पाठ्यक्रम: GS3/रक्षा
संदर्भ
- रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सशस्त्र बलों को सूचना, वैचारिक, पारिस्थितिकीय और जैविक युद्ध जैसे “अदृश्य” खतरों का सामना करने के लिए सतर्क और तैयार रहने के लिए प्रोत्साहित किया।
परिचय
- अस्थिर वैश्विक व्यवस्था, क्षेत्रीय अस्थिरता और परिवर्तित सुरक्षा परिदृश्य के कारण निरंतर मूल्यांकन एवं तैयारी की आवश्यकता है।
- उन्होंने कमांडरों से प्रधानमंत्री मोदी द्वारा प्रस्तुत “सुदर्शन चक्र विजन” को साकार करने की दिशा में कार्य करने का आग्रह किया।
- यह भारत की 21वीं सदी की सशस्त्र सेना के निर्माण की रूपरेखा है, जो तकनीकी रूप से उन्नत, संयुक्त, आत्मनिर्भर और रणनीतिक रूप से चपल हो, ताकि तीव्रता से परिवर्तित विश्व में राष्ट्रीय हितों की रक्षा की जा सके।
- इस परियोजना के लिए एक समिति गठित की गई है जो मध्यम अवधि (पाँच वर्ष) और दीर्घकालिक (दस वर्ष) रोडमैप तैयार करेगी।
आधुनिकीकरण क्यों आवश्यक है?
- युद्ध की परिवर्तित प्रकृति: पारंपरिक युद्धों से साइबर, अंतरिक्ष, सूचना, ड्रोन और AI-सक्षम हथियारों जैसे हाइब्रिड वॉरफेयर की ओर परिवर्तन।
- क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियाँ: चीन का सैन्य विस्तार, पाकिस्तान के प्रॉक्सी युद्ध और आतंकवाद।
- तकनीकी अंतर: आयात पर निर्भरता कम करने और स्वदेशी क्षमताओं को सुदृढ़ करने की आवश्यकता।
- संचालनात्मक तैयारी: विश्वसनीय प्रतिरोध बनाए रखने और तीव्र, अल्पकालिक संघर्षों के लिए तत्परता सुनिश्चित करने हेतु।
| भारतीय सेना का परिवर्तन का दशक – भारतीय सेना 2023–2032 को ‘परिवर्तन का दशक’ के रूप में मना रही है और 2024–25 को ‘प्रौद्योगिकी आत्मसात के वर्ष’ के रूप में नामित किया है, ताकि भविष्य के लिए तैयार, तकनीक-संचालित, घातक और अनुकुलनशील बल बनने का मार्ग प्रशस्त किया जा सके। परिवर्तन रोडमैप का फोकस: – बल संरचना और रूपांतरण: एक कुशल, युद्ध-तैयार बल का निर्माण। – आधुनिकीकरण और प्रौद्योगिकी समावेशन: अत्याधुनिक तकनीकों को प्राथमिकता देना। – संयुक्तता और एकीकरण: थिएटर कमांड्स के माध्यम से त्रि-सेवा समन्वय को बढ़ाना। – मल्टी-डोमेन संचालन क्षमता: जटिल और विकसित खतरों के लिए तैयारी। – अवसंरचना विकास: संचालनात्मक तत्परता को सुदृढ़ करना। – मानव संसाधन विकास: कुशल और प्रेरित कार्यबल को प्रोत्साहन देना। – आत्मनिर्भरता: रक्षा निर्माण और तकनीक में स्वदेशीकरण को बढ़ावा देना। |
आधुनिकीकरण प्राप्त करने में चुनौतियाँ:
- मल्टी-डोमेन संघर्ष के लिए पुनः अभिविन्यास: उच्च तकनीक वाले बहु-क्षेत्रीय संचालन के लिए बहु-कौशल और बहु-क्षमताओं की आवश्यकता होगी।
- युद्ध की कला को युद्ध के विज्ञान के साथ ऊँचाई पर ले जाना होगा।
- मानव पूंजी और पेशेवर सैन्य शिक्षा (PME): रणनीतिक सोच, तकनीकी अनुकूलन और संयुक्त संचालन में प्रशिक्षित अधिकारियों की आवश्यकता।
- वर्तमान प्रणाली अभी भी पारंपरिक, पद-आधारित करियर प्रगति की ओर झुकी हुई है।
- तकनीकी अंतराल: सेना AI, रोबोटिक्स, ड्रोन, साइबर और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर में पीछे है।
- आधुनिक प्रणालियों का समावेश सिद्धांत, प्रशिक्षण और संरचनाओं में सुधार के साथ मेल नहीं खाता।
- नागरिक–सैन्य समन्वय मुद्दे: रक्षा मंत्रालय, सशस्त्र बलों और उद्योग के बीच समन्वय की कमी।
