पाठ्यक्रम: GS2/शासन; GS3/जल संरक्षण
संदर्भ
- केंद्रीय जल आयोग (CWC), जो भारत के 166 जलाशयों और 20 नदी बेसिनों की निगरानी करता है, ने अपने नवीनतम आँकड़ों में जल स्तर में तीव्र गिरावट को चिन्हित किया है।
परिचय
- 166 जलाशयों की कुल जीवित भंडारण क्षमता, जिनकी निगरानी CWC करता है, 183.565 अरब घन मीटर (BCM) है, जो देश की अनुमानित कुल क्षमता 257.812 BCM का लगभग 71.2% है।
- भारत के प्रमुख जलाशयों में जल स्तर कुल क्षमता के 45% से नीचे गिर गया है।
- कई जलाशय गंभीर रूप से निम्न या शून्य स्तर पर पहुँच चुके हैं।
- भारत के अधिकांश 20 नदी बेसिन अब 30% से 60% क्षमता के बीच कार्य कर रहे हैं, केवल कुछ ही इससे ऊपर हैं। बिहार में चंदन बाँध पूरी तरह सूख गया है।
- दक्षिण भारत में सबसे तीव्र गिरावट देखी गई है, जिससे ग्रीष्मकाल के चरम से पहले चिंताएँ बढ़ गई हैं।
- कुल मिलाकर, आँकड़े जल स्तर में व्यापक गिरावट का संकेत देते हैं, जिससे विशेषकर दक्षिण और पश्चिम भारत में ग्रीष्मकालीन जल संकट का जोखिम बढ़ रहा है।
जलाशय
- जलाशय प्राकृतिक या कृत्रिम भंडारण स्थल होते हैं जहाँ भविष्य के उपयोग हेतु जल संचित किया जाता है।
- इनमें नदियाँ, झीलें, हिमनद, भूजल जलभृत, बाँध जलाशय, टैंक और नहरें शामिल हैं।
- ये विभिन्न उद्देश्यों के लिए जल की सतत आपूर्ति सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- क्षमता में गिरावट के कारण:
- गाद जमाव (सिल्टेशन): समय के साथ गाद और मलबे का संचय भंडारण क्षमता को कम करता है।
- कैचमेंट क्षेत्र का क्षरण: वनों की कटाई, खनन और अत्यधिक चराई से मृदा अपरदन और गाद प्रवाह बढ़ता है।
- अतिक्रमण एवं शहरीकरण: जलाशय क्षेत्रों और फीडर चैनलों पर अवैध नियंत्रण प्रभावी भंडारण को घटाता है।
- यूट्रोफिकेशन एवं जलीय खरपतवार: पोषक प्रदूषण से शैवाल और खरपतवार की अत्यधिक वृद्धि होती है, जो स्थान घेरती है।
- जलवायु परिवर्तनशीलता: अनियमित वर्षा और सूखा प्रवाह को कम करते हैं और गाद जमाव को तीव्र करते हैं।
भारत में जल संकट
- भारत में विश्व की जनसंख्या का 18% है, किंतु केवल 4% स्वच्छ जल उपलब्ध है।
- विश्व बैंक ने भारत को सबसे अधिक जल-संकटग्रस्त देशों में से एक बताया है।
- 2040 तक भारत के कई हिस्सों में बढ़ती माँग, खराब प्रबंधन और जलवायु परिवर्तन के कारण गंभीर जल संकट हो सकता है।
- केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) की वार्षिक भूजल गुणवत्ता रिपोर्ट 2024 के अनुसार, भारत में औसत भूजल दोहन स्तर 60.4% है।
जल संकट के प्रमुख कारण
- तीव्र शहरीकरण और औद्योगीकरण से जल निकायों का प्रदूषण बढ़ा है, जिससे वे उपभोग योग्य नहीं रहे।
- अप्रभावी कृषि पद्धतियाँ और अत्यधिक भूजल दोहन ने महत्वपूर्ण जल स्रोतों को समाप्त कर दिया है।
- जलवायु परिवर्तन ने स्थिति को और गंभीर बनाया है, जिससे वर्षा पैटर्न अनियमित हुए और नदियों व जलभृतों का पुनर्भरण प्रभावित हुआ।
- खराब जल प्रबंधन और उचित अवसंरचना की कमी ने संकट को और बढ़ाया है।
भारत में जल शासन
- संवैधानिक प्रावधान
- राज्य विषय: जल मुख्यतः राज्य सूची (सातवीं अनुसूची, प्रविष्टि 17) में है।
