भूराजनीतिक आघातों के बीच कृषि-खाद्य निगमों के लिए अप्रत्याशित लाभ 

पाठ्यक्रम: GS3/ अर्थव्यवस्था/कृषि, वैश्वीकरण और खाद्य सुरक्षा

संदर्भ

  • आईपीईएस-फूड की रिपोर्ट “द न्यू जियोपॉलिटिक्स ऑफ फूड” यह उजागर करती है कि कैसे भू-राजनीतिक व्यवधानों ने बड़े कृषि-खाद्य निगमों को असाधारण लाभ अर्जित करने में सक्षम बनाया है, जबकि विश्वभर में भूख, खाद्य मुद्रास्फीति और पर्यावरणीय क्षरण को और अधिक गंभीर बना दिया है।

रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष

  • संकटों का लाभ उठाकर निगमों ने लाभ बढ़ाया: रिपोर्ट का तर्क है कि कई कृषि-खाद्य निगमों ने वास्तविक उत्पादन लागत से अधिक कीमतें बढ़ाईं।
  • 2020 के बाद खाद्य मुद्रास्फीति ने निगमों को लाभ मार्जिन बढ़ाने के अवसर दिए।
  • खाद्य बाजारों में सीमित प्रतिस्पर्धा ने प्रमुख कंपनियों को मूल्य निर्धारण की शक्ति प्रदान की।
  • कॉर्पोरेट शक्ति का संकेन्द्रण: 2008 से अब तक कई विलयों और अधिग्रहणों ने प्रमुख बीज और कृषि-रसायन कंपनियों की संख्या छह से घटाकर चार कर दी है।
  • कई कंपनियों ने कथित तौर पर उर्वरक की कीमतें वास्तविक उत्पादन लागत से अधिक बढ़ाईं और अधिक लाभ अर्जित किया।

अत्यधिक कॉर्पोरेट नियंत्रण से जुड़ी चिंताएँ

  • खाद्य संप्रभुता के लिए खतरा: बहुराष्ट्रीय निगमों पर निर्भरता के कारण देश का अपने घरेलू खाद्य तंत्र पर नियंत्रण समाप्त हो सकता हैं।
  • मूल्य हेरफेर: अत्यधिक संकेन्द्रित बाजार संकटों के दौरान अत्यधिक मूल्य निर्धारण और मुनाफाखोरी की संभावना बढ़ाते हैं।
  • छोटे किसानों का कमजोर होना: बड़ी कंपनियाँ प्रायः आपूर्ति श्रृंखलाओं पर प्रभुत्वशाली रहती हैं, जिससे छोटे उत्पादकों की सौदेबाजी शक्ति सीमित हो जाती है।
  • वैश्विक झटकों के प्रति संवेदनशीलता: वैश्विक व्यापार पर अत्यधिक निर्भरता देशों को युद्धों, प्रतिबंधों, शिपिंग व्यवधानों और वस्तु मूल्य अस्थिरता के प्रति उजागर करती है।

विकासशील देशों पर प्रभाव

  • खाद्य आयात पर निर्भरता: 2025 में वैश्विक खाद्य आयात बिल लगभग 2.2 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया, जिसमें सबसे तीव्र वृद्धि अल्पविकसित देशों और खाद्य आयातक विकासशील देशों में हुई।
  • खाद्य मुद्रास्फीति: निम्न-आय वाले देशों ने विकसित देशों की तुलना में अधिक खाद्य मुद्रास्फीति का अनुभव किया क्योंकि गरीब देशों की खाद्य सब्सिडी और मूल्य स्थिरीकरण की वित्तीय क्षमता सीमित है।
  • ग्रामीण गरीबी और असमानता: छोटे और सीमांत किसान बढ़ती इनपुट लागत, सीमित सौदेबाजी शक्ति एवं अस्थिर आय का सामना करते रहे, जिससे ग्रामीण संकट और असमानता अधिक गंभीर हुई।
  • भारत के लिए महत्व: भारत में सार्वजनिक खरीद और बफर स्टॉक प्रणाली ने पूर्ववर्ती वैश्विक खाद्य संकटों के दौरान घरेलू खाद्य कीमतों को स्थिर करने में सहायता की।
  • भारतीय खाद्य निगम और सार्वजनिक वितरण प्रणाली जैसी संस्थाओं ने सुनिश्चित किया कि खाद्यान्न बड़ी आबादी तक सुलभ रहे।

आगे की राह

  • सरकारों को अधिक सार्वजनिक निवेश, बेहतर सिंचाई और भंडारण अवसंरचना, विविधीकृत फसल प्रणाली एवं सुदृढ़ किसान समर्थन तंत्र के माध्यम से घरेलू कृषि को सुदृढ़ करना चाहिए।
  • देशों को सार्वजनिक खाद्य भंडार, बफर स्टॉक प्रणाली, विपणन बोर्ड और आपूर्ति प्रबंधन तंत्र को पुनर्जीवित करना चाहिए ताकि वैश्विक संकटों के दौरान खाद्य कीमतों को स्थिर किया जा सके।
  • सरकारों को प्रतिस्पर्धा कानूनों और एंटी-मोनोपॉली विनियमों को सुदृढ़ करना चाहिए ताकि कृषि-खाद्य क्षेत्रों में बाजार शक्ति का अत्यधिक संकेन्द्रण रोका जा सके।
  • सतत कृषि को कृषि-पर्यावरणीय और जलवायु-लचीली खेती प्रथाओं के माध्यम से बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
  • वैश्विक खाद्य शासन: अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं को खाद्य सुरक्षा, न्यायसंगत कृषि व्यापार, कमजोर देशों के लिए ऋण राहत और समान वैश्विक खाद्य प्रणालियों को प्राथमिकता देनी चाहिए।

Source: DTE

 

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