अप्रत्यक्ष कर (Indirect Tax): अर्थ, प्रकार, महत्त्व और आलोचनाएँ

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अप्रत्यक्ष कर
अप्रत्यक्ष कर

अप्रत्यक्ष कर किसी देश की कराधान प्रणाली के साथ-साथ राजकोषीय नीति का एक प्रमुख घटक होता है। ये कर न केवल सरकारी राजस्व संग्रहण एवं आर्थिक विनियमन (Economic Regulation) के लिए, बल्कि आवश्यक सार्वजनिक सेवाओं के वित्तपोषण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। NEXT IAS के इस लेख का उद्देश्य अप्रत्यक्ष कर के अर्थ, प्रकार, महत्त्व और आलोचनाओं सहित विस्तार से अध्ययन करना है। उत्पाद शुल्क, सीमा शुल्क, बिक्री कर, सेवा कर, वस्तु एवं सेवा कर (GST) जैसे विभिन्न प्रकार के अप्रत्यक्ष कर से संबंधित अन्य अवधारणाओं पर इस लेख में विस्तार से चर्चा की गई है।

  • कर व्यक्तियों, व्यवसायों या निगमों पर लगाए जाने वाले अनैच्छिक शुल्क (Involuntary Fees) हैं, जिन्हें स्थानीय, राज्य या राष्ट्रीय स्तर की सरकारी इकाई द्वारा लागू किया जाता है।
    • इस प्रकार, ये सरकार को किसी इकाई द्वारा देय अनिवार्य शुल्क हैं।
  • कर सरकार के लिए राजस्व का मूल स्रोत हैं, जिसका उपयोग सरकार अपने विभिन्न खर्चों जैसे रक्षा, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और सड़क, बांध, राजमार्ग आदि जैसी विभिन्न बुनियादी सुविधाओं के लिए करती है।
  • अप्रत्यक्ष कर एक प्रकार के ऐसे कर को संदर्भित करता है जिसके लिए कराघात (Impact of Tax) और करापात (Incidence of Tax) अलग-अलग व्यक्तियों या संस्थाओं पर पड़ता है।
  • अप्रत्यक्ष कर आम तौर पर वस्तुओं और सेवाओं पर लगाए जाते हैं।
    • ये प्रत्यक्ष करों से भिन्न होते हैं क्योंकि ये उस व्यक्ति पर नहीं लगाए जाते हैं जो प्रत्यक्ष रूप से सरकार को भुगतान करता है। इसके बजाय, ये उत्पादों / सेवाओं पर लगाए जाते हैं और उत्पाद का विक्रय करने वाले व्यक्ति द्वारा एकत्र किए जाते हैं।
  • भारत में अप्रत्यक्ष करों का प्रशासन केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर और सीमा शुल्क बोर्ड (CBIC) द्वारा किया जाता है, जो राजस्व विभाग (वित्त मंत्रालय के तहत) के अधीन है।
  • प्रत्यक्ष कर से तात्पर्य ऐसे करो (Taxes) से है जो उस व्यक्ति/संस्था द्वारा वहन किया जाता है जिस पर इन्हें आरोपित किया जाता है।
  • इस प्रकार, इस मामले में कराघात (Impact of Tax) और करापात (Incidence of Tax) एक ही व्यक्ति या संस्था पर पड़ता है।
  • दूसरे शब्दों में, प्रत्यक्ष कर का बोझ किसी अन्य व्यक्ति या संस्था पर नहीं डाला जा सकता।