- संघ की भूमिका: अंतर-राज्यीय नदियों का विनियमन संघ सूची (प्रविष्टि 56) के अंतर्गत।
- अनुच्छेद 262: संसद अंतर-राज्यीय जल विवादों का निपटारा कर सकती है।
भारत में जल शासन की प्रमुख समस्याएँ
- खंडित संस्थागत ढाँचा: जल शासन राज्य सूची में होने के कारण अत्यधिक खंडित है, जिससे राज्यों के बीच अधिकार क्षेत्रीय संघर्ष होते हैं।
- अभियांत्रिकी-केंद्रित दृष्टिकोण का प्रभुत्व: जल प्रबंधन नीतियाँ ऐतिहासिक रूप से बाँध, नहर और सिंचाई प्रणालियों जैसी बड़े पैमाने की अवसंरचना पर केंद्रित रही हैं।
- यह दृष्टिकोण आपूर्ति वृद्धि को प्राथमिकता देता है, जबकि पारिस्थितिकीय स्थिरता और माँग प्रबंधन की उपेक्षा करता है।
- कृषि नीतियाँ: धान और गेहूँ जैसी जल-प्रधान फसलों को बढ़ावा देने वाली नीतियों ने अत्यधिक भूजल दोहन को जन्म दिया।
- पारिस्थितिकी-आधारित दृष्टिकोण का अभाव: भूमि, जल और पारिस्थितिक तंत्र के अंतर्संबंधों को पर्याप्त रूप से शामिल नहीं किया जाता।
- पर्यावरणीय प्रवाह (e-flows) की उपेक्षा से नदियों और आर्द्रभूमियों का क्षरण होता है।
- कमज़ोर डेटा प्रणाली: देशभर में विश्वसनीय, व्यापक और सुलभ जल डेटा का अभाव है।
- इससे खराब योजना, अप्रभावी आवंटन और अनियंत्रित जल दोहन होता है।
- माँग-पक्षीय प्रबंधन की उपेक्षा: जल नीतियाँ मुख्यतः आपूर्ति बढ़ाने पर केंद्रित हैं, न कि माँग प्रबंधन पर।
- जल उपयोग दक्षता, संरक्षण पद्धतियाँ और यथोचित मूल्य निर्धारण पर सीमित ध्यान।
आगामी चिंताएँ
- भारत का डेटा सेंटर विस्तार जल संकट का सामना कर रहा है, क्योंकि अनुमान है कि इस दशक में भारत के 60–80% डेटा सेंटर उच्च जल तनाव का सामना करेंगे।
- अधिकांश डेटा सेंटर मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद और बेंगलुरु जैसे शहरों में बने हैं, जहाँ पहले से ही जल की कमी है।
सरकारी पहल
- जल शक्ति अभियान (2019): जल संरक्षण और जल-संकटग्रस्त जिलों में भूजल पुनर्भरण पर केंद्रित।
- AMRUT 2.0 (2021): सभी शहरी स्थानीय निकायों/शहरों में लागू, जिससे शहर ‘आत्मनिर्भर’ और ‘जल सुरक्षित’ बन सकें।
- जल निकायों का पुनर्जीवन और हरित क्षेत्र/पार्कों का विकास भी मिशन का हिस्सा।
- अमृत सरोवर मिशन: प्रति ज़िले 75 जल निकायों का विकास और पुनर्जीवन।
- राष्ट्रीय जलभृत मानचित्रण कार्यक्रम (NAQUIM): जलभृतों की पहचान और समझ के लिए, सतत प्रबंधन हेतु।
- अटल भूजल योजना: प्राथमिक क्षेत्रों में भूजल प्रबंधन सुधारने हेतु, जहाँ स्थिति गंभीर और अति-शोषित है।
- जल जीवन मिशन (JJM): प्रत्येक ग्रामीण परिवार को सुनिश्चित पेयजल उपलब्ध कराने हेतु।
- 2019 से सरकार राज्यों के साथ साझेदारी में इसे लागू कर रही है।
- यह पहल नियमित और दीर्घकालिक आधार पर पर्याप्त मात्रा में निर्धारित गुणवत्ता वाला जल नल कनेक्शन के माध्यम से उपलब्ध कराती है।
निष्कर्ष
- खंडित और अभियांत्रिकी-प्रधान दृष्टिकोण से हटकर एक व्यापक शासन ढाँचे की आवश्यकता है।
- जल को साझा और सीमित संसाधन मानते हुए विभिन्न क्षेत्रों में समन्वित प्रबंधन आवश्यक है।
- ध्यान आपूर्ति वृद्धि से हटकर स्थिरता, दक्षता और समानता पर केंद्रित होना चाहिए।
Source: DTE
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