- पूरी तरह से सशक्त खरीद प्राधिकरण की अनुपस्थिति निर्णयों में देरी करती है।
- भू-राजनीतिक दबाव: चीन और पाकिस्तान से दो-फ्रंट चुनौती तेजी से आधुनिकीकरण की मांग करती है, लेकिन गति धीमी बनी हुई है।
- प्रतिबंधों या आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान की स्थिति में स्वदेशी क्षमताओं की आवश्यकता है।
सरकारी पहलें
- चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) और सैन्य मामलों का विभाग (DMA) (2019): योजना, खरीद और प्रशिक्षण में संयुक्तता एवं एकीकरण को बढ़ाने के लिए स्थापित किया गया।
- रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (DAP) 2020: स्वदेशी डिज़ाइन, विकास और निर्माण को बढ़ावा देती है, “मेक इन इंडिया” श्रेणियों को प्राथमिकता देती है।
- 2025 को “सुधारों का वर्ष” घोषित किया गया: त्रि-सेवा संयुक्तता और एकीकरण को बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित।
- अधिग्रहण प्रक्रियाओं का सरलीकरण एवं तीव्रता से निष्पादन।
- उभरते क्षेत्रों पर बल: साइबर, अंतरिक्ष, AI, मशीन लर्निंग, हाइपरसोनिक्स, रोबोटिक्स।
- इंटीग्रेटेड थिएटर कमांड्स (ITCs): कमांड संरचना को पुनर्गठित करने की पहल ताकि किसी क्षेत्र में सेना, नौसेना और वायुसेना एकीकृत कमांड के अंतर्गत कार्य करें।
- “संयुक्तता” एजेंडे का भाग ताकि दोहराव से बचा जा सके और प्रतिक्रिया क्षमता सुधरे।
- संयुक्त सिद्धांत और प्रौद्योगिकी परिप्रेक्ष्य एवं क्षमता रोडमैप (TPCR) 2025: “रण संवाद 2025” में जारी किया गया, जो ~10 वर्ष की समयावधि के लिए मानक, क्षमता अंतराल एवं तकनीकी विकास को रेखांकित करता है।
- भूमि, समुद्र, वायु, अंतरिक्ष, साइबर, संज्ञानात्मक जैसे बहु-क्षेत्रीय संचालन के लिए संयुक्त सिद्धांतों के साथ-साथ विशेष बलों जैसे विशिष्ट संयुक्त सिद्धांतों को शामिल किया गया है ताकि इंटरऑपरेबिलिटी सुधरे।
- रक्षा औद्योगिक गलियारे और स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा: तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में दो रक्षा औद्योगिक गलियारे स्थापित किए गए हैं ताकि रक्षा निर्माण पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ किया जा सके तथा घरेलू रक्षा उत्पादन को बढ़ावा मिले।
- संयुक्त अभ्यास: भारतीय सशस्त्र बल त्रि-सेवा एकीकृत बहु-क्षेत्रीय अभ्यास करते हैं जो सेना, वायुसेना और नौसेना की समन्वित संचालन पर केंद्रित होते हैं (जैसे अभ्यास प्रचंड प्रहार, अभ्यास डेजर्ट हंट)।
- इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम (IACCS): यह वास्तविक समय समन्वय के लिए आधार प्रदान करता है, जिससे सेना, नौसेना और वायुसेना की कई इकाइयों के बीच समन्वित प्रतिक्रिया संभव होती है।
आगे की राह
- एक आधुनिक, अनुकूलनशील और तकनीक-प्रवीण बल बनना केवल एक सपना नहीं बल्कि आज के विश्व में एक अनिवार्यता है, जहाँ तकनीक युद्ध और योद्धाओं से तीव्रता से आगे निकल रही है।
- यह रूपांतरण केवल तकनीकी नवाचार से नहीं, बल्कि बल संरचना, अनुकूलनशील प्रशिक्षण और रणनीति, तथा उपकरणों के पुनर्विचार की प्रतिबद्धता से संभव होगा, ताकि भारत एक भविष्य-तैयार सशस्त्र बल बन सके।
Source: TH
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