पाठ्यक्रम: GS2/IR
संदर्भ
- ईरान-इज़राइल के बीच चल रहे संघर्ष के बीच पाकिस्तान ने ईरान को मजबूत समर्थन दिया है।
ईरान और पाकिस्तान संबंध
- मूलभूत संबंध: ईरान वह प्रथम देश था जिसने 1947 में पाकिस्तान की स्वतंत्रता के पश्चात् उसे मान्यता दी।
- 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्धों के दौरान ईरान ने पाकिस्तान को सैन्य और कूटनीतिक समर्थन प्रदान किया।
- हालाँकि दोनों देशों की इस्लामी पहचान साझा है, लेकिन 1979 की ईरानी क्रांति के बाद आपसी अविश्वास गहरा हो गया, जिससे ईरान की भूराजनीतिक सोच पूरी तरह परिवर्तित हो गई।

- सीमा तनाव और बलूच मुद्दा: ईरान-पाकिस्तान की 900 किलोमीटर लंबी सीमा बलूच क्षेत्र से होकर गुजरती है, जिसमें एक ओर पाकिस्तान का बलूचिस्तान प्रांत और दूसरी ओर ईरान का सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत है।
- दोनों पक्ष एक-दूसरे पर अलगाववादी समूहों को पनाह देने का आरोप लगाते हैं।
- विगत एक दशक में कम से कम 15 सीमा झड़पें हुई हैं, हालिया घटना जनवरी 2024 में हुई।
- अफ़ग़ानिस्तान को लेकर मतभेद: ईरान (शिया-बहुल) ने 1990 के दशक में तालिबान विरोधी नॉर्दर्न अलायंस का समर्थन किया, क्योंकि तालिबान एक कट्टरपंथी शिया-विरोधी समूह है जो ईरान से लगती 921 किमी की सीमा वाले देश पर शासन करता था।
- वहीं पाकिस्तान पारंपरिक रूप से तालिबान का समर्थन करता रहा है, जिससे अफ़ग़ानिस्तान में दोनों देशों के हितों में टकराव बना रहा।
- पंथीय परिप्रेक्ष्य और सऊदी कारक: सऊदी अरब (सुन्नी बहुल शक्ति) से पाकिस्तान की गहरी निकटता ने ईरान के साथ रिश्तों में तनाव उत्पन्न किया।
- सऊदी-प्रायोजित सुन्नी मदरसे पाकिस्तान में शिया विरोधी विचारधाराओं को बढ़ावा देते हैं।
- ईरान इसे अपने हितों के विरोध में एक व्यापक सुन्नी गठजोड़ के रूप में देखता है।
अमेरिकी दृष्टिकोण: भिन्न संरेखण
- 1979 के बाद से ईरान अमेरिका के प्रति शत्रुता बनाए हुए है, जबकि पाकिस्तान विशेष रूप से शीत युद्ध के दौर में अमेरिकी समर्थन पर निर्भर रहा है।
- 9/11 के बाद पाकिस्तान अमेरिका का प्रमुख सहयोगी बन गया, जिसे बड़े पैमाने पर सैन्य और आर्थिक सहायता मिली।
- 2021 के बाद (अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिका की वापसी के पश्चात) अमेरिका की रणनीतिक प्राथमिकताओं में पाकिस्तान का महत्व कम हो गया है।
- अब ईरान–इज़राइल तनाव पाकिस्तान को अमेरिकी नज़र में फिर से प्रासंगिक बनने का एक कूटनीतिक अवसर प्रदान करता है:
- ईरान को सैन्य समर्थन न देने की सार्वजनिक घोषणा अमेरिका को आश्वस्त करती है।
- पाकिस्तान ने स्वयं को मध्यस्थ के रूप में प्रस्तुत किया है; विदेश मंत्री का दावा है कि वह ईरान की अमेरिका से बातचीत करने की इच्छा को बढ़ावा देने के प्रयास कर रहे हैं, बशर्ते इज़राइली हमले रुके।
भारत के लिए ईरान का रणनीतिक महत्त्व
- भारत और ईरान के बीच गहरे सभ्यतागत, भाषाई और ऐतिहासिक संबंध हैं। स्वतंत्रता के पश्चात् 1950 में दोनों देशों ने मैत्री संधि पर हस्ताक्षर किए।
- 2001 का तेहरान घोषणापत्र और नई दिल्ली घोषणापत्र जैसे प्रमुख कदमों ने अर्थव्यवस्था, ऊर्जा, शिक्षा और आतंकवाद विरोध सहित विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग को मजबूत किया।
- ईरान भारत के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है क्योंकि यह विशेष रूप से चाबहार बंदरगाह और अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC) के माध्यम से संपर्क सुविधा प्रदान करता है।
- ये वैकल्पिक व्यापार मार्ग उपलब्ध कराते हैं जो पाकिस्तान को दरकिनार कर मध्य एशिया तक भारत की पहुँच को सुलभ बनाते हैं।
उभरती चुनौतियाँ
- ईरान-इज़राइल संकट के बीच पाकिस्तान की गतिविधियाँ क्षेत्रीय प्रभाव वापस पाने और अमेरिका से दोबारा जुड़ने की व्यापक रणनीति का हिस्सा प्रतीत होती हैं। पाकिस्तान का यह संतुलनकारी रुख निम्नलिखित क़दमों में दिखता है:
- ईरान को सार्वजनिक रूप से गैर-सैन्य समर्थन देना।
- अफ़ग़ानिस्तान के बाद की स्थिति में कूटनीतिक साधनों के ज़रिए वैश्विक विमर्श में बने रहना।
- पाकिस्तान को लगता है कि ईरान को दिए जा रहे भाषायी समर्थन से वह भारत-ईरान संबंधों को कमजोर कर सकता है, विशेष रूप से चाबहार बंदरगाह और अन्य संपर्क परियोजनाओं में भारत के निवेश को देखते हुए।
निष्कर्ष
- ईरान–पाकिस्तान संबंध एक रणनीतिक विरोधाभास हैं: सतह पर ये दोनों इस्लामी मित्र राष्ट्र दिखाई देते हैं, लेकिन वास्तव में ये क्षेत्रीय, पंथीय और वैश्विक धारणाओं को लेकर विभाजित भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धी हैं।
- इसमें अमेरिका की भूमिका, भारत की ईरान के प्रति रणनीतिक सक्रियता और ईरान–इज़राइल संघर्ष जैसे तत्व इस जटिल समीकरण को अधिक प्रगाण करते हैं।
- भारत के लिए इस संबंध को समझना, ईरान में अपने हितों की रक्षा करने और पाकिस्तान की पुनर्निर्धारित विदेश नीति के बीच क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने की कुंजी है।
Source: IE
Read this in English: Understanding Pakistan’s Balancing Act on Iran
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