पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) भारतीय अर्थव्यवस्था में ज्ञान तथा ज्ञान-उत्पादों के योगदान के मापन हेतु रूपरेखा संबंधी आधार-पत्र पर सुझाव एवं अभिमत आमंत्रित कर रहा है।
- MoSPI ने रतन पी. वाटल की अध्यक्षता में “ज्ञान प्रणाली समिति” का गठन किया है।
ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था क्या है?
- ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था वह व्यवस्था है जिसमें मानव पूंजी — जैसे कौशल, सूचना, नवाचार तथा बौद्धिक संपदा — आर्थिक विकास के प्रमुख प्रेरक तत्व होते हैं, न कि केवल भौतिक संसाधन या प्राकृतिक संपदा।
- यह दो प्रकार के ज्ञान पर आधारित होती है:
- संहिताबद्ध ज्ञान : ऐसा ज्ञान जो प्रलेखित एवं हस्तांतरणीय हो (जैसे “क्या” और “क्यों” का ज्ञान), उदाहरणार्थ — पेटेंट, सॉफ्टवेयर, शैक्षणिक अनुसंधान।
- अंतर्निहित ज्ञान : ऐसा अनुभव-आधारित ज्ञान जिसे हस्तांतरित करना अपेक्षाकृत कठिन हो (जैसे “कैसे” और “किसके साथ” का ज्ञान), उदाहरणार्थ — पारंपरिक शिल्प कौशल, पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियाँ।
- प्रमुख OECD अर्थव्यवस्थाओं में ज्ञान-आधारित गतिविधियाँ सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में 50% से अधिक योगदान देती हैं।
- भारत का सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र, स्टार्ट-अप पारिस्थितिकी तंत्र, औषधीय अनुसंधान एवं विकास (R&D), तथा पारंपरिक ज्ञान प्रणालियाँ भी इसी का हिस्सा हैं, किंतु ये अभी तक मानक राष्ट्रीय लेखा प्रणालियों में पर्याप्त रूप से परिलक्षित नहीं होतीं।
इस रूपरेखा की आवश्यकता क्यों है?
- पारंपरिक पद्धतियों की सीमाएँ: पारंपरिक GDP आकलन पद्धतियाँ मुख्यतः विनिर्माण, कृषि, निर्माण तथा भौतिक अवसंरचना जैसी मूर्त आर्थिक गतिविधियों के मूल्य को मापती हैं।
- वर्तमान सांख्यिकीय प्रणालियाँ ज्ञान-आधारित गतिविधियों से उत्पन्न मूल्य को पर्याप्त रूप से अभिव्यक्त नहीं कर पाती हैं।
- सकल घरेलू ज्ञान उत्पाद : GDKP, GDP का एक पूरक सूचकांक है, जो किसी देश में ज्ञान के उत्पादन एवं उपयोग के आर्थिक मूल्य का मापन करता है।
- यह अर्थव्यवस्था में ज्ञान के चार आयामों को समाहित करता है:
- ज्ञान वस्तुएँ : मूर्त (जैसे पुस्तकें, कंप्यूटर, जर्नल) तथा अमूर्त (जैसे ऑनलाइन पाठ्यक्रम, पेटेंट, प्रशिक्षण कार्यक्रम)।
- ज्ञान उत्पादक: विश्वविद्यालय, अनुसंधान एवं विकास प्रयोगशालाएँ, थिंक टैंक तथा नवप्रवर्तक।
- ज्ञान वितरक : मीडिया, डिजिटल मंच तथा प्रकाशन संस्थान।
- ज्ञान उपयोगकर्ता : उपभोक्ता, उद्योग तथा सरकारें।
आधार-पत्र की प्रमुख विशेषताएँ
- आधुनिक ज्ञान उत्पाद: इसमें सॉफ्टवेयर, एल्गोरिद्म, डेटाबेस, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) प्रणालियाँ तथा डिजिटल सामग्री को आधुनिक ज्ञान उत्पादों के रूप में चिह्नित किया गया है।
- इसके अंतर्गत पेटेंट, कॉपीराइट, ट्रेडमार्क तथा औद्योगिक अभिकल्पों को बौद्धिक संपदा उत्पादों के रूप में सम्मिलित किया गया है।
- वैज्ञानिक प्रकाशन, तकनीकी नवाचार तथा अनुसंधान निष्पत्तियों को भी ज्ञान उत्पाद माना गया है।
- मूल्यवान ज्ञान परिसंपत्तियाँ: पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों, स्वदेशी औषधीय पद्धतियों तथा भौगोलिक संकेतक (GI) टैग युक्त उत्पादों को आर्थिक दृष्टि से मूल्यवान ज्ञान परिसंपत्तियों के रूप में मान्यता दी गई है।
- इसमें आयुर्वेद, पारंपरिक चिकित्सा, जनजातीय ज्ञान, स्थानीय कृषि तकनीकें तथा भौगोलिक संकेतक (GI) जैसी प्रणालियों को विशेष रूप से रेखांकित किया गया है।
- प्रभावी अनुसंधान एवं विकास पूंजी भंडार: इस आधार-पत्र के सबसे महत्वपूर्ण प्रस्तावों में से एक “प्रभावी अनुसंधान एवं विकास पूंजी भंडार” (Effective R&D Capital Stock) की अवधारणा है।
- इस रूपरेखा में अनुसंधान एवं विकास पर होने वाले व्यय को भौतिक अवसंरचना में निवेश के समान पूंजी निर्माण के रूप में मानने का प्रस्ताव किया गया है।
- मूल्यांकन रूपरेखा: यह राष्ट्रीय लेखा प्रणालियों में ज्ञान उत्पादों के समावेशन हेतु एक व्यापक मूल्यांकन रूपरेखा विकसित करने का प्रयास करती है।
भारत के लिए यह क्यों महत्त्वपूर्ण है?
