पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के अनुसार, भारत का सॉफ्टवेयर सेवाओं का निर्यात वर्ष 2025-26 में वार्षिक आधार पर 8.2 प्रतिशत बढ़कर 221.4 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया।
भारत में सेवा क्षेत्र
- भारत के सेवा क्षेत्र में व्यापार, परिवहन, संचार, वित्तीय सेवाएँ, सूचना प्रौद्योगिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी समर्थित सेवाएँ, व्यावसायिक सेवाएँ, पर्यटन, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा शामिल हैं।
- यह क्षेत्र भारत की आर्थिक वृद्धि, रोजगार, विदेशी मुद्रा आय तथा वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता में महत्वपूर्ण योगदान देता है।
- भारत सूचना प्रौद्योगिकी सेवाओं, व्यवसाय प्रक्रिया बाह्यस्रोतीकरण तथा डिजिटल सेवाओं के लिए एक प्रमुख वैश्विक केंद्र के रूप में उभरा है।
वर्तमान स्थिति
- सॉफ्टवेयर सेवाओं का निर्यात:
- भारत का सॉफ्टवेयर सेवाओं का निर्यात वर्ष 2025-26 में 8.2 प्रतिशत बढ़कर 221.4 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया।
- विदेशों में स्थापित वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों के माध्यम से प्रदान की जाने वाली सेवाओं को शामिल करने पर निर्यात 9.5 प्रतिशत बढ़कर 239.3 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया।
- सॉफ्टवेयर सेवाओं का भारत के कुल सेवा निर्यात में 53 प्रतिशत योगदान रहा। भारत का कुल सेवा निर्यात 421.29 अरब अमेरिकी डॉलर रहा।
- इसके प्रमुख घटकों में सूचना प्रौद्योगिकी सेवाएँ (147 अरब डॉलर), व्यवसाय प्रक्रिया बाह्यस्रोतीकरण सेवाएँ (56 अरब डॉलर) तथा सॉफ्टवेयर उत्पाद विकास (6.4 अरब डॉलर) शामिल रहे।
- सूचना प्रौद्योगिकी समर्थित सेवाओं के निर्यात में व्यवसाय प्रक्रिया बाह्यस्रोतीकरण प्रमुख घटक बना रहा।
- निर्यात के प्रमुख गंतव्य:
- संयुक्त राज्य अमेरिका भारत का सबसे बड़ा बाजार बना रहा। कुल सॉफ्टवेयर निर्यात में उसकी हिस्सेदारी 54.1 प्रतिशत (119.7 अरब अमेरिकी डॉलर) रही, जो वर्ष 2024-25 के 52.9 प्रतिशत से अधिक है।
- यूरोप की हिस्सेदारी 31.8 प्रतिशत रही, जबकि यूनाइटेड किंगडम की हिस्सेदारी 15.4 प्रतिशत रही, जो पिछले वर्ष के 15.5 प्रतिशत की तुलना में मामूली कमी है।
- संयुक्त राज्य अमेरिका के व्यापार युद्ध एवं शुल्कों के बावजूद, वहाँ भारत का सॉफ्टवेयर निर्यात 11 प्रतिशत बढ़ा।

- सेवा प्रदान करने का माध्यम:
- भारत की 91.7 प्रतिशत सॉफ्टवेयर सेवाएँ देश से बाहर बैठे ग्राहकों को दूरस्थ रूप से प्रदान की गईं, जो दूरस्थ सेवा प्रदान करने के बढ़ते महत्व को दर्शाता है।
- देश के बाहर जाकर प्रदान की जाने वाली सेवाओं का निर्यात 19 अरब डॉलर से घटकर 18.4 अरब डॉलर रह गया। यह वीजा नियमों के सख्त होने के प्रभाव को दर्शाता है।
- भारतीय कंपनियों से संबद्ध विदेशी कंपनियों द्वारा स्थानीय स्तर पर किया जाने वाला सॉफ्टवेयर कारोबार 13.9 अरब डॉलर से बढ़कर 17.9 अरब डॉलर हो गया। इसमें संयुक्त राज्य अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम प्रमुख गंतव्य बने हुए हैं।
भारत के सेवा क्षेत्र की वृद्धि के प्रमुख कारक
- डिजिटल क्षमता: भारत में कुशल सूचना प्रौद्योगिकी पेशेवरों की बड़ी संख्या तथा विकसित डिजिटल अवसंरचना वैश्विक स्तर पर सूचना प्रौद्योगिकी एवं व्यवसाय प्रक्रिया सेवाएँ उपलब्ध कराने में सहायता करती है।
- वैश्विक मांग: संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप से सुदृढ़ मांग भारत के सॉफ्टवेयर निर्यात को निरंतर समर्थन प्रदान कर रही है।
- दूरस्थ सेवा प्रदान करना: दूरस्थ सेवा प्रदान करने की प्रमुखता से कर्मचारियों की भौतिक आवाजाही पर निर्भरता कम होती है और भारतीय कंपनियाँ दूर बैठे वैश्विक ग्राहकों को सेवाएँ प्रदान कर पाती हैं।
- विदेशों में उपस्थिति: विदेशी संबद्ध कंपनियों के माध्यम से विस्तार से भारतीय कंपनियों की वैश्विक उपस्थिति तथा स्थानीय स्तर पर होने वाली आय में वृद्धि हो रही है।
मुद्दे एवं चिंताएँ
- बाजार का संकेंद्रण: सॉफ्टवेयर निर्यात का 54.1 प्रतिशत संयुक्त राज्य अमेरिका को जाने के कारण एक ही बाजार पर अत्यधिक निर्भरता बाहरी जोखिमों को बढ़ाती है।
- वीजा संबंधी प्रतिबंध: देश के बाहर जाकर प्रदान की जाने वाली सेवाओं के निर्यात में कमी भारत की पारंपरिक वैश्विक सेवा प्रदान करने की व्यवस्था पर सख्त वीजा नियमों के प्रभाव को दर्शाती है।
- व्यापार संरक्षणवाद: संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा लगाए गए ‘लिबरेशन डे’ शुल्क तथा शुल्क लगाने के लगातार प्रयास संरक्षणवादी व्यापार नीतियों से उत्पन्न जोखिमों को दर्शाते हैं।
- वस्तु एवं सेवा निर्यात में असंतुलन: सेवा निर्यात में निरंतर तीव्र वृद्धि इस बात को दर्शाती है कि भारत बाह्य आय के लिए सेवाओं पर अधिक निर्भर हो रहा है। इसके विपरीत, संयुक्त राज्य अमेरिका को भारत का वस्तु निर्यात केवल 0.9 प्रतिशत बढ़कर 87.31 अरब अमेरिकी डॉलर हुआ।
संबंधित प्रयास एवं पहल
- डिजिटल एवं सूचना प्रौद्योगिकी पारिस्थितिकी तंत्र: डिजिटल भारत, सूचना प्रौद्योगिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी समर्थित सेवाओं के विस्तार, डिजिटल अवसंरचना तथा कौशल विकास को बढ़ावा देने वाली सरकारी योजनाएँ भारत की सेवा अर्थव्यवस्था की आधारभूत संरचना को सुदृढ़ कर रही हैं।
- वैश्विक बाजारों का विस्तार: निर्यात बाजारों में विविधता लाने तथा भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी एवं व्यावसायिक सेवाओं को बढ़ावा देने से किसी एक बाजार पर अत्यधिक निर्भरता से उत्पन्न जोखिम को कम किया जा सकता है।
- कौशल विकास: कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्लाउड संगणना, साइबर सुरक्षा, आँकड़ा विश्लेषण तथा उभरती प्रौद्योगिकियों में निरंतर कौशल उन्नयन भारत की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
आगे की राह
- निर्यात बाजारों में विविधता: भारत को संयुक्त राज्य अमेरिका पर अत्यधिक निर्भरता कम करने के लिए यूरोप, यूनाइटेड किंगडम, एशिया-प्रशांत क्षेत्र तथा उभरते बाजारों के साथ सेवा व्यापार को अधिक सुदृढ़ करना चाहिए।
- मूल्य शृंखला का उन्नयन: पारंपरिक सूचना प्रौद्योगिकी सेवाओं की बाहरी आपूर्ति तथा व्यवसाय प्रक्रिया बाह्यस्रोतीकरण से आगे बढ़कर सॉफ्टवेयर उत्पाद, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अनुसंधान एवं विकास, साइबर सुरक्षा तथा उच्च-मूल्य वाली डिजिटल सेवाओं पर अधिक ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए।
- वैश्विक उपस्थिति का सुदृढ़ीकरण: विदेशों में अधिक वाणिज्यिक उपस्थिति भारतीय कंपनियों को स्थानीय बाजारों की आवश्यकताओं के अनुसार सेवाएँ प्रदान करने में सहायता कर सकती है तथा कर्मचारियों की सीमा-पार आवाजाही पर निर्भरता कम कर सकती है।
- नीतिगत स्थिरता: भारत को वैश्विक सेवा केंद्र के रूप में अपनी स्थिति बनाए रखने के लिए व्यापार, कराधान, वीजा तथा नियामकीय व्यवस्थाओं में स्थिरता और पूर्वानुमेयता सुनिश्चित करना आवश्यक है।
स्रोत: News On AIR
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