पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था और शासन
संदर्भ
- भारत में एक ही अपराध के लिए दोषी ठहराए गए दो व्यक्तियों को अलग-अलग सजाएँ दी जा सकती हैं। इससे दंड निर्धारण में एकरूपता सुनिश्चित करने के लिए समान सिद्धांतों की आवश्यकता का प्रश्न उठता है।
दंड निर्धारण
- दंड निर्धारण वह प्रक्रिया है, जिसके अंतर्गत राज्य कानून द्वारा निर्धारित दंड की सीमाओं, उदाहरण के लिए, ‘दस वर्ष तक का कारावास’, को दोषी व्यक्ति के लिए एक विशिष्ट कारावास अवधि, जुर्माने, परिवीक्षा अथवा सामुदायिक दंड जैसे दंडों में परिवर्तित करता है।
- भारत में यह निर्णय लगभग पूरी तरह व्यक्तिगत न्यायाधीश अथवा न्यायपीठ के विवेक पर छोड़ दिया गया है।
- विधियों में अधिकतम तथा कुछ मामलों में न्यूनतम दंड का प्रावधान किया जाता है।
- हालाँकि, ऐसा कोई निर्धारित मानदंड-सूची उपलब्ध नहीं है, जो यह स्पष्ट करे कि किन परिस्थितियों को गंभीर दंड-वर्धक कारक माना जाए, किन परिस्थितियों को वास्तविक दंड-न्यूनीकरण का आधार समझा जाए अथवा पूर्व आचरण और पश्चात्ताप को दंड निर्धारण में कितना महत्त्व दिया जाए।
राष्ट्रीय दंड निर्धारण नीति की आवश्यकता
- दंड में असमानता: न्यायिक आकलन में भिन्नता के कारण समान प्रकार के अपराध करने वाले व्यक्तियों को अलग-अलग सजाएँ दी जा सकती हैं।
- संवैधानिक चिंताएँ: संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 प्रत्येक व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता तथा निष्पक्ष, न्यायसंगत और उचित प्रक्रिया की गारंटी देते हैं। मनमाना दंड निर्धारण इन संवैधानिक गारंटियों को कमजोर करता है।
- न्यायाधीशों के लिए सीमित मार्गदर्शन: अपराध की गंभीरता, पूर्व आपराधिक आचरण, पश्चात्ताप तथा पुनर्वास की संभावनाओं जैसे कारकों का दंड पर पड़ने वाला प्रभाव निर्धारित करने हेतु एक व्यापक राष्ट्रीय ढाँचे का अभाव है।
- वैकल्पिक दंडों की उपेक्षा: स्पष्ट दिशा-निर्देशों के अभाव में परिवीक्षा अथवा कारावास के अन्य कानूनी रूप से अनुमेय विकल्पों पर न्यायिक प्रणाली में पर्याप्त विचार नहीं किया जा सकता है।
सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियाँ
- सोमन बनाम केरल राज्य (2012): इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने दंड निर्धारण में शामिल परस्पर प्रतिस्पर्धी सिद्धांतों को स्वीकार किया तथा आपराधिक न्याय प्रणाली में प्रचलित दंड निर्धारण की प्रक्रियाओं की कमियों को रेखांकित किया।
- सुनीता देवी बनाम बिहार राज्य (2024): सर्वोच्च न्यायालय ने टिप्पणी की कि दंड निर्धारण महज एक लॉटरी नहीं होना चाहिए। न्यायालय ने केंद्र सरकार को व्यापक राष्ट्रीय दंड निर्धारण नीति की व्यवहार्यता की जाँच करने का निर्देश दिया, जिसके लिए दंड निर्धारण आयोग की स्थापना पर भी विचार किया जा सकता है।
इंग्लैंड का मॉडल: दंड निर्धारण परिषद
- इंग्लैंड और वेल्स में कोरोनर्स एंड जस्टिस अधिनियम, 2009 के अंतर्गत दंड निर्धारण परिषद की स्थापना की गई थी। इसके अंतर्गत:
- न्यायालय अपराधी की दोषिता की मात्रा तथा अपराध से हुई क्षति का आकलन करते हैं।
- दिशा-निर्देशों में दोषिता और क्षति के विभिन्न संयोजनों के आधार पर प्रारंभिक दंड तथा दंड की निर्धारित सीमा का उल्लेख किया जाता है।
- न्यायालय दंड-वर्धक एवं दंड-न्यूनीकरण करने वाले कारकों, दोष स्वीकार करने तथा एकाधिक अपराधों के आधार पर दंड में समायोजन करते हैं।
- ये दिशा-निर्देश न्यायिक निर्णय-निर्माण को एक संरचित स्वरूप प्रदान करते हैं, लेकिन सतही तौर पर समान दिखने वाले प्रत्येक मामले में एक जैसी सजा देना अनिवार्य नहीं बनाते।
आगे की राह
- अपराध-विशिष्ट दिशा-निर्देश विकसित करना: दोषिता की मात्रा, अपराध से हुई क्षति, दंड-वर्धक कारकों तथा दंड-न्यूनीकरण करने वाली परिस्थितियों के मूल्यांकन के लिए एक सुव्यवस्थित ढाँचा विकसित करने की आवश्यकता है।
- राष्ट्रीय दंड निर्धारण डेटाबेस तैयार करना: विभिन्न न्यायालयों में दंड निर्धारण संबंधी आँकड़ों को एकत्रित करने तथा असमानताओं की पहचान करने के लिए राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड के वर्तमान बुनियादी ढाँचे का उपयोग किया जा सकता है।
- साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण: राष्ट्रीय ढाँचे को अंतिम रूप देने से पहले वर्तमान दंड निर्धारण प्रथाओं, कारागारों की क्षमता, पुनर्वास के परिणामों, निवारक प्रभाव तथा सार्वजनिक सुरक्षा का अध्ययन किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
- राष्ट्रीय दंड निर्धारण नीति समान मामलों में एकसमान सिद्धांतों के अनुसार दंड सुनिश्चित करने में सहायता कर सकती है। साथ ही, यह व्यक्तिगत मामलों में उचित और तर्कसंगत भिन्नताओं की संभावना भी बनाए रख सकती है।
- इसका उद्देश्य दंड निर्धारण को निष्पक्ष, पारदर्शी, आनुपातिक तथा जवाबदेह बनाना होना चाहिए, ताकि सजा का निर्धारण केवल उस न्यायाधीश के विवेक पर निर्भर न रहे, जो संबंधित मामले की सुनवाई कर रहा है।
स्रोत: IE
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कैबिनेट सचिवालय