पाठ्यक्रम: GS2/स्वास्थ्य
संदर्भ
- लैंसेट आयोग की नई रिपोर्ट भारत में सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (UHC) हेतु अधिकार-आधारित, नागरिक-केंद्रित रोडमैप प्रस्तुत करती है, जो विकसित भारत 2047 के दृष्टिकोण के अनुरूप है।
परिचय
- रिपोर्ट में वर्णित सुधार समुदाय की भागीदारी, पारदर्शिता और समानता को बढ़ावा देते हैं — जो UHC के प्रमुख सिद्धांत हैं — और इनका उद्देश्य सभी के लिए उच्च गुणवत्ता वाली, सुलभ एवं किफायती स्वास्थ्य सेवाएँ सुनिश्चित करना है।
- यह भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को सुदृढ़ करने की तात्कालिक आवश्यकता पर बल देती है, जिसमें प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक स्तरों पर सेवाओं का एकीकरण किया जाए।
आयोग के मार्गदर्शक सिद्धांत
- एक सुविधा-केंद्रित, प्रतिक्रियात्मक और विखंडित रोग-विशिष्ट प्रणाली से एक व्यापक, समन्वित, नागरिक-केंद्रित स्वास्थ्य प्रणाली की ओर संक्रमण।
- नागरिकों को सेवाओं के निष्क्रिय प्राप्तकर्ता से अधिकारयुक्त सक्रिय भागीदारों में परिवर्तित करना, जो स्वास्थ्य प्रणाली में संलग्न हों।
- केवल पेशेवर योग्यताओं को महत्व देने से हटकर प्रदाता की दक्षताओं, मूल्यों और प्रेरणाओं पर बल देना तथा अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्ताओं एवं भारतीय चिकित्सा पद्धतियों (जैसे आयुर्वेद, योग, यूनानी, सिद्ध, और होम्योपैथी) के चिकित्सकों को सशक्त बनाना।
- नवोन्मेषी प्रौद्योगिकी की शक्ति का जिम्मेदारीपूर्वक और नैतिक रूप से उपयोग करना, ताकि पुनर्कल्पित स्वास्थ्य प्रणाली नागरिक-केंद्रित देखभाल प्रदान कर सके।
- अधिकारों और स्वास्थ्य समानता को सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज का मूल मूल्य मानना तथा असमानताओं में कमी को UHC लक्ष्यों की प्रगति का मापदंड बनाना।
सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज क्या है?
- इसका अर्थ है कि सभी लोगों को गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं की संपूर्ण श्रृंखला तक बिना आर्थिक कठिनाई के पहुँच प्राप्त हो।
- UHC के प्रमुख घटक:
- सेवाओं तक पहुँच : प्रत्येक व्यक्ति को आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएँ समय पर प्राप्त होनी चाहिए।
- गुणवत्तापूर्ण सेवाएँ : प्रदत्त देखभाल प्रभावी, सुरक्षित और उच्च गुणवत्ता वाली होनी चाहिए।
- आर्थिक संरक्षण : व्यक्तियों को चिकित्सा व्ययों के कारण वित्तीय कठिनाइयों का सामना न करना पड़े।
- UHC सार्वभौमिक मानवाधिकार पर आधारित है, जिसे अंतरराष्ट्रीय संधियों और अल्मा-अता घोषणा (1978) में मान्यता दी गई थी, जिसमें व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल को प्राथमिकता दी गई थी।
भारतीय संदर्भ में UHC की आवश्यकता
- सार्वभौमिक स्वास्थ्य देखभाल के प्रति ऐतिहासिक प्रतिबद्धता: भोर समिति (1943–46) ने बीमा-आधारित UHC की तुलना में सार्वभौमिक स्वास्थ्य देखभाल को प्राथमिकता दी थी।
- स्वतंत्रता के बाद नीति विकास: राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 1983 ने “सभी के लिए स्वास्थ्य” के लक्ष्य को मान्यता दी और प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल तथा संसाधनों के न्यायसंगत वितरण पर बल दिया।
- बीमा-आधारित UHC की ओर झुकाव: राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना (RSBY) 2008 और आयुष्मान भारत–PMJAY ने UHC को संस्थागत रूप दिया, किंतु बीमा-प्रधान दृष्टिकोण को सुदृढ़ किया।
- कमज़ोर सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली और निजी निर्भरता में वृद्धि: प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल के अपर्याप्त वित्तपोषण ने सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता को प्रभावित किया है, जिससे अवसंरचना और कार्यबल की कमी बनी हुई है।
- राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (NSS) के आँकड़े दर्शाते हैं कि गरीबों की निजी स्वास्थ्य सेवाओं पर निर्भरता बढ़ रही है, आउट-ऑफ-पॉकेट व्यय/व्यक्तिगत स्वास्थ्य व्यय (OOPE) में वृद्धि हो रही है और घरेलू ऋणग्रस्तता बढ़ रही है।
- कोविड-19 के बाद की समझ: महामारी ने बीमा-आधारित पहुँच में असमानताओं, असंगठित श्रमिकों और प्रवासियों के बहिष्कार तथा अस्पताल-केंद्रित मॉडल की कमजोरी को उजागर किया।
UHC का संवैधानिक आधार
- राज्य के नीति निदेशक तत्व (Part IV) स्वास्थ्य के अधिकार का आधार प्रदान करते हैं।
- अनुच्छेद 39 (e): राज्य को श्रमिकों के स्वास्थ्य की सुरक्षा सुनिश्चित करने का निर्देश देता है।
- अनुच्छेद 42: न्यायसंगत और मानवीय कार्य परिस्थितियों तथा मातृत्व राहत पर बल देता है।
- अनुच्छेद 47: राज्य पर पोषण स्तर और जीवन स्तर को बढ़ाने तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार करने का दायित्व डालता है।
- अनुच्छेद 243G: पंचायतों और नगरपालिकाओं को सार्वजनिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ करने का अधिकार देता है।
भारत में UHC अपनाने की चुनौतियाँ
- संसाधन सीमाएँ : भारत में स्वास्थ्य क्षेत्र में वित्तीय सीमाएँ हैं; सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय अन्य देशों की तुलना में कम है, जिससे व्यापक सेवाएँ प्रदान करना कठिन होता है।
- सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय लगभग 2.1% GDP है, जो राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के 2.5% लक्ष्य से कम है।
- अवसंरचना की कमी : ग्रामीण क्षेत्रों सहित कई स्थानों पर पर्याप्त अस्पताल, क्लिनिक और प्रशिक्षित कर्मियों की कमी है, जिससे सेवाओं तक पहुँच कठिन हो जाती है।
- स्वास्थ्य कार्यबल की कमी : ग्रामीण क्षेत्रों में विशेष रूप से स्वास्थ्य पेशेवरों की कमी है, जिससे पहुँच और गुणवत्ता में असमानताएँ उत्पन्न होती हैं।
- विखंडित स्वास्थ्य प्रणाली : भारत की स्वास्थ्य प्रणाली सार्वजनिक एवं निजी प्रदाताओं का मिश्रण है, जिससे गुणवत्ता और उपलब्धता में असंगतियाँ उत्पन्न होती हैं।
- साथ ही, स्वास्थ्य राज्य का विषय है, जबकि वित्तपोषण और प्रमुख योजनाएँ केंद्र द्वारा संचालित होती हैं, जिससे परिणाम असमान रहते हैं।

Source: HT
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