पाठ्यक्रम :GS3/अर्थव्यवस्था
समाचार में
- विगत दो दशकों में भारत के विदेशी व्यापार की संरचना में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया है, जहाँ अब “अदृश्य” तत्व—सेवाओं का निर्यात और प्रवासी भारतीयों द्वारा भेजी गई धनराशि—भौतिक वस्तुओं की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
भारत का सेवा क्षेत्र
- भारत का सेवा क्षेत्र व्यापार, होटल और रेस्तरां, परिवहन, भंडारण एवं संचार, वित्त, बीमा, रियल एस्टेट, व्यावसायिक सेवाएँ, सामुदायिक, सामाजिक और व्यक्तिगत सेवाएँ, तथा निर्माण से जुड़ी सेवाओं जैसी विविध गतिविधियों को शामिल करता है।
- आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25, जिसे वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने प्रस्तुत किया, सेवा क्षेत्र को भारत की अर्थव्यवस्था का ‘पुराना योद्धा’ (Old War Horse) बताते हुए घरेलू और वैश्विक दोनों स्तरों पर विकास का प्रमुख चालक बताया है।
वर्तमान स्थिति
- सेवा क्षेत्र ने GDP वृद्धि में लगातार योगदान दिया है, FY25 में भारत के सकल मूल्य वर्धन (GVA) में इसका योगदान लगभग 55% रहा, जो FY14 में 50.6% था।
- इस क्षेत्र ने विगत एक दशक में महामारी को छोड़कर प्रत्येक वर्ष 6% से अधिक की औसत वृद्धि दर बनाए रखी है, और महामारी के बाद यह वृद्धि 8.3% तक पहुँच गई है।
- यह क्षेत्र लगभग 30% कार्यबल को रोजगार देता है और ‘सर्विसिफिकेशन’ (सेवाओं का औद्योगिक प्रक्रियाओं में एकीकरण) के माध्यम से विनिर्माण को भी बढ़ावा देता है।
- वैश्विक सेवाओं के निर्यात में भारत की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है, और अब यह 4.3% बाजार हिस्सेदारी के साथ विश्व में सातवें स्थान पर है।
- FY25 (अप्रैल–सितंबर) में भारत सेवाओं के निर्यात में वृद्धि के मामले में शीर्ष पाँच देशों में बना रहा।
- FY24 में 5.7% की तुलना में FY25 (अप्रैल–नवंबर) में भारत की सेवाओं के निर्यात में वृद्धि 12.8% रही।
- कंप्यूटर सेवाएँ और व्यावसायिक सेवाएँ भारत के कुल सेवा निर्यात का लगभग 70% हिस्सा रखती हैं।
संभावनाएँ
- भारत ज्ञान-आधारित सेवाओं के कारण अद्वितीय कौशल और प्रतिस्पर्धात्मक लाभ के साथ एक अनोखा उभरता हुआ बाजार है।
- स्मार्ट सिटी, स्वच्छ भारत और डिजिटल इंडिया जैसी सरकारी पहलों से समर्थित सेवा उद्योग एक ऐसा वातावरण बना रहा है जो इस क्षेत्र को सशक्त कर रहा है।
- यह क्षेत्र बहु-ट्रिलियन डॉलर के अवसर प्रशस्त कर सकता है, जो सभी देशों के लिए सहजीवी (symbiotic) विकास को प्रोत्साहित कर सकता है।
चुनौतियाँ और समस्याएँ
- सेवा क्षेत्र को बुनियादी ढाँचे की कमी—विशेष रूप से डिजिटल कनेक्टिविटी और लॉजिस्टिक्स—का सामना करना पड़ता है, जिससे शहरी क्षेत्रों के बाहर विकास सीमित हो जाता है।
- उच्च-मूल्य सेवाओं के लिए विशेष प्रशिक्षण की कमी के कारण कौशल की भारी कमी है, जिससे उत्पादकता और नवाचार प्रभावित होते हैं।
- जटिल नियम और वैश्विक बाजारों तक सीमित पहुँच निर्यात वृद्धि को बाधित करते हैं।
- यह क्षेत्र वैश्विक आर्थिक उतार-चढ़ाव के प्रति भी संवेदनशील बना रहता है।
सरकार के प्रयास
- भारत सरकार स्वास्थ्य, पर्यटन, शिक्षा, आईटी, बैंकिंग और वित्त जैसे प्रमुख क्षेत्रों में विभिन्न प्रोत्साहनों और लक्षित पहलों के माध्यम से सेवा क्षेत्र में वृद्धि को सक्रिय रूप से बढ़ावा दे रही है।
- ‘सेवाओं के चैंपियन क्षेत्रों के लिए कार्य योजना’ के अंतर्गत 12 प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को लक्षित किया गया है, जिसमें पर्यटन से 2028 तक $50.9 बिलियन की आय की संभावना है।
- देश में 1,000 से अधिक विश्वविद्यालय हैं, जो महात्मा गांधी राष्ट्रीय फेलोशिप जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से शिक्षा और कौशल विकास को समर्थन देते हैं।
- प्रधानमंत्री जन धन योजना जैसी योजनाओं के माध्यम से वित्तीय समावेशन को सशक्त किया गया है, जिसके तहत 47 करोड़ से अधिक बैंक खाते खोले गए हैं।
- सरकार उत्पादन आधारित प्रोत्साहनों और आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं के माध्यम से विनिर्माण और स्वास्थ्य ढाँचे को भी समर्थन दे रही है।
- बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाकर निवेश को प्रोत्साहित किया गया है।
निष्कर्ष और आगे की राह
- भारत का सेवा क्षेत्र विकास और रोजगार के लिए सुदृढ़ एवं आवश्यक बना हुआ है।
- सेवाओं पर आधारित अधिशेष और प्रवासी धनराशि ने भारत के चालू खाता घाटे को प्रबंधनीय बनाए रखा है।
- यह परिवर्तन इस बात को रेखांकित करता है कि भारत अब “विश्व का कार्यालय” बनकर उभर रहा है, जहाँ भौतिक वस्तुओं के व्यापार की तुलना में अदृश्य सेवाओं का प्रवाह अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।
- बुनियादी ढाँचे में सुधार, कौशल वृद्धि, नियमों को सरल बनाना और वैश्विक बाजारों तक पहुँच बढ़ाना भारत को उसकी पूरी क्षमता तक पहुँचाने एवं वैश्विक सेवा नेतृत्व में उसकी भूमिका को तथा सुदृढ़ करने में सहायता कर सकते हैं।
Source :IE
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