सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गोपनीयता नीति को लेकर मेटा और व्हाट्सऐप की कठोर आलोचना 

पाठ्यक्रम: GS2/ शासन

संदर्भ

  • भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने व्हाट्सऐप और उसकी मूल कंपनी मेटा को “निगरानी पूँजीवाद” (surveillance capitalism) मॉडल अपनाने तथा भारतीय उपयोगकर्ताओं के गोपनीयता अधिकार का उल्लंघन करने के लिए डेटा साझाकरण एवं वाणिज्यिक शोषण के माध्यम से कड़ी चेतावनी दी।

पृष्ठभूमि  

  • 2021 में, व्हाट्सऐप ने अपनी सेवा शर्तों को अद्यतन किया, जिसके अंतर्गत उपयोगकर्ताओं को अपनी मेटाडाटा जानकारी मूल कंपनी मेटा (तत्कालीन फेसबुक) के साथ साझा करना अनिवार्य कर दिया गया।
  • यूरोपीय संघ के विपरीत, जहाँ सामान्य डेटा संरक्षण विनियमन (GDPR) ने इस कदम को रोक दिया था, भारतीय उपयोगकर्ताओं को “टेक-इट-ऑर-लीव-इट” का अंतिम विकल्प दिया गया: शर्तें स्वीकार करें या प्लेटफ़ॉर्म तक पहुँच खो दें।
  • भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) ने इसे प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 के अंतर्गत प्रभुत्व के दुरुपयोग के रूप में पहचाना।
  • 2024 में, CCI ने ₹213.14 करोड़ का जुर्माना लगाया और यह टिप्पणी की कि लिया गया “सहमति” वास्तव में “निर्मित” और बाध्यकारी थी।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा रेखांकित प्रमुख मुद्दे

  • जनसामान्य की असुरक्षा: ऐसे देश में जहाँ व्हाट्सऐप बैंकिंग, सरकारी सेवाओं और आजीविका के लिए एक “डिजिटल उपयोगिता” बन चुका है, “ऑप्ट-आउट” करना सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार का पर्याय बन जाता है।
  • वाणिज्यिक शोषण: मेटा को उपयोगकर्ता व्यवहार का मुद्रीकरण करने में सक्षम बनाता है, जैसे क्रॉस-प्लेटफ़ॉर्म विज्ञापन (इंस्टाग्राम, फेसबुक) के माध्यम से, जिससे उपयोगकर्ता “उत्पाद” में बदल जाते हैं और उन्हें कोई राजस्व हिस्सा नहीं मिलता।
    • एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन के बावजूद: संदेश सुरक्षित हो सकता है, परंतु व्यवहार संबंधी मेटाडाटा (“डेटा के भंडार”) का अत्यधिक बाज़ार मूल्य होता है।
  • स्पष्टता का अभाव: जटिल कानूनी शब्दावली ग्रामीण/गरीब उपयोगकर्ताओं के लिए दुर्गम है। न्यायालय ने उदाहरण दिया कि तमिलनाडु का एक विक्रेता अंग्रेज़ी शर्तों को समझने में असमर्थ है।
  • शक्ति का असंतुलन: न्यायालय ने देखा कि प्लेटफ़ॉर्म उपभोक्ताओं की “आसक्ति” का लाभ उठाता है और उन्हें उनकी सूचित सहमति के बिना उपयोगकर्ता से “उत्पाद” में बदल देता है।
  • DPDP अधिनियम (2023) की कमी: यद्यपि डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम राईट टू फॉरगेट और डेटा प्रसंस्करण की सीमाओं को संबोधित करता है, न्यायालय ने कहा कि इसमें “किराया-साझाकरण” (rent-sharing) का प्रावधान नहीं है।
    • सर्वोच्च न्यायालय ने इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) को DPDP अधिनियम की तुलना यूरोपीय संघ के डिजिटल सेवाएँ अधिनियम (DSA) से करने का निर्देश दिया।
भारत का डेटा संरक्षण ढाँचा

गोपनीयता का मौलिक अधिकार: न्यायमूर्ति के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017) में सर्वोच्च न्यायालय ने गोपनीयता के अधिकार को अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी और इसे गरिमा, स्वायत्तता एवं स्वतंत्रता से जोड़ा।
न्यायमूर्ति बी.एन. श्रीकृष्ण समिति (2017): पुट्टस्वामी निर्णय के बाद गठित की गई। इसने कंपनियों को डेटा न्यासी (data fiduciaries) मानने और शक्ति असंतुलन के विरुद्ध सशक्त सुरक्षा उपायों की सिफारिश की।
डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम, 2023: भारत का प्रथम व्यापक डिजिटल व्यक्तिगत डेटा कानून।
प्रमुख प्रावधानों में सहमति-आधारित डेटा प्रसंस्करण, उद्देश्य की सीमा और डेटा न्यूनतमकरण शामिल हैं।
प्रवर्तन हेतु भारत का डेटा संरक्षण बोर्ड स्थापित करता है।
तथापि, सर्वोच्च न्यायालय ने आलोचना की कि यह मुख्यतः गोपनीयता संरक्षण पर केंद्रित है, परंतु डेटा के आर्थिक मूल्य या डेटा मुद्रीकरण के लिए क्षतिपूर्ति को संबोधित नहीं करता।
भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI): डेटा के दुरुपयोग को प्रभुत्व के दुरुपयोग का एक रूप माना।

स्रोत: TH

 

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