पाठ्यक्रम: GS3/आंतरिक सुरक्षा
संदर्भ
- स्वापक नियंत्रण ब्यूरो (NCB) ने राज्य पुलिस तथा केंद्रीय एजेंसियों के समन्वय से ऑपरेशन ट्राइडेंट चलाया। इसका उद्देश्य भारत, म्यांमार और बांग्लादेश में सक्रिय एक अंतरराष्ट्रीय मादक पदार्थ तस्करी गिरोह को नष्ट करना था।
भारत को मादक पदार्थों की तस्करी के लिए क्यों निशाना बनाया जाता है?
- भौगोलिक स्थिति: भारत गोल्डन क्रिसेंट और गोल्डन ट्रायंगल के निकट स्थित है। ये विश्व के प्रमुख मादक पदार्थ उत्पादक क्षेत्र हैं।
- पंजाब, मणिपुर और असम जैसे राज्यों में सीमापार तस्करी की सुगमता मादक पदार्थों की भारत में आपूर्ति को बढ़ावा देती है।
- विस्तृत स्थलीय एवं समुद्री सीमाएँ: भारत की स्थलीय सीमाओं की कुल लंबाई 15,000 किलोमीटर से अधिक है तथा इसकी तटरेखा 11,000 किलोमीटर से अधिक विस्तृत है।
- म्यांमार, नेपाल और बांग्लादेश के साथ लगती संवेदनशील सीमाएँ दुर्गम भूभाग तथा अनौपचारिक मार्गों के माध्यम से सीमापार तस्करी को सुगम बनाती हैं।
- औषधि निर्माण का आधार: भारत विश्व के सबसे बड़े औषधि तथा पूर्ववर्ती रसायनों के उत्पादकों में से एक है।
- यदि नियामक निगरानी कमजोर हो, तो पूर्ववर्ती रसायनों का अवैध उपयोग कृत्रिम मादक पदार्थों के निर्माण में किया जा सकता है।
- मादक पदार्थों से वित्तपोषित आतंकवाद : मादक पदार्थों की तस्करी से प्राप्त धन आतंकवादी संगठनों तथा विद्रोही समूहों को वित्तपोषित करता है। मादक पदार्थों से अर्जित आय का उपयोग भारत-विरोधी गतिविधियों के वित्तपोषण में किया गया है, विशेषकर पश्चिमी सीमा पर।
गोल्डन ट्रायंगल
- इसमें म्यांमार, लाओस और थाईलैंड के क्षेत्र शामिल हैं।
- यह दक्षिण-पूर्व एशिया का प्रमुख अफीम उत्पादक क्षेत्र है तथा यूरोप और उत्तरी अमेरिका तक मादक पदार्थों की आपूर्ति के सबसे प्राचीन मार्गों में से एक है।
गोल्डन क्रिसेंट
- इसमें अफगानिस्तान, ईरान और पाकिस्तान शामिल हैं।
- यह अफीम के उत्पादन एवं वितरण के प्रमुख वैश्विक क्षेत्रों में से एक है।
मादक पदार्थों के दुरुपयोग का प्रभाव
- आर्थिक प्रभाव: मादक पदार्थों का दुरुपयोग उत्पादकता को कम करता है, स्वास्थ्य सेवाओं पर व्यय बढ़ाता है तथा मानव पूँजी को कमजोर करता है।
- स्वास्थ्य संबंधी प्रभाव: इससे मानसिक विकार उत्पन्न हो सकते हैं तथा शारीरिक स्वास्थ्य में गिरावट आती है।
- सामाजिक प्रभाव: यह पारिवारिक संबंधों को बाधित करता है, घरेलू हिंसा को बढ़ावा देता है तथा सामाजिक अलगाव और कलंक की स्थिति उत्पन्न करता है।
- राष्ट्रीय सुरक्षा पर प्रभाव: मादक पदार्थों का अवैध व्यापार मादक पदार्थों से वित्तपोषित आतंकवाद और संगठित अपराध को बढ़ावा देता है। युवाओं की इसमें संलिप्तता राष्ट्रीय अखंडता को कमजोर करती है।
भारत में सरकारी पहलें
- तीन वर्षीय कार्ययोजना : केंद्रीय गृह मंत्री ने वर्ष 2029 तक भारत को नशामुक्त बनाने के लिए तीन वर्षीय कार्ययोजना प्रस्तुत की। यह कार्ययोजना चार प्रमुख स्तंभों पर आधारित है।
- प्रथम —खुफिया जानकारी एवं अभियानों पर आधारित प्रवर्तन।
- द्वितीय—पूर्ववर्ती रसायनों तथा कृत्रिम मादक पदार्थों पर नियंत्रण।
- तृतीय—मादक पदार्थों की माँग में कमी लाना तथा उनके दुष्प्रभावों को कम करना।
- चतुर्थ—क्षमता निर्माण एवं समन्वय।
- सीमा सुरक्षा बल (BSF), केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF), भारतीय तटरक्षक बल, सीमा शुल्क विभाग तथा राजस्व आसूचना निदेशालय (DRI) जोखिम-आधारित प्रोफाइलिंग करेंगे। बेहतर निगरानी के लिए स्थलीय सीमाओं, बंदरगाहों, हवाई अड्डों तथा माल ढुलाई केंद्रों पर स्कैनर स्थापित किए जाएँगे।
- केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI), विदेश मंत्रालय तथा इंटरपोल के सहयोग से भगोड़ों को वापस लाने के प्रयास किए जाएँगे।
- प्रवर्तन निदेशालय (ED), वित्तीय आसूचना इकाई (FIU) तथा बैंकिंग प्रणाली के माध्यम से अवैध धन के लेन-देन का पता लगाया जाएगा।
- स्वापक औषधि एवं मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 : यह अधिनियम अवैध मादक पदार्थों के उत्पादन, नियन्त्रण, बिक्री तथा सेवन पर प्रतिबंध लगाता है और उल्लंघन के लिए दंड का प्रावधान करता है।
- नशा मुक्त भारत अभियान : वर्ष 2020 में शुरू किए गए इस अभियान का उद्देश्य मादक पदार्थों के दुरुपयोग के दुष्प्रभावों के प्रति जागरूकता बढ़ाना तथा नशामुक्त भारत को प्रोत्साहित करना है।
- काशी घोषणा : यह नशामुक्त भारत के लिए पाँच वर्षीय कार्ययोजना है, जिस पर वाराणसी में आयोजित युवा आध्यात्मिक शिखर सम्मेलन के दौरान हस्ताक्षर किए गए थे।
- भारत ने वर्ष 2047 तक नशामुक्त भारत प्राप्त करने का राष्ट्रीय लक्ष्य निर्धारित किया है।
- भारत ने स्वापक औषधियों एवं मनःप्रभावी पदार्थों (NDPS), रासायनिक पूर्वगामी पदार्थों तथा संबंधित अपराधों की अवैध तस्करी से निपटने के लिए 27 देशों के साथ द्विपक्षीय समझौते, 16 देशों के साथ समझौता ज्ञापन तथा 2 देशों के साथ सुरक्षा सहयोग संबंधी समझौते किए हैं।
- डार्कनेट निगरानी प्रकोष्ठ: स्वापक नियंत्रण ब्यूरो (NCB) के अंतर्गत कार्यरत यह प्रकोष्ठ ऑनलाइन माध्यमों से होने वाली मादक पदार्थों की बिक्री पर निगरानी रखता है।
वैश्विक पहलें
- संयुक्त राष्ट्र मादक पदार्थ एवं अपराध कार्यालय (UNODC): यह कार्यालय अवैध मादक पदार्थों के विरुद्ध वैश्विक प्रयासों में अग्रणी भूमिका निभाता है। इसके नेतृत्व में चलाए जाने वाले अभियान का उद्देश्य मादक पदार्थों के दुरुपयोग से उत्पन्न खतरों के प्रति जागरूकता बढ़ाना है।
- अंतरराष्ट्रीय स्वापक नियंत्रण बोर्ड (INCB): यह बोर्ड वैश्विक मादक पदार्थों की स्थिति की निगरानी करता है तथा अंतरराष्ट्रीय मादक पदार्थ नियंत्रण संधियों के प्रति विभिन्न देशों के अनुपालन का आकलन करता है।
आगे की राह
- वैश्विक शासन को सुदृढ़ करना: देशों को मादक पदार्थों के विरुद्ध समन्वित कानूनों तथा प्रत्यर्पण संबंधी सुदृढ़ संधियों की आवश्यकता है। अंतरराष्ट्रीय संस्थानों को मादक पदार्थों की तस्करी के विरुद्ध प्रवर्तन के लिए साझा प्रोटोकॉल विकसित करने चाहिए।
- खुफिया सहयोग का विस्तार: एकीकृत डेटाबेस तथा वास्तविक समय में खुफिया जानकारी साझा करने वाले मंचों की स्थापना से मादक पदार्थों की तस्करी रोकने के प्रयास अधिक प्रभावी हो सकते हैं।
- प्रवर्तन के साथ पुनर्वास: कठोर कानून प्रवर्तन के साथ-साथ सरकारों को निम्नलिखित पर भी ध्यान केंद्रित करना चाहिए:
- पुनर्वास सेवाएँ।
- जन-जागरूकता अभियान।
- मानसिक स्वास्थ्य सहायता।
- युवाओं की भागीदारी से संबंधित कार्यक्रम।
निष्कर्ष
- सीमापार मादक पदार्थों की तस्करी केवल कानून-व्यवस्था से संबंधित चुनौती नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य, सामाजिक स्थिरता तथा राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बहुआयामी खतरा है।
- नशामुक्त भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए खुफिया जानकारी पर आधारित प्रभावी प्रवर्तन, क्षेत्रीय सहयोग, निवारक उपायों तथा सुलभ पुनर्वास सेवाओं का समन्वित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है।
स्रोत: IE
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