राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC)

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राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC)
राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC)

राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC), पिछड़े वर्गों के कल्याण और सशक्तिकरण को सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्र की प्रतिबद्धता का प्रतीक है। यह आयोग समाज के हाशिए पर रहने वाले वंचित वर्गों के उत्थान के लिए समर्पित है, इसलिए इस आयोग को समानता और समावेशिता के संरक्षक के रूप में जाना जाता है। NEXT IAS के इस लेख का उद्देश्य राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग का विस्तार से अध्ययन करना है, जिसके अंतर्गत आयोग के विकास, गठन, कार्य, शक्तियाँ और अन्य संबंधित पहलूओं को समझाना हैं।

  • राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC) भारत में एक संवैधानिक निकाय है।
  • इसकी स्थापना सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (SEBCs) के शोषण के खिलाफ सुरक्षा उपाय प्रदान करने के साथ-साथ उनके सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक हितों की रक्षा करने के लिए की गई है।
  • राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC) का मुख्यालय नई दिल्ली में है।
भारत के संविधान में न तो पिछड़े वर्ग (BCs) को परिभाषित किया गया है और न ही इस वर्ग को चिह्नित करने के लिए एक समान लक्षणों या कारकों का वर्णन किया गया है।
– सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय
के अनुसार, पिछड़े वर्ग (BCs) का अर्थ अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के अलावा ऐसे पिछड़े वर्ग के नागरिक हैं जिन्हें केंद्र सरकार द्वारा निर्दिष्ट किया गया है।
– 2011 की जनगणना के दौरान अन्य पिछड़ा वर्ग (OBCs) पर कोई डेटा एकत्र नहीं किया गया था।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 338-B राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (एनसीबी) के प्रावधानों से संबंधित है।

राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC), अपने वर्तमान स्वरूप में, जैसा कि नीचे देखा जा सकता है, विकास की एक श्रृंखला के माध्यम से विकसित हुआ है:

इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ मामले (1992) में, जिसे मंडल मामले (1992) के रूप में भी जाना जाता है, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को पिछड़े वर्गों की सूची में किसी भी वर्ग के नागरिकों को शामिल न करने (गैर-समावेशन), कम शामिल करने (अल्प-समावेशन) या अधिक शामिल करने की शिकायतों की जाँच के लिए एक स्थायी वैधानिक निकाय गठित करने का निर्देश दिया।

  • सुप्रीम कोर्ट के मंडल मामले के निर्णय का अनुपालन करते हुए संसद ने राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग अधिनियम, 1993 को अधिनियमित किया।
  • यह अधिनियम सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के तहत राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC) को एक वैधानिक निकाय के रूप में स्थापित करता है।
  • इसने संविधान में एक नया अनुच्छेद 338-B जोड़ा तथा राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (एनसीबी) को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया।
    • इस प्रकार, 102वें संविधान संशोधन के बाद एनसीबी एक संवैधानिक निकाय बन गया।
  • पिछड़े वर्गों के हितों की अधिक प्रभावी ढंग से रक्षा करने के लिए इस संशोधन ने आयोग को सौंपे गए कार्यों के दायरे को भी बढ़ा दिया।
  • इसमें एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष और तीन अन्य सदस्य होते हैं।
  • उन्हें भारत के राष्ट्रपति के हस्ताक्षर और मुहर के पश्चात् नियुक्त किया जाता है।
  • उनकी सेवा शर्तें और पदावधि राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित की जाती हैं।

राष्ट्रीय पिछड़े वर्ग आयोग के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्य (सेवा शर्तें और कार्यकाल) नियम, 2004 के तहत:

  • राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC) के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और अन्य सदस्य उस तिथि से तीन वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेंगे जिस दिन से वे उस पद को ग्रहण करते हैं।
  • अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और अन्य सदस्य दो से अधिक कार्यकालों के लिए नियुक्ति के पात्र नहीं होंगे।

राष्ट्रीय पिछड़े वर्ग आयोग के प्रमुख कार्यों में शामिल हैं:

  • सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (SEBCs) के लिए संवैधानिक और अन्य कानूनी सुरक्षा उपायों से संबंधित सभी मामलों की जाँच एवं निगरानी करना तथा उनके कार्यान्वयन का मूल्यांकन करना।
  • सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (SEBCs) के अधिकारों और सुरक्षा उपायों से वंचित किये जाने के संबंध में विशिष्ट शिकायतों की जाँच करना।
  • सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (SEBCs) के सामाजिक-आर्थिक विकास की योजना प्रक्रिया में भाग लेना और सलाह देना तथा केंद्र या राज्य सरकार के तहत उनके विकास की प्रगति का मूल्यांकन करना।
  • राष्ट्रपति को वार्षिक या ऐसे अन्य समय पर जैसा कि राष्ट्रपत उचित समझे, उन सुरक्षा उपायों के कार्यान्वयन पर रिपोर्ट प्रस्तुत करना।
  • केंद्र या राज्य सरकारद्वारा उन सुरक्षा उपायों के प्रभावी कार्यान्वयन और सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (SEBCs) के संरक्षण, कल्याण और सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए अन्य उपायों के लिए किये जाने वाले उपायों के संबंध में सिफारिशें करना।
  • राष्ट्रपति द्वारा निर्दिष्ट किये जाने वाले सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (SEBCs) के संरक्षण, कल्याण, विकास और उन्नति से संबंधित ऐसे अन्य कार्यों का निर्वहन करना।
  • आयोग को अपनी प्रक्रिया को विनियमित करने की शक्ति प्राप्त है।
  • किसी मामले या किसी शिकायत की जांच करते समय आयोग के पास सिविल कोर्ट की सभी शक्तियाँ होती हैं, अर्थात्
    • भारत के किसी भी भाग से किसी भी व्यक्ति को उपस्थित होने के लिए समन जारी करना तथा शपथ पर उससे पूछताछ करना,
    • जांच से संबंधित किसी भी दस्तावेज के लिए संबंधित अधिकारी को आदेश देना,
    • शपथ पत्रों पर साक्ष्य प्राप्त करना,
    • किसी भी न्यायालय या कार्यालय से किसी भी सार्वजनिक रिकॉर्ड की माँग करना,
    • गवाहों और दस्तावेजों की जाँच के लिए समन जारी करना,
    • कोई अन्य मामला जो राष्ट्रपति निर्धारित करते है।
  • केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (SEBCs) को प्रभावित करने वाले सभी प्रमुख नीतिगत मामलों पर आयोग से परामर्श करने की आवश्यकता है।
    • हालाँकि, यह ध्यान देने योग्य है कि 2021 में 105वें संशोधन अधिनियम ने राज्य सरकारों को अपने स्वयं के उद्देश्यों के लिए सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की सूची तैयार करने एवं बनाए रखने के संबंध में आयोग के साथ इस परामर्श से छूट दे दी है।
  • आयोग के द्वारा राष्ट्रपति को वार्षिक या ऐसे अन्य समय पर रिपोर्ट प्रस्तुत की जाती है जैसा वह उचित समझे।
  • आयोग की सिफारिशों पर की गई कार्रवाई के बारे में बताने वाले एक ज्ञापन के साथ सभी रिपोर्टों को राष्ट्रपति द्वारा संसद के समक्ष रखा जाता हैं।
    • ज्ञापन में ऐसी किसी भी सिफारिश को स्वीकार न करने के कारणों का भी उल्लेख होता है।
  • राष्ट्रपति किसी राज्य सरकार से संबंधित आयोग की रिपोर्ट को संबंधित राज्यपाल को भी प्रेषित करते है।
    • राज्यपाल इसे राज्य विधानमंडल के समक्ष प्रस्तुत करते है, साथ ही आयोग की सिफारिशों पर की गई कार्रवाई की व्याख्या करते हुए एक ज्ञापन भी दिया जाता है।
    • ज्ञापन में ऐसी किसी भी सिफारिश को स्वीकार न करने के कारणों का भी उल्लेख होता है।

निष्कर्षत: राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग भारत के समावेशी समाज के निरंतर प्रयास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अधिकारों की प्रभावी सुरक्षा, विकास पहलों को बढ़ावा देने और नीतिगत बदलावों की वकालत करके आयोग के द्वारा सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (SEBCs) को सशक्त बनाया जा सकता है तथा सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (SEBCs) के बेहतर न्यायसंगत भविष्य का निर्माण किया जा सकता है। जैसे-जैसे भारत समावेशी विकास और सामाजिक न्याय की ओर अग्रसर होता है, वैसे-वैसे राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग एक महत्त्वपूर्ण संस्था बनकर उभर रहा है।

भारतीय संविधान में पिछड़े वर्गों के कल्याण के लिए विभिन्न प्रावधान किये गए हैं, जिनमें शामिल हैं:

अनुच्छेद 340: यह अनुच्छेद सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की स्थितियों की जाँच करने के लिए एक आयोग की नियुक्ति से संबंधित है।
अनुच्छेद 338 (B): यह अनुच्छेद राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की स्थापना से संबंधित है।
अनुच्छेद 342(A): यह अनुच्छेद राष्ट्रपति को विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों को निर्दिष्ट करने का अधिकार देता है।
इस संबंध में राष्ट्रपति संबंधित राज्य के राज्यपाल से परामर्श कर सकते है।
हालाँकि, यदि पिछड़े वर्गों की सूची में संशोधन किया जाना है तो इसके लिए संसद द्वारा अधिनियमित कानून की आवश्यकता होगी।
अनुच्छेद 366: इस अनुच्छेद में केंद्र सरकार और भारत के राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा पिछड़े वर्गों को परिभाषित करने के लिए “सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों” शब्दों को शामिल करने के लिए संशोधन किया गया था।

संवैधानिक प्रावधानों के अतिरिक्त पिछड़े वर्गों के कल्याण के लिए निम्नलिखित वैधानिक प्रावधान भी मौजूद हैं:

राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग अधिनियम, 1993: यह अधिनियम भारत में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के हितों की रक्षा के लिए एक वैधानिक निकाय के रूप में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC) की स्थापना करता है।
राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग वित्त और विकास निगम (NBCFDC): यह निगम अन्य पिछड़ा वर्गों से संबंधित व्यक्तियों और समुदायों को वित्तीय सहायता और विकासात्मक समर्थन प्रदान करने पर केंद्रित है।

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