॉर्म्स और उनके उपयोगकर्ताओं के विरुद्ध आईटी अधिनियम, BNS और अन्य लागू आपराधिक कानूनों के तहत अभियोजन सहित परिणाम हो सकते हैं।
डिजिटल सामग्री सेंसरशिप
- डिजिटल सामग्री सेंसरशिप का अर्थ है ऑनलाइन सामग्री का नियंत्रण सरकारों, संगठनों या अन्य संस्थाओं द्वारा। इसमें शामिल है:
- वेबसाइटों और ऐप्स को ब्लॉक करना;
- सोशल मीडिया सामग्री को हटाना;
- ओटीटी (Over-The-Top) स्ट्रीमिंग प्लेटफ़ॉर्म्स का विनियमन;
- डिजिटल समाचार और पत्रकारिता पर प्रतिबंध।
सेंसरशिप की आवश्यकता
- भ्रामक सूचना और फेक न्यूज़ पर रोक: अफवाहों के तीव्रता से फैलाव को रोकता है, जो भीड़ हिंसा, घबराहट और सार्वजनिक अव्यवस्था को उत्पन्न कर सकता है।
- घृणा भाषण और सांप्रदायिक सामग्री पर नियंत्रण: ऐसी सामग्री को रोकना आवश्यक है जो सांप्रदायिक तनाव को बढ़ावा देती है, हिंसा भड़काती है या सामाजिक सद्भाव को खतरे में डालती है।
- बच्चों और कमजोर समूहों की सुरक्षा: हानिकारक, स्पष्ट, हिंसक या भ्रामक सामग्री तक पहुँच को प्रतिबंधित करता है, जो नाबालिगों का शोषण कर सकती है।
- प्लेटफ़ॉर्म जवाबदेही में खामियाँ: सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स सामग्री मॉडरेशन में देरी करते हैं, पारदर्शिता की कमी होती है और प्रायः कमजोर प्रवर्तन तंत्र के कारण जिम्मेदारी से बचते हैं।
- साइबर अपराधों की रोकथाम: बाल पोर्नोग्राफ़ी, तस्करी, ड्रग मार्केट्स या अवैध वित्तीय गतिविधियों से संबंधित वेबसाइटों एवं सामग्री को ब्लॉक करता है।
- एआई खतरों और डीपफेक्स का समाधान: एआई-जनित नकली वीडियो/फोटो को विनियमित करना आवश्यक है, जो प्रतिष्ठा को हानि पहुँचा सकते हैं, लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को विकृत कर सकते हैं और नागरिकों को गुमराह कर सकते हैं।
भारत में डिजिटल सेंसरशिप को नियंत्रित करने वाला कानूनी ढाँचा
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19(1)(a)): शालीनता, नैतिकता और सार्वजनिक व्यवस्था से संबंधित अनुच्छेद 19(2) के अंतर्गत उचित प्रतिबंधों के अधीन।
- सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) अधिनियम, 2000: धारा 69A सरकार को सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था संबंधी चिंताओं के लिए ऑनलाइन सामग्री को ब्लॉक करने की शक्ति देती है।
- मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता, 2021: सोशल मीडिया, ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म्स एवं डिजिटल समाचार मीडिया को विनियमित करता है।
- ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म्स द्वारा स्व-नियमन: नेटफ्लिक्स और अमेज़न प्राइम जैसे प्लेटफ़ॉर्म्स डिजिटल पब्लिशर्स कंटेंट ग्रिवेन्सेस काउंसिल (DPCGC) जैसे स्व-नियामक ढाँचों का पालन करते हैं।
- केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC), जिसे 1952 के सिनेमैटोग्राफ़िक अधिनियम द्वारा स्थापित किया गया था, भारत में फिल्मों को सेंसर करने के लिए उत्तरदायी है।
भारत में डिजिटल सेंसरशिप की चुनौतियाँ
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विनियमन का संतुलन: अत्यधिक विनियमन रचनात्मकता को दबा सकता है, जबकि अपर्याप्त विनियमन हानिकारक सामग्री फैला सकता है।
- पारदर्शिता और जवाबदेही: सामग्री मॉडरेशन और सेंसरशिप निर्णयों में प्रायः स्पष्ट दिशानिर्देशों की कमी होती है, जिससे दुरुपयोग की चिंताएँ बढ़ती हैं।
- अधिकार क्षेत्र संबंधी मुद्दे: कई डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स भारत के बाहर से संचालित होते हैं, जिससे प्रवर्तन कठिन हो जाता है।
- प्रौद्योगिकीगत प्रगति: डिजिटल मीडिया का तीव्र विकास सुसंगत और निष्पक्ष विनियमन को जटिल बनाता है।
- नैतिक चिंताएँ: अश्लीलता कानूनों की व्यक्तिपरक प्रकृति मनमानी सेंसरशिप का कारण बन सकती है।
आगे की राह
- सामग्री मॉडरेशन में पारदर्शिता बढ़ाना: डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स को सामग्री हटाने पर नियमित पारदर्शिता रिपोर्ट प्रकाशित करनी चाहिए।
- डिजिटल साक्षरता को प्रोत्साहित करना: नागरिकों को फेक न्यूज़ पहचानने के लिए शिक्षित करना, बजाय प्रतिबंधात्मक सेंसरशिप लागू करने के।
- नीति निर्माण में सार्वजनिक परामर्श: डिजिटल सामग्री विनियमों को तैयार करने में पत्रकारों, कानूनी विशेषज्ञों और नागरिक समाज को शामिल करना।
Source: TH
Previous article
अभिनव बिंद्रा-नेतृत्व वाली समिति द्वारा भारतीय खेल शासन में प्रणालीगत खामियों का प्रकटीकरण
Next article
क्वांटम मैकेनिक्स के 100 वर्ष