अप्रत्यक्ष कर की कुछ प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • उपभोग पर कर (Tax on Consumption): अप्रत्यक्ष कर किसी व्यक्ति की आय पर प्रत्यक्ष रूप से नहीं बल्कि वस्तुओं और सेवाओं के उपभोग पर लगाया जाता है।
  • अप्रत्यक्ष रूप से भुगतान (Paid Indirectly) : प्रत्यक्ष करों के विपरीत, जिसे करदाता द्वारा सरकार को प्रत्यक्ष रूप से भुगतान किया जाता है, अप्रत्यक्ष कर एक मध्यस्थ, जैसे विक्रेता या सेवा प्रदाता द्वारा संगृहीत किए जाते हैं, और फिर सरकार को दिए जाते हैं।
  • प्रतिगामी प्रकृति (Regressive Nature): ये प्रतिगामी होते हैं, क्योंकि हर कोई किसी दिए गए उत्पाद या सेवा के लिए समान राशि का भुगतान करता है, चाहे उनकी आय का स्तर कुछ भी हो।
  • व्यापक आधार (Broad Base): इनका कर आधार आम तौर पर व्यापक होता है, क्योंकि ये आबादी द्वारा उपभोग की जाने वाली वस्तुओं और सेवाओं की एक विस्तृत श्रृंखला पर आरोपित किए जाते हैं।
  • खर्च करने के पैटर्न पर प्रभाव (Impacts Spending Patterns): ये उपभोक्ता के व्यय करने के पैटर्न को प्रभावित कर सकते हैं, क्योंकि उपभोक्ताओं द्वारा वस्तुओं और सेवाओं का अंतिम मूल्य पर क्रय किया जाता हैं, इसमें कर भी शामिल होते हैं।

भारत में अप्रत्यक्ष करों के कुछ प्रमुख उदाहरणों में शामिल हैं:

  • उत्पाद शुल्क (Excise Duty)
  • सीमा शुल्क (Customs Duty)
  • बिक्री कर (Sales Tax)
  • सेवा कर (Service Tax)
  • वस्तु एवं सेवा कर (Goods and Services Tax)
  • चुंगी और प्रवेश कर (Octroi and Entry Tax)
  • टोल टैक्स (Toll Tax)
  • स्टांप ड्यूटी (Stamp Duty)
  • उत्पाद शुल्क एक ऐसा कर था, जो भारत में वस्तुओं के उत्पादन, लाइसेंसिंग और बिक्री करने पर लगाया जाता था।
    • दूसरे शब्दों में, यह एक शुल्क था जो निर्माताओं को उनके द्वारा उत्पादित कुछ वस्तुओं के लिए देना पड़ता था।
    • यद्यपि प्रारम्भ में निर्माता द्वारा भुगतान किया जाता था, लेकिन अंततः इसे खुदरा विक्रेता (Retailer) या मध्यस्थ द्वारा उच्च कीमतों के रूप में ग्राहको से वसूला जाता था।
  • यह मुख्य रूप से केंद्र सरकार द्वारा लगाया जाता था। इसलिए, इसे केंद्रीय उत्पाद शुल्क या केंद्रीय मूल्य वर्धित कर (CENVAT) भी कहा जाता था।
  • यद्यपि, यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि कुछ उत्पाद शुल्क राज्य सरकार द्वारा भी लगाए जाते थे, जैसे शराब और नशीले पदार्थों पर उत्पाद शुल्क।
    • अधिकांश उत्पाद शुल्क अब वस्तु और सेवा कर (GST) के अंतर्गत आ गए हैं।
  • अधिकांश उत्पादों के लिए उत्पाद शुल्क को ज्यादातर केंद्रीय जीएसटी (CGST) द्वारा प्रतिस्थापित किया गया है।
  • यद्यपि, कुछ उत्पाद शुल्क अभी भी वस्तु एवं सेवा कर (GST) से अलग लगाए जाते हैं, जैसे: शराब पर उत्पाद शुल्क (जो राज्य सरकारों द्वारा आरोपित किया जाता है)। पेट्रोलियम उत्पादों पर उत्पाद शुल्क (जो केंद्र सरकार द्वारा लगाया जाता है)।
  • सीमा शुल्क एक ऐसा कर है जो आयात के साथ-साथ कुछ वस्तुओं के निर्यात पर भी लगाया जाता है।
    • यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि देश में आयात किए जाने वाले लगभग सभी सामानों पर सीमा शुल्क लगाया जाता है।
  • दूसरी ओर, सीमा शुल्क शुल्क केवल कुछ वस्तुओं पर लगाया जाता है जैसा कि सीमा शुल्क अधिनियम, 1975 की दूसरी अनुसूची में उल्लिखित है।
    • सीमा शुल्क केंद्र सरकार द्वारा आरोपित एवं संग्रहित किया जाने वाला कर है।
    • सीमा शुल्क का प्रमुख उद्देश्य हैं: वस्तुओं के अवैध आयात और निर्यात को प्रतिबंधित करना है।
    • स्वदेशी उद्योगों की रक्षा करना तथा विनिमय दर (Exchange Rate) को स्थिर रखने के लिए आयात को न्यूनतम स्तर पर रखना।

