पाठ्यक्रम: GS2/अंतर्राष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
- अमेरिका द्वारा अपनाई गई वर्तमान पारस्परिक टैरिफ नीतियाँ और संरक्षणवाद, भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC) जैसे बहु-राज्यीय, बहु-आयामी परिवहन एवं व्यापार गलियारे के विकास के लिए एक बुरा संकेत है।
परिचय
- लगभग सभी भागीदार देशों के लिए, अमेरिका को छोड़कर, IMEC किसी भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का प्रतिनिधित्व नहीं करता।
- इसके बजाय, यह वैश्विक व्यापार को भविष्य के लिए सुरक्षित करने हेतु आर्थिक बीमा के रूप में कार्य करता है, विशेषतः उस युग में जो आपूर्ति-श्रृंखला आघातों, भू-राजनीतिक विखंडन और जलवायु संकट से प्रभावित है।
भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC)
- पृष्ठभूमि: IMEC एक प्रस्तावित 4,800 किमी लंबा मार्ग है जिसे 2023 में G20 शिखर सम्मेलन के दौरान घोषित किया गया।
- सदस्य: भारत, यूरोपीय संघ, फ्रांस, जर्मनी, इटली, सऊदी अरब, यूएई और अमेरिका।
- उद्देश्य: एशिया, यूरोप और मध्य पूर्व का एकीकरण।
- संरचना:
- पूर्वी गलियारा: भारत को पश्चिम एशिया/मध्य पूर्व से जोड़ता है।
- उत्तरी गलियारा: पश्चिम एशिया/मध्य पूर्व को यूरोप से जोड़ता है।

IMEC में शामिल बंदरगाह
- भारत: मुंद्रा (गुजरात), कांडला (गुजरात), और जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट (नवी मुंबई)।
- यूरोप: पिराएस (ग्रीस), मेसिना (दक्षिणी इटली), और मार्सिले (फ्रांस)।
- मध्य पूर्व: फुजैरा, जेबेल अली, और अबू धाबी (यूएई), दमाम एवं रस अल खैर (सऊदी अरब)।
- इज़राइल: हाइफ़ा पोर्ट।
- रेलवे लाइन: रेलवे लाइन यूएई के फुजैरा पोर्ट को इज़राइल के हाइफ़ा पोर्ट से जोड़ेगी, जो सऊदी अरब (गुवैफात और हरध) और जॉर्डन से होकर गुज़रेगी।
भारत के लिए IMEC का महत्व और इसके अवरोधक बिंदु
- स्वेज़ नहर अवरोध (2021): एक विशाल कंटेनर जहाज द्वारा अवरुद्ध होने से कई जहाज फंस गए। इस व्यवधान ने वैश्विक व्यापार का लगभग 12% प्रभावित किया।
- लाल सागर संकट (2023-24): हूथियों द्वारा वाणिज्यिक जहाजों पर हमलों के कारण उत्पन्न हुआ, जिससे अत्यधिक केंद्रित व्यापार मार्गों की संवेदनशीलता उजागर हुई।
- भारत के लगभग एक चौथाई कार्गो को विलंब का सामना करना पड़ा।
- जहाजों को केप ऑफ गुड होप के चारों ओर मोड़ना पड़ा, जिससे लगभग 3,500 नौटिकल मील की दूरी बढ़ गई, एक सप्ताह से अधिक का अतिरिक्त समय लगा और प्रति यात्रा ईंधन लागत लगभग एक मिलियन डॉलर तक बढ़ गई।
- भारत-ईयू व्यापार पर प्रभाव: भारत-ईयू व्यापार का अधिकांश भाग लाल सागर-स्वेज़ नहर मार्ग पर केंद्रित है।
- 2023–24 की अंतिम तिमाही में भारतीय निर्यातकों ने शिपमेंट रोक दिए, जिससे व्यापार में गिरावट आई।
- ईयू भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, जो कुल माल व्यापार का 12% से अधिक हिस्सा रखता है।
- IMEC का उत्तर: यह वर्तमान समुद्री मार्गों जैसे स्वेज़ नहर या रूस से होकर जाने वाले उत्तर-दक्षिण गलियारे को प्रतिस्थापित करने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें पूरक करने के लिए बनाया गया है।
- अतः भारत के लिए, IMEC किसी भू-राजनीतिक विवाद का प्रतीक नहीं, बल्कि व्यापार मार्गों के विविधीकरण के माध्यम से आर्थिक जोखिम प्रबंधन की एक रणनीति है।