- भारत वर्ष 2034 तक 10 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था तथा वर्ष 2047 तक “विकसित भारत” के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर है, और ये दोनों आकांक्षाएँ मूलतः ज्ञान-आधारित विकास पर निर्भर हैं।
- भारत की जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend), अर्थात् विश्व की सबसे बड़ी कार्यशील आयु वर्ग की जनसंख्या, केवल जनसंख्या संख्या के आधार पर नहीं, बल्कि ज्ञान एवं कौशल के माध्यम से ही वास्तविक आर्थिक मूल्य में परिवर्तित की जा सकती है।
- सूचना प्रौद्योगिकी सेवाएँ, औषधि उद्योग, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) तथा स्टार्ट-अप जैसे क्षेत्र पहले से ही आर्थिक विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं, किंतु राष्ट्रीय लेखा प्रणालियों में इनका समुचित आकलन नहीं हो पा रहा है।
- भारत की व्यापक पारंपरिक ज्ञान विरासत — जैसे आयुर्वेद, स्वदेशी बीज प्रजातियाँ, हस्तशिल्प परंपराएँ तथा लोक-प्रौद्योगिकियाँ — अत्यधिक आर्थिक महत्त्व रखती हैं, किंतु वर्तमान में इनका मूल्यांकन पूर्णतः अनुपस्थित है।
- ज्ञान अर्थव्यवस्था के वास्तविक आकार एवं संरचना की सही समझ अनुसंधान एवं विकास (R&D) व्यय, बौद्धिक संपदा (IP) संरक्षण, शिक्षा निवेश तथा डिजिटल अवसंरचना संबंधी नीतियों के निर्माण को अधिक प्रभावी बना सकती है।
रूपरेखा द्वारा चिन्हित चुनौतियाँ
- वैश्विक मानकों का अभाव: वर्तमान में ज्ञान अर्थव्यवस्थाओं के योगदान के मापन हेतु कोई सार्वभौमिक रूप से स्वीकृत अंतर्राष्ट्रीय रूपरेखा उपलब्ध नहीं है।
- आँकड़ों की कमी: यह रूपरेखा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के उपयोग, नवाचार के प्रसार, डिजिटल परिसंपत्तियों तथा अनौपचारिक नवाचार प्रणालियों से संबंधित प्रमुख आँकड़ा-घाटों (Data Gaps) की पहचान करती है।
- ज्ञान-आधारित आर्थिक गतिविधियों से संबंधित विश्वसनीय सांख्यिकीय आँकड़े अभी भी अनेक क्षेत्रों में सीमित हैं।
- मूल्यांकन में कठिनाई: अमूर्त परिसंपत्तियों का मूल्यांकन करना कठिन होता है, क्योंकि प्रायः उनका कोई स्पष्ट बाजार मूल्य उपलब्ध नहीं होता।
- ज्ञान का तीव्र अप्रचलन: यह रूपरेखा स्वीकार करती है कि तीव्र तकनीकी परिवर्तन के कारण विद्यमान ज्ञान उत्पादों का आर्थिक मूल्य शीघ्रता से कम हो सकता है।
- प्रसार प्रभावों के मापन की चुनौती: आधार-पत्र के अनुसार नवाचार प्रायः अप्रत्यक्ष रूप से असंबद्ध क्षेत्रों की उत्पादकता में वृद्धि करते हैं, जिससे इन प्रसार प्रभावों का सांख्यिकीय रूप से परिमाणीकरण करना कठिन हो जाता है।
निष्कर्ष
- MoSPI की यह रूपरेखा आर्थिक चिंतन में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन को दर्शाती है, जिसमें ज्ञान, नवाचार तथा अमूर्त परिसंपत्तियों को आर्थिक विकास के प्रमुख प्रेरक तत्वों के रूप में मान्यता प्रदान की गई है।
- यदि इस रूपरेखा को सफलतापूर्वक लागू किया जाता है, तो यह नवाचार-आधारित विकास के मापन में भारत की क्षमता को उल्लेखनीय रूप से सुदृढ़ कर सकती है तथा भारत को एक वैश्विक ज्ञान अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण सहयोग प्रदान कर सकती है।
स्रोत: AIR
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