भारत में लगाए जाने वाले सीमा शुल्क के कुछ प्रमुख प्रकारों को नीचे दिए गए अनुभागों में समझाया गया है:-

मूल सीमा शुल्क (Basic Customs Duty)

मूल सीमा शुल्क से तात्पर्य सीमा शुल्क अधिनियम, 1962 के तहत आयातित वस्तुओं पर लगाए जाने वाले सीमा शुल्क से है।

अतिरिक्त सीमा शुल्क या प्रतिकारी शुल्क (CVD)

  • अतिरिक्त सीमा शुल्क या प्रतिकारी शुल्क (CVD) आयातित उत्पादों पर लगाया जाने वाला एक अतिरिक्त आयात शुल्क है, यह शुल्क उन उत्पादों पर लगाया जाता है, जिन्हें उनके मूल देश में निर्यात सब्सिडी और कर रियायतों जैसे लाभ प्रदान करके सस्ता किया जाता है।
  • ध्यान देने वाली बात यह है कि प्रतिकारी शुल्क (CVD) केवल कुछ चयनित आयातित वस्तुओं पर लगाया जाता है, सभी आयातों पर नहीं।
  • प्रतिकारी शुल्क (CVD) लगाने का निर्णय वित्त मंत्रालय द्वारा व्यापार-उपचार महानिदेशक (Director General of Trade Remedies) की सिफारिश के आधार पर लिया जाता है।
  • डंपिंग तब होती है जब किसी देश द्वारा किसी अन्य देश को वस्तुओं का निर्यात उसके मूल देश में बिक्री मूल्य से कम कीमत पर किया जाता है।
    • यह एक अनुचित व्यापार व्यवहार है जिसका अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर विकृत प्रभाव पड़ सकता है।
  • एंटी-डंपिंग ड्यूटी एक आयात शुल्क है जो एक देश द्वारा दूसरे देश द्वारा डंप किए जा रहे माल पर लगाया जाता है।
  • इसका उद्देश्य माल की डंपिंग से उत्पन्न होने वाले विकृत व्यापार प्रभाव को ठीक करना है।
  • एंटी-डंपिंग ड्यूटी काउंटरवेलिंग ड्यूटी से इस प्रकार भिन्न है:
    • काउंटरवेलिंग ड्यूटी का उद्देश्य सब्सिडी के कारण कम लागत और कम कीमत से स्वदेशी उद्योगों को होने वाली हानि से बचाना है।
    • एंटी-डंपिंग ड्यूटी का उद्देश्य अन्य विदेशी वस्तुओं को अपने बाजार में सस्ते मूल्य डंपिंग करने से रोकना है।
  • निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा के साधन के रूप में एंटी-डंपिंग ड्यूटी के उपयोग की अनुमति WTO द्वारा दी गई है।
  • निर्यात शुल्क से तात्पर्य माल के निर्यात पर लगाए जाने वाले सीमा शुल्क से है।