भारत के लिए IMEC का महत्व (Significance of IMEC for India)
- आर्थिक विकास: एशिया, पश्चिम एशिया, मध्य पूर्व और यूरोप को जोड़कर क्षेत्रीय आर्थिक विकास को बढ़ावा देना।
- भारत की कनेक्टिविट और व्यापार पहुँच बढ़ाना: भारत को यूरोप से जोड़ने वाला तीव्र, सुरक्षित मार्ग प्रदान करता है।
- स्वेज़ नहर पर निर्भरता कम करता है, शिपिंग समय को 40% तक और लागत को 20–30% तक घटाता है।
- रणनीतिक साझेदारी मजबूत करना: अमेरिका, ईयू, सऊदी अरब, यूएई और इज़राइल के साथ भारत के संबंध गहरे करता है।
- “एक्ट वेस्ट पॉलिसी” के अनुरूप: पारंपरिक और नए क्षेत्रीय साझेदारों के मध्य सहयोग को प्रोत्साहित करता है।
- IMEC एक त्रिकोणीय आर्थिक संरचना का निर्माण करता है: भारत को विनिर्माण एवं सेवाओं के केंद्र के रूप में; खाड़ी क्षेत्र को लॉजिस्टिक्स, ऊर्जा तथा पूंजी के मंच के रूप में; और यूरोप को प्रौद्योगिकी एवं उपभोग के केंद्र के रूप में स्थापित करता है।
- ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ावा: ऊर्जा पाइपलाइन और ग्रीन हाइड्रोजन नेटवर्क को जोड़कर भारत, खाड़ी एवं यूरोप को एकीकृत करता है।
- नवीकरणीय ऊर्जा सहयोग: ऊर्जा आयात का विविधीकरण और स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्रों में सहयोग।
- पर्यावरण-अनुकूल अवसंरचना: पर्यावरणीय रूप से सतत अवसंरचना पर बल।
चिंताएँ
- क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों ने अन्य साझेदारों को इस परियोजना में निवेश करने के प्रति अनिच्छुक बना दिया है।
- मध्य पूर्व की अस्थिरता ने इस परियोजना को गंभीर आघात पहुँचाया है; परियोजना में विलंब भारत की क्षेत्रीय आकांक्षाओं पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।
- राजनीतिक सहमति का अभाव: यद्यपि IMEC का समझौता 2023 के G20 शिखर सम्मेलन के दौरान हस्ताक्षरित हुआ था, यह कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है और केवल स्वैच्छिक भागीदारी पर आधारित है।
- सदस्यों की भिन्न प्राथमिकताएँ समन्वय और क्रियान्वयन को धीमा करती हैं।
- आर्थिक एवं वित्तीय व्यवहार्यता: अनुमानित परियोजना लागत अत्यधिक है, जिसमें बंदरगाहों, रेलमार्गों, पाइपलाइनों और बहु-क्षेत्रीय डिजिटल अवसंरचना का समावेश है।
- वित्तपोषण तंत्र को लेकर अस्पष्टता बनी हुई है कि यह बहुपक्षीय होगा, सार्वजनिक-निजी भागीदारी पर आधारित होगा या राज्य-निधिकृत।
- अवसंरचना की कमी एवं तकनीकी चुनौतियाँ: पश्चिम एशियाई देशों में विशेषकर सीमा-पार रेलवे संपर्क में महत्वपूर्ण अवसंरचना घाटे हैं।
- विभिन्न रेलवे गेज, मानकों और सीमा शुल्क प्रक्रियाओं का एकीकरण अब तक अनसुलझा है।
आगे की राह
- IMEC उन क्षेत्रों में फैला है जहाँ वित्तीय क्षमता और क्रेडिट प्रोफ़ाइल असमान हैं। पारंपरिक सार्वजनिक वित्तपोषण या केवल सार्वजनिक–निजी भागीदारी पर्याप्त नहीं होगी।
- IMEC को एक पोर्टफोलियो दृष्टिकोण की आवश्यकता है जिसमें सार्वजनिक निवेश, बहुपक्षीय गारंटी, संप्रभु संपत्ति कोष और निजी निवेश शामिल हों, ताकि पूंजी लागत कम हो एवं दीर्घकालिक संस्थागत निवेश आकर्षित किया जा सके।
Source: ORF
Previous article
संक्षिप्त समाचार 19-01-2026