सोलहवें वित्त आयोग की अनुशंसाओं के संबंध में व्यक्त की गई चिंताएँ

पाठ्यक्रम: GS3/ अर्थव्यवस्था

संदर्भ

  • सोलहवाँ वित्त आयोग ने बढ़ते उपकरों (सेस) तथा दक्षता और समानता के मध्य संतुलन को लेकर व्यक्त चिंताओं के बीच अपनी सिफारिशें प्रस्तुत कीं, जिससे प्रभावी कर-वितरण और समानीकरण के संबंध में प्रश्न उत्पन्न हुए।

वित्त आयोग क्या है?

  •  वित्त आयोग एक संवैधानिक निकाय है, जिसका गठन भारत के राष्ट्रपति द्वारा संविधान के अनुच्छेद 280 के अंतर्गत किया जाता है। यह आयोग यह अनुशंसा करता है कि केंद्र सरकार द्वारा संकलित कर-राजस्व का वितरण केंद्र और विभिन्न राज्यों के बीच किस प्रकार किया जाए।
  • आयोग का पुनर्गठन प्रत्येक पाँच वर्ष में किया जाता है और सामान्यतः अपनी सिफारिशें प्रस्तुत करने में इसे लगभग दो वर्ष का समय लगता है।
  • सोलहवें वित्त आयोग के अध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया थे तथा इसकी सिफारिशें 2026–27 से 2030–31 तक की पाँच-वर्षीय पुरस्कार अवधि को आवृत करती हैं।
    • केंद्र सरकार वित्त आयोग की सिफारिशों को लागू करने के लिए विधिक रूप से बाध्य नहीं है।

कर-वितरण
 

  • वित्त आयोग यह निर्धारित करता है कि केंद्र के शुद्ध कर-राजस्व का कितना भाग समग्र रूप से राज्यों को जाएगा (ऊर्ध्वाधर वितरण) और राज्यों के लिए निर्धारित इस हिस्से का विभिन्न राज्यों के बीच किस प्रकार विभाजन होगा (क्षैतिज वितरण)।
  • राज्यों के बीच क्षैतिज वितरण सामान्यतः आयोग द्वारा निर्मित एक सूत्र पर आधारित होता है, जिसमें राज्य की जनसंख्या, प्रजनन दर, आय स्तर, भौगोलिक स्थिति आदि कारकों को ध्यान में रखा जाता है।
  • हालाँकि, ऊर्ध्वाधर वितरण किसी ऐसे वस्तुनिष्ठ सूत्र पर आधारित नहीं होता।
  • केंद्र सरकार संयुक्त रूप से वित्तपोषित योजनाओं के लिए अतिरिक्त अनुदानों के माध्यम से भी राज्यों की सहायता करती है।

सोलहवें वित्त आयोग के प्रमुख प्रावधान

  • ऊर्ध्वाधर वितरण:
    •  आयोग ने विभाज्य कर-समूह में राज्यों की हिस्सेदारी 41% पर यथावत बनाए रखी, जिसे जम्मू और कश्मीर के पुनर्गठन के पश्चात समायोजित किया गया था।
    • आयोग ने सुझाव दिया कि केंद्र को उपकरों और अधिभारों का एक पर्याप्त भाग साझा किए जाने योग्य करों में सम्मिलित करना चाहिए। तथापि, अत्यधिक उपकरों एवं अधिभारों को सीमित या चरणबद्ध रूप से समाप्त करने के संबंध में कोई ठोस अनुशंसा नहीं की गई।
    • सोलहवें वित्त आयोग ने पंद्रहवें वित्त आयोग द्वारा अनुशंसित अनुदानों—जैसे राजस्व घाटा अनुदान, क्षेत्र-विशिष्ट अनुदान तथा राज्य-विशिष्ट अनुदान—को समाप्त कर दिया है।
  • क्षैतिज वितरण:
    •  एक नवीन दक्षता-आधारित मानदंड प्रस्तुत किया गया। इसमें किसी राज्य के समस्त राज्यों के सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) में उसके हिस्से के माध्यम से योगदान का आकलन किया गया। अत्यधिक प्रभावों को संतुलित करने हेतु प्रत्यक्ष GSDP के स्थान पर उसके वर्गमूल का उपयोग किया गया।
    • पूर्ववर्ती ‘कर प्रयास/राजकोषीय अनुशासन’ के मानदंड को समाप्त कर दिया गया।

सोलहवें वित्त आयोग से संबंधित चिंताएँ

  • उपकरों और अधिभारों पर: उपकर और अधिभार विभाज्य कर-समूह का भाग नहीं होते। इनकी बढ़ती हिस्सेदारी राज्यों को होने वाले प्रभावी हस्तांतरण को कम करती है।
    • आयोग ने इस विषय पर अनुच्छेद 270 और 280 के अंतर्गत अपनी संवैधानिक भूमिका का सशक्त प्रतिपादन नहीं किया।
  • समानीकरण के अवसर का अभाव: केवल वितरण-सूत्र भारत के विविध राज्यों के बीच लागत एवं आवश्यकताओं के अंतरों को पूर्णतः परिलक्षित नहीं कर सकते।
    • अनुच्छेद 275 विशिष्ट आवश्यकताओं की पूर्ति तथा सार्वजनिक सेवाओं के समानीकरण हेतु अनुदानों की व्यवस्था करता है।
    • राजस्व अंतर तथा राज्य-विशिष्ट अनुदानों की समाप्ति से समानीकरण की भूमिका कमजोर होती है।

निष्कर्ष
 

  • यद्यपि सोलहवें वित्त आयोग ने 41% की ऊर्ध्वाधर हिस्सेदारी को संरक्षित रखा और योगदान-आधारित दक्षता मानदंड प्रस्तुत किया, तथापि इसने अनुदानों के दायरे को संकुचित कर दिया तथा उपकरों एवं अधिभारों के बढ़ते उपयोग के प्रश्न का निर्णायक समाधान प्रस्तुत नहीं किया।
  • समानीकरण-उन्मुख अनुदानों से सूत्र-आधारित एवं प्रदर्शन-संबद्ध हस्तांतरण की ओर यह परिवर्तन समानता, राजकोषीय संतुलन और संघवाद की संवैधानिक भावना के संबंध में महत्वपूर्ण प्रश्न उत्पन्न करता है।

Source: TH

 

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