  • इस शुल्क का मुख्य उद्देश्य कुछ वस्तुओं के निर्यात को प्रतिबंधित करना है।
  • बिक्री कर एक उपभोग-आधारित अप्रत्यक्ष कर था जो सरकार द्वारा वस्तुओं और सेवाओं की बिक्री पर लगाया जाता था।
  • इसे बिक्री के बिंदु पर लगाया जाता था, खुदरा विक्रेता द्वारा एकत्र किया जाता था और सरकार को दिया जाता था।
  • भारत में, बिक्री कर केंद्र और राज्य दोनों सरकारों द्वारा संगृहीत किया जाता था:
    • राज्य बिक्री कर
      • यह प्राथमिक बिक्री कर था जिसका लोगों को सामना करना पड़ता था।
      • अलग-अलग राज्य सरकारें अपनी सीमाओं के भीतर वस्तुओं की बिक्री पर अपनी बिक्री कर दरें लगाती थीं।
    • केंद्रीय बिक्री कर (CST)
      • यह कर वस्तुओं की अंतरराज्यीय बिक्री (एक राज्य से दूसरे राज्य में) पर लागू होता था।
      • यह केंद्र सरकार द्वारा लगाया जाता था और इसका उद्देश्य राज्य की सीमाओं के पार वस्तुओं का सुचारू प्रवाह सुनिश्चित करना था।
  • अधिकांश बिक्री कर अब वस्तु एवं सेवा कर (GST) के अंतर्गत समाहित हो गए हैं।
  • सेवा कर एक अप्रत्यक्ष कर था जो केंद्र सरकार द्वारा देश के भीतर प्रदान की गई विशिष्ट सेवाओं के लेनदेन पर लगाया जाता था।
  • इसे सेवा प्रदाताओं (Service Providers) द्वारा संग्रहित किया जाता था और अंततः केंद्र सरकार के पास जमा किया जाता था।
  • अब इसे वस्तु एवं सेवा कर (GST) के अंतर्गत समाहित कर दिया गया है।
  • वस्तु एवं सेवा कर (GST) अप्रत्यक्ष कर का एक रूप है जो भारत में घरेलू उपभोग के लिए बिक्री की जाने वाली अधिकांश वस्तुओं और सेवाओं पर लगाया जाता है।
  • यह मूल्य वर्धित कर (VAT) के सिद्धांत पर आधारित है और पूरे भारत में लागू है।
  • इसका भुगतान उपभोक्ताओं द्वारा किया जाता है, लेकिन इसे वस्तुओं और सेवाओं को विक्रेता व्यवसायों द्वारा सरकार को भेजा जाता है।
  • वस्तु एवं सेवा कर (GST) 1 जुलाई 2017 को पूरे देश में लागू किया गया था।
  • इसने विभिन्न अप्रत्यक्ष करों को समाहित कर लिया है और उनकी जगह ले ली है जो पहले केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा लगाए जाते थे।

वस्तु एवं सेवा कर (GST) पर हमारा विस्तृत लेख पढ़ें।

  • प्रवेश कर एक ऐसा कर है जो किसी राज्य या स्थानीय क्षेत्राधिकार से दूसरे राज्य या क्षेत्राधिकार में उपभोग, उपयोग या बिक्री के लिए प्रवेश करने वाली वस्तुओं पर लगाया जाता है।
  • चुंगी एक स्थानीय कर है जो वस्तुओं पर तब लगाया जाता है जब वे उपभोग, उपयोग या बिक्री के लिए नगरपालिका क्षेत्र में प्रवेश करती है।
  • टोल टैक्स कुछ सड़कों, पुलों, सुरंगों या अन्य बुनियादी ढांचे के उपयोग के लिए लगाया जाने वाला शुल्क है।
  • यह कर (Tax) आम तौर पर बुनियादी ढांचे के निर्माण, रखरखाव और संचालन को निधि देने में मदद करने के लिए एकत्र किया जाता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि इसके उपयोग से लाभान्वित होने वाले लोग इसकी लागत में योगदान करते हैं।
  • भारत में, स्टांप ड्यूटी एक कर है जो राज्य सरकार द्वारा संपत्ति लेन-देन से संबंधित विभिन्न कानूनी दस्तावेजों पर लगाया जाता है।
  • यह कर उस भौतिक स्टांप के नाम पर लिया जाता है जो दर्शाता है कि शुल्क का भुगतान कर दिया गया है।
  • संग्रह में सुविधा (Convenience in Collection): प्रत्यक्ष करों की तुलना में, अप्रत्यक्ष करों को संग्रहण करना अपेक्षाकृत आसान है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्हें बिक्री या उपभोग के बिंदु (Point of Sale or Consumption) पर एकत्र किया जाता है, इस प्रकार करदाताओं और सरकार दोनों के लिए प्रशासनिक लागत और अनुपालन बोझ कम हो जाता है।
  • कम कर चोरी (Low Evasion): चूंकि ये कर वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में शामिल होते हैं, इसलिए उपभोक्ता उन्हें भुगतान करने से बच नहीं सकते। इस प्रकार, ये कर चोरी को कम करने में मदद करते हैं, जो प्रत्यक्ष करों के मामले में काफी प्रमुख है।
  • राजस्व स्थिरता (Revenue Stability): इन करों से होने वाला राजस्व प्रत्यक्ष करों की तुलना में आर्थिक उतार-चढ़ाव से कम प्रभावित होता है, जो व्यक्तिगत आय स्तरों और कॉर्पोरेट लाभ पर निर्भर करता है।
  • पारदर्शिता (Transparency): आमतौर पर, इन करों का उल्लेख मूल्य टैग (Price tags) में किया जाता है, जिससे उपभोक्ता यह देख पाते हैं कि वे कितने कर (Tax) का भुगतान कर रहे हैं। यह कराधान प्रणाली में पारदर्शिता को बढ़ावा देता है।
  • नीतिगत उद्देश्यों के लिए उपयोग (Used for Policy Objectives): अप्रत्यक्ष करों का उपयोग सरकारें विभिन्न नीतिगत उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए कर सकती हैं, जैसे हानिकारक वस्तुओं की खपत को हतोत्साहित करना, कुछ उद्योगों को बढ़ावा देना (कर प्रोत्साहन), या पर्यावरण संबंधी चिंताओं को दूर करना (कार्बन कर)।
  • प्रतिगामी प्रकृति (Regressive Nature): प्रत्येक व्यक्ति किसी दिए गए उत्पाद या सेवा के लिए समान मात्रा में अप्रत्यक्ष कर का भुगतान करता है, चाहे उनकी आय का स्तर कुछ भी हो। इस प्रकार, यह कम आय वाले व्यक्तियों को असमान रूप से प्रभावित करता है, जिन्हें अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा कर योग्य वस्तुओं और सेवाओं पर खर्च करना पड़ता है।
  • मुद्रास्फीति प्रभाव (Inflationary Impact) : ये कर प्राय: वस्तुओं और सेवाओं की कीमत में शामिल होते हैं, जिससे उपभोक्ताओं के लिए लागत बढ़ जाती है। इस प्रकार, इन पर मुद्रास्फीति प्रभाव पड़ता है।
  • उपभोक्ताओं की पसंद का विरूपण (Distortion of Consumers’ Choices): ये कुछ वस्तुओं और सेवाओं को अधिक महंगा बनाकर उपभोक्ता व्यवहार को विकृत कर सकते हैं।
  • कैस्केडिंग प्रभाव (Cascading Effect): कुछ मामलों में, अप्रत्यक्ष कर एक कैस्केडिंग प्रभाव को पैदा कर सकते हैं, जहाँ कर पर कर (Taxes on Taxes) लगाया जाता है, जिससे उपभोक्ताओं पर कुल कर का बोझ बढ़ जाता है।
  • वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता पर प्रभाव (Impacts on Global Competitiveness): उच्च अप्रत्यक्ष कर घरेलू रूप से उत्पादित वस्तुओं को अधिक महंगा बना सकते हैं, जिससे अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में उनकी प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित होती है। बदले में, इसका निर्यात पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

अप्रत्यक्ष कर किसी देश की कर प्रणाली का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है, जो राजस्व सृजन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और आर्थिक व्यवहार को प्रभावित करते हैं। राजकोषीय स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण लाभ प्रदान करते हुए, अप्रत्यक्ष कर अनुपालन, आर्थिक विकृति और राजनीतिक व्यवहार्यता से संबंधित चुनौतियों को भी जन्म देते हैं। प्रभावी प्रबंधन और निरंतर सुधार अप्रत्यक्ष कर प्रणाली को उभरते आर्थिक परिदृश्य और सामाजिक आवश्यकताओं के अनुकूल बनाने के लिए आवश्यक हैं।

  • कराधान के संदर्भ में, कैस्केडिंग प्रभाव एक ऐसी स्थिति को संदर्भित करता है जहाँ कर उस राशि पर लगाया जाता है जिसमें पहले से ही एक पिछला कर शामिल होता है।
  • इससे स्नोबॉल प्रभाव (Snowball effect) होता है, जहाँ उत्पादन या वितरण के प्रत्येक चरण में कर का बोझ उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है।
    • उदाहरण के लिए, एक कॉटन शर्ट के उत्पादन पर विचार करें।
      • सबसे पहले, कपास को एक कताई मिल मालिक द्वारा खरीदा जाता है, जो इस पर बिक्री कर का भुगतान किया जाता है।
      • तो, मिल मालिक के लिए क्रय लागत = कपास की कीमत + कपास पर बिक्री कर।
    • कताई मिल मालिक कपास को सूत में संसाधित करता है और इसे एक बुनकर को बेचता है। बुनकर इस पर बिक्री कर का भुगतान करता है।
      • इसलिए, बुनकर के लिए क्रय मूल्य = कपास की कीमत + कपास पर बिक्री कर + कताई करने वाले द्वारा जोड़ा गया मूल्य + पूरे मूल्य पर बिक्री कर।
  • इस प्रकार, उपरोक्त उदाहरण में देखा जा सकता है कि पहले से भुगतान की गई कर राशि भी प्रक्रिया के प्रत्येक चरण में कर के अधीन होती है और अंतिम उत्पाद तक जारी रहती है।
    • इसे कैस्केडिंग प्रभाव कहा जाता है।
  • कराधान के संदर्भ में, मूल्य वर्धित कर (वैट) का सिद्धांत एक उत्पादन श्रृंखला में विभिन्न प्रोसेसरों को उनके इनपुट पर भुगतान किए गए करों की वापसी चुकाकर कैस्केडिंग प्रभाव से बचाना है।
  • वापस चुकाए गए कर को इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) कहा जाता है।
  • उदाहरण के लिए, कताई करने वाले को कपास पर उसके द्वारा भुगतान किया गया बिक्री कर वापस चुकाया जाता है। इसलिए, बुनकर केवल कताई करने वाले द्वारा जोड़े गए मूल्य पर कर का भुगतान करता है।
  • केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर और सीमा शुल्क बोर्ड (CBIC) भारत में अप्रत्यक्ष करों के साथ-साथ सीमा शुल्क के प्रशासन के लिए उत्तरदायी शीर्ष निकाय है।
  • यह वित्त मंत्रालय के तहत राजस्व विभाग का एक हिस्सा है।
  • CBIC को अप्रत्यक्ष करों, जैसे कि वस्तु एवं सेवा कर (GST), केंद्रीय उत्पाद शुल्क, सीमा शुल्क और सेवा कर के संग्रह से संबंधित नीति के निर्माण और कार्यान्वयन का कार्य प्रदान किया गया है।

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