पाठ्यक्रम: GS2/ राजव्यवस्था और शासन
संदर्भ
- संसद की विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 पर गठित संयुक्त संसदीय समिति की पहली बैठक में सदस्यों ने प्रस्तावित संशोधनों को लेकर विभिन्न प्रश्न उठाए।
विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA), 2010
- इसे प्रथम बार 1976 में अधिनियमित किया गया था, 2010 में इसका स्थान नए अधिनियम ने लिया तथा 2016, 2018 और 2020 में इसमें आगे संशोधन किए गए।
- इसका प्रशासन गृह मंत्रालय (MHA) द्वारा किया जाता है।
- उद्देश्य: विदेशी अंशदान की स्वीकृति एवं उपयोग को विनियमित करना तथा राष्ट्रीय हित के प्रतिकूल गतिविधियों पर रोक लगाना।
- एफसीआरए पंजीकरण 5 वर्षों के लिए वैध होता है और इसकी अवधि समाप्त होने से पहले इसका नवीनीकरण कराना आवश्यक है।
2026 के संशोधन विधेयक के प्रमुख प्रावधान
- संपत्ति प्रबंधन के लिए नामित प्राधिकरण: विधेयक में विदेशी वित्तपोषित संपत्तियों के प्रबंधन के लिए एक नामित प्राधिकरण के गठन का प्रस्ताव किया गया है, जो इस व्यवस्था के प्रमुख संस्थागत तंत्र के रूप में कार्य करेगा।
- यह प्राधिकरण उस स्थिति में विदेशी अंशदान एवं संपत्तियों का नियंत्रण अपने हाथ में लेगा, जब किसी संगठन का पंजीकरण रद्द, समर्पित, समाप्त हो जाए या उसका नवीनीकरण न किया गया हो।
- संपत्तियों पर सरकार का अधिकार: यदि पंजीकरण पुनर्स्थापित नहीं किया जाता है, तो सरकार संपत्तियों को किसी सरकारी विभाग को हस्तांतरित कर सकती है।
- वह इन संपत्तियों को बेच भी सकती है और बिक्री से प्राप्त राशि भारत की संचित निधि में जमा की जाएगी।
- पंजीकरण की स्वतः समाप्ति: एक नई धारा 14B शामिल की गई है, जिसके अंतर्गत पंजीकरण की अवधि समाप्त होने या नवीनीकरण से मना किए जाने पर एफसीआरए पंजीकरण की “मानी गई समाप्ति” का प्रावधान है। तीन परिस्थितियों में पंजीकरण स्वतः समाप्त हो जाएगा:
- संगठन नवीनीकरण के लिए आवेदन करने में विफल रहता है।
- नवीनीकरण का आवेदन अस्वीकार कर दिया जाता है।
- नवीनीकरण के बिना वैधता अवधि समाप्त हो जाती है।
- निधियों के उपयोग के लिए समय-सीमा: वित्तीय अनुशासन एवं पारदर्शिता में सुधार के लिए विदेशी निधियों की प्राप्ति एवं उपयोग हेतु अनिवार्य समय-सीमा निर्धारित की गई है।
- निलंबन के दौरान प्रतिबंध: निलंबित संगठन अपनी विदेशी निधियों से प्राप्त संपत्तियों को बेच, हस्तांतरित या बंधक नहीं रख सकता। ऐसी किसी भी कार्रवाई के लिए सरकार की पूर्व स्वीकृति अनिवार्य होगी।
- जांच पर केंद्रीकृत नियंत्रण: मूल अधिनियम की धारा 43 में संशोधन किया गया है, जिसके अंतर्गत एफसीआरए से संबंधित आरोपों की जांच शुरू करने से पहले किसी भी कानून प्रवर्तन एजेंसी या राज्य सरकार को केंद्र से पूर्व अनुमति प्राप्त करनी होगी।
- दंड का युक्तिकरण: अधिकतम दंड को पाँच वर्ष के कारावास से घटाकर एक वर्ष का कारावास, या जुर्माना, या दोनों किया गया है।
- व्यक्तिगत जवाबदेही: “प्रमुख पदाधिकारी” की परिभाषा में अब निदेशक, साझेदार, न्यासी, हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) का कर्ता, सोसायटियों/न्यासों/व्यापार संघों के पदाधिकारी तथा प्रबंधन पर नियंत्रण रखने वाला कोई भी व्यक्ति शामिल होगा।
- जब तक वे यह सिद्ध न कर दें कि उन्हें संबंधित गतिविधि की जानकारी नहीं थी या उन्होंने उचित सावधानी बरती थी, तब तक वे व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी होंगे।
- संपत्तियों का स्थायी निहित होना: यदि कोई संगठन बंद हो जाता है, निष्क्रिय हो जाता है या उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है, तो उसकी विदेशी निधियों से प्राप्त संपत्तियाँ नामित प्राधिकरण के माध्यम से स्थायी रूप से सरकार में निहित हो जाएँगी।
सदस्यों द्वारा उठाई गई चिंताएँ
- संपत्तियों पर नियंत्रण को लेकर प्रश्न: यदि एफसीआरए प्रमाण-पत्र रद्द, समर्पित या निष्प्रभावी हो जाता है, तो विदेशी निधियों से प्राप्त संपत्तियाँ बिना पूर्व सुनवाई या न्यायिक समीक्षा के सरकार द्वारा नियुक्त “नामित प्राधिकरण” में निहित हो सकती हैं।
- कोई समय-सीमा नहीं: कानून में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि ऐसी संपत्तियाँ कितनी अवधि तक सरकारी अभिरक्षा में रह सकती हैं।
- प्रक्रिया का अभाव: संपत्तियों पर नियन्त्रण लेने, उनकी सूची तैयार करने तथा विदेशी निधियों से प्राप्त संपत्तियों को घरेलू निधियों से प्राप्त संपत्तियों से अलग करने के संबंध में स्पष्ट नियमों का अभाव है।
- संसाधनों पर भार: विद्यालयों, अस्पतालों और अनाथालयों जैसी संस्थाओं के दीर्घकालिक प्रबंधन से राज्यों पर वित्तीय एवं मानव संसाधन संबंधी दबाव उत्पन्न हो सकता है।
- निपटान के स्पष्ट नियमों का अभाव: कानून में संपत्तियों के अंतिम निपटान अथवा पूजा स्थलों के संबंध में स्पष्ट प्रावधान नहीं किए गए हैं।
विदेशी अंशदान का विनियमन क्यों आवश्यक है?
- यह एफसीआरए के माध्यम से प्राप्त विदेशी वित्तपोषण पर निगरानी रखकर राष्ट्रीय सुरक्षा एवं संप्रभुता की रक्षा करता है।
- विदेशी अंशदान का विनियमन धन शोधन तथा निधियों के अवैध गतिविधियों में हस्तांतरण को रोकने में सहायता करता है।
- यह सुनिश्चित करता है कि निधियों का उपयोग केवल विकासात्मक एवं परोपकारी उद्देश्यों के लिए किया जाए।
- यह गैर-सरकारी संगठनों के कामकाज में पारदर्शिता एवं जवाबदेही को बढ़ावा देता है।
- एफसीआरए के अंतगर्त चुनावी उम्मीदवारों, पत्रकारों, न्यायाधीशों, सरकारी कर्मचारियों तथा राजनीतिक संगठनों के लिए विदेशी वित्तपोषण पर रोक है।
विदेशी अंशदान के विनियमन को लेकर चिंताएँ
- प्रशासनिक विलंब: पंजीकरण एवं नवीनीकरण की प्रक्रिया प्रायः समय लेने वाली होती है, जिससे गैर-सरकारी संगठनों की निधियों तक पहुँच तथा अपनी गतिविधियाँ संचालित करने की क्षमता प्रभावित होती है।
- राजनीतिक हस्तक्षेप: गैर-सरकारी संगठनों के पंजीकरण रद्द करने या उनके खातों को रोकने के संबंध में सरकार को प्राप्त विवेकाधीन शक्तियों को राजनीतिक हस्तक्षेप के एक रूप के रूप में देखा जाता है।
- पारदर्शिता का अभाव: एफसीआरए के अंतर्गत प्राप्त विदेशी निधियों के उपयोग में पारदर्शिता की कमी को लेकर कुछ गैर-सरकारी संगठनों की आलोचना की गई है।
- इन निधियों के विशिष्ट उद्देश्यों एवं लाभार्थियों का स्पष्ट रूप से प्रकटीकरण न किए जाने पर अक्सर चिंताएँ उत्पन्न होती हैं।
आगे की राह
- सरकार को एफसीआरए के अंतर्गत अनुमोदन की प्रक्रियाओं को पारदर्शी एवं समयबद्ध बनाना चाहिए।
- नियामक निगरानी और नागरिक समाज संगठनों की स्वायत्तता के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता है।
- शक्तियों के मनमाने प्रयोग को रोकने के लिए न्यायिक एवं संस्थागत सुरक्षा उपाय सुनिश्चित किए जाने चाहिए।
स्रोत: TH
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संक्षिप्त समाचार 19-09-2026