भारत की अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी में सदस्यता प्राप्त करने की आकांक्षा

पाठ्यक्रम: GS2/क्षेत्रीय समूह

संदर्भ

  • अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने भारत के संगठन की पूर्ण सदस्यता हेतु किए गए अनुरोध पर हो रही प्रगति का स्वागत किया।

अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA)

  • स्थापना: 1974 में।
  • संस्थापक सदस्य: ऑस्ट्रिया, बेल्जियम, कनाडा, डेनमार्क, जर्मनी, आयरलैंड, इटली, जापान, लक्ज़मबर्ग, नीदरलैंड, नॉर्वे, स्पेन, स्वीडन, स्विट्ज़रलैंड, तुर्किये, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका।
  • कारण: इसे उस समय स्थापित किया गया जब प्रमुख तेल-निर्यातक देशों ने तेल आपूर्ति में भारी कटौती की, जिससे औद्योगिक देशों में गंभीर आर्थिक व्यवधान उत्पन्न हुआ।
  • अधिदेश: IEA का मूल उद्देश्य तेल आपूर्ति को स्थिर बनाए रखना और भविष्य में संभावित व्यवधानों का पूर्वानुमान लगाकर समय पर रोकथाम करना था।
    • इसने तेल आपात स्थितियों से निपटने हेतु विस्तृत तंत्र विकसित किया और प्रत्येक सदस्य देश के लिए न्यूनतम रणनीतिक तेल भंडार बनाए रखना अनिवार्य किया।
  • सदस्यता: प्रारंभ में सदस्यता केवल OECD देशों तक सीमित थी।
    • वर्तमान में 33 पूर्ण सदस्य हैं, जिनमें हाल ही में कोलंबिया 33वाँ सदस्य बना है।
  • सहयोगी सदस्य: 2015 में IEA ने गैर-OECD देशों को सहयोगी सदस्य बनने का अवसर दिया।
    • सहयोगी सदस्य नीति चर्चाओं और गतिविधियों में भाग लेते हैं, परंतु निर्णय लेने का अधिकार नहीं रखते।
    • भारत 2017 में सहयोगी सदस्य बना। वर्तमान में 13 सहयोगी सदस्य हैं।

आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (OECD)

  • OECD एक अंतर-सरकारी संगठन है जो आर्थिक विकास, नीति समन्वय और वैश्विक सहयोग को प्रोत्साहित करता है।
  • उद्देश्य: “बेहतर जीवन के लिए बेहतर नीतियाँ।”
  • स्थापना: 1961 में, यूरोपीय आर्थिक सहयोग संगठन (OEEC) के उत्तराधिकारी के रूप में।
  • मुख्यालय: पेरिस, फ्रांस।
  • सदस्यता: 38 सदस्य देश (मुख्यतः विकसित अर्थव्यवस्थाएँ)। भारत इसका सदस्य नहीं है।

IEA की भूमिका में परिवर्तन

  • तेल सुरक्षा से परे विस्तार: अब यह केवल तेल आपूर्ति सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि गैस, कोयला, परमाणु और नवीकरणीय ऊर्जा को भी शामिल करता है।
  • जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा संक्रमण: डीकार्बोनाइजेशन, नेट-ज़ीरो मार्ग और स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण इसके केंद्रीय उद्देश्य बन गए हैं।
  • महत्वपूर्ण खनिजों पर ध्यान: IEA ने नवीकरणीय ऊर्जा और विद्युत गतिशीलता से जुड़ी आपूर्ति श्रृंखला जोखिमों को संबोधित करने हेतु ‘क्रिटिकल मिनरल्स प्रोग्राम’ शुरू किया है।
  • उभरती अर्थव्यवस्थाओं का उदय: वैश्विक ऊर्जा परिदृश्य में चीन, भारत और ब्राज़ील जैसे उभरते देशों की भूमिका प्रमुख हो गई है।
  • व्यापक वैश्विक प्रतिनिधित्व: पहले IEA सदस्य वैश्विक ऊर्जा मांग का 60% से अधिक हिस्सा रखते थे, जो घटकर लगभग 40% रह गया। सहयोगी सदस्यों के जुड़ने से अब IEA लगभग 80% वैश्विक ऊर्जा मांग का प्रतिनिधित्व करता है।

भारत की सदस्यता की आकांक्षा

  • पूर्ण सदस्यता का प्रयास: भारत ने 2023 में IEA की पूर्ण सदस्यता हेतु औपचारिक अनुरोध प्रस्तुत किया और हाल के वर्षों में इस उद्देश्य को सक्रिय रूप से आगे बढ़ाया है।
  • निर्णय-निर्माण भूमिका की इच्छा: भारत का मुख्य उद्देश्य IEA की निर्णय-निर्माण प्रक्रियाओं में भाग लेना है, क्योंकि यह एजेंसी वैश्विक ऊर्जा नीतियों, ऊर्जा संक्रमण मार्गों और जलवायु-संबंधी रणनीतियों को आकार देने में अत्यधिक प्रभावशाली हो गई है।
  • ज्ञान और नीति मंच के रूप में IEA: IEA स्वच्छ ऊर्जा तकनीकों, ऊर्जा संक्रमण और जलवायु परिवर्तन पर एक प्रमुख वैश्विक ज्ञान मंच बन चुका है और यह सबसे विश्वसनीय एवं व्यापक वैश्विक ऊर्जा डेटाबेस बनाए रखता है।

आगे की राह

  • भारत को पूर्ण सदस्यता प्रदान करने के लिए IEA के संस्थापक ढाँचे में संशोधन आवश्यक होगा, क्योंकि अब तक सदस्यता केवल OECD देशों तक सीमित रही है।
  • भारत ने OECD सदस्यता लेने की कोई इच्छा नहीं दिखाई है, जिससे पात्रता मानदंडों में बदलाव या कानूनी संशोधन आवश्यक होगा।
  • IEA ने भारत के प्रयास का दृढ़ समर्थन किया है, इसे विश्व का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश और भविष्य में वैश्विक ऊर्जा मांग वृद्धि का प्रमुख चालक मानते हुए।
  • हाल के वर्षों में IEA की भारत के साथ सहभागिता उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है और भारत-केंद्रित रिपोर्टों के माध्यम से यह अधिक गंभीर हुई है।

स्रोत: IE

 

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