स्थानीय निकायों को सुदृढ़ करने हेतु 16वें वित्त आयोग (FC) की अनुशंसाएँ

पाठ्यक्रम: GS2/ राजव्यवस्था और शासन

संदर्भ

  • अरविंद पनगड़िया की अध्यक्षता वाले 16वें वित्त आयोग ने ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकायों को ₹7,91,493 करोड़ की अनुदान राशि की सिफ़ारिश की है, साथ ही स्थानीय शासन को सुदृढ़ करने हेतु संरचनात्मक सुधारों का प्रस्ताव दिया है।

वित्त आयोग क्या है?

  • वित्त आयोग एक संवैधानिक निकाय है, जिसे भारत के राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 280 के अंतर्गत गठित किया जाता है। इसका कार्य यह सिफ़ारिश करना है कि केंद्र सरकार द्वारा संकलित कर राजस्व को केंद्र और राज्यों के बीच किस प्रकार वितरित किया जाए।
  • वित्त आयोग का पुनर्गठन प्रत्येक पाँच वर्ष में किया जाता है और सामान्यतः इसे अपनी सिफ़ारिशें केंद्र को प्रस्तुत करने में कुछ वर्ष लगते हैं।
  • केंद्र सरकार वित्त आयोग द्वारा की गई सिफ़ारिशों को लागू करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं है।

कर अपवर्तन

  • वित्त आयोग यह तय करता है कि केंद्र के शुद्ध कर राजस्व का कितना हिस्सा राज्यों को दिया जाएगा (ऊर्ध्वाधर अपवर्तन) और यह हिस्सा विभिन्न राज्यों के बीच किस प्रकार वितरित होगा (क्षैतिज अपवर्तन)।
  • क्षैतिज अपवर्तन सामान्यतः आयोग द्वारा निर्मित एक सूत्र पर आधारित होता है, जिसमें राज्य की जनसंख्या, प्रजनन स्तर, आय स्तर, भौगोलिक स्थिति आदि को ध्यान में रखा जाता है।
  • केंद्र सरकार राज्यों को अतिरिक्त अनुदान भी प्रदान करती है, विशेषकर उन योजनाओं के लिए जो केंद्र और राज्यों द्वारा संयुक्त रूप से वित्तपोषित होती हैं।

स्थानीय निकायों के वित्तपोषण में चुनौतियाँ

  • कम स्व-राजस्व: स्थानीय निकायों का राजस्व जीडीपी का केवल लगभग 0.4% है, जो वैश्विक मानकों की तुलना में अत्यंत कम है। संपत्ति कर संग्रहण अक्षम और कम आंका गया है।
  • अनुदानों पर अत्यधिक निर्भरता: अधिकांश स्थानीय निकाय केंद्र और राज्यों से प्राप्त हस्तांतरणों पर अत्यधिक निर्भर रहते हैं, जिससे वित्तीय स्वायत्तता एवं दीर्घकालिक नियोजन क्षमता सीमित हो जाती है।
  • अनियमित राज्य वित्त आयोग: कई राज्य समय पर राज्य वित्त आयोग (SFCs) का गठन करने में विफल रहते हैं, जिससे पूर्वानुमेय राजकोषीय अपवर्तन बाधित होता है और स्थानीय शासन कमजोर होता है।
  • क्षमता संबंधी बाधाएँ: सीमित प्रशासनिक और तकनीकी विशेषज्ञता बजट निर्माण, वित्तीय प्रबंधन एवं निधियों के कुशल उपयोग को प्रभावित करती है।

स्थानीय निकायों को सुदृढ़ करने हेतु प्रमुख अनुशंसाएँ 

  • वित्तीय आवंटन: 2026–31 की अवधि के लिए ₹7,91,493 करोड़ का आवंटन।
    • ग्रामीण-शहरी विभाजन: अनुदान को ग्रामीण स्थानीय निकायों (RLBs) और शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) के बीच 60:40 अनुपात में विभाजित किया गया है।
  • अनिवार्य प्रारंभिक शर्तें: अनुदान केवल तभी जारी किए जाएँगे जब राज्य तीन महत्वपूर्ण शासन मानदंडों को पूरा करें:
    • संवैधानिक अनुपालन: स्थानीय निकायों का विधिवत गठन।
    • वित्तीय पारदर्शिता: अस्थायी और लेखा-परीक्षित खातों का समय पर सार्वजनिक प्रकटीकरण।
    • राज्य वित्त आयोगों (SFCs) का समय पर गठन।
  • शहरीकरण एवं अवसंरचना सुधार:
    • शहरीकरण प्रीमियम: ₹10,000 करोड़ का एकमुश्त अनुदान, जिससे राज्यों को प्रोत्साहित किया जाए कि वे अर्ध-शहरी गाँवों को बड़े ULBs (जनसंख्या >1 लाख) में विलय करें और ग्रामीण-से-शहरी संक्रमण नीति तैयार करें।
    • विशेष अवसंरचना घटक: 10–40 लाख जनसंख्या वाले शहरों में अपशिष्ट जल प्रबंधन हेतु ₹56,100 करोड़ का आवंटन।

आगे की राह

  • स्थानीय निकायों को अपनी राजस्व आधार का विस्तार करने के लिए संपत्ति कर का युक्तिकरण, GIS-आधारित बेहतर मूल्यांकन और उपयोगकर्ता शुल्क वसूली में सुधार के माध्यम से सशक्त किया जाना चाहिए।
  • राज्य वित्त आयोग की सिफ़ारिशों का गठन और क्रियान्वयन समयबद्ध एवं नियम-आधारित होना चाहिए।
  • समर्पित नगरपालिका कैडर और सतत क्षमता-विकास कार्यक्रमों का संस्थानीकरण किया जाना चाहिए।
  • डिजिटल लेखा प्रणाली, वास्तविक समय लेखा-परीक्षण और सार्वजनिक प्रकटीकरण पोर्टलों का राज्यों में मानकीकरण किया जाना चाहिए।

Source: DTE